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श्री अयोध्याजी की धार्मिक और ऐतिहासिक महत्त्व: गोपाल प्रसाद

श्रीअयोध्या के पवित्र रजःकणों में वैदिक धर्म के महत्त्व और आर्य जाति के गौरव का इतिहास छिपा हुआ है. मनु, इक्ष्वाकु, मान्धाता, भरत और रघु आदि धर्म धुरंधर और धीर धनुर्धर चक्रवर्ती राजर्षि जिस महाँ तपोतेजः पुंज सूर्यवंश में उत्पन्न हुए, उसकी राजधानी श्री अयोध्या ही थी. इससे अधिक उसकी क्या महिमा हो सकती है कि स्वयं भगवन मर्यादा पुरुसोत्तम श्री रामचन्द्र जी की यह जन्मभूमि है. इसी यशस्विनी अपराजिता (श्री अयोध्या) ने धर्म और ज्ञान की समुज्ज्वल ज्योति विश्व को प्रदान की है. उपर्युक्त सूर्यवंशी भरत ही वह भरत है जिनके शुभनाम से इस महादेश को भरतखंड अथवा भारतवर्ष की संज्ञा प्राप्त हुई है. श्री अयोध्या की पुण्यदा भूमि ने संसार के कितने भौगोलिक (प्राकृतिक)और ऐतिहासिक परिवर्तन देखे हैं, यह कौन कह सकता है ? हर्ष का विषय है कि अब पुरातत्वान्वेषी साहित्यिक विद्वानों का भी उस मानव इतिहास की केंद्र स्थली श्रीअयोध्या  की ओर आकृष्ट होने लगा है और उसके सम्बन्ध की ऐतिहासिक खोज की प्रवृति उनमें जागृत हो रही है.
          श्रीअयोध्याजी समस्त हिन्दू जाति का एक प्रमुख तीर्थ है. यह ब्रह्मानन्दद्रव नेत्रजा श्रीसरयूजी के दक्षिण तट पर अवस्थित है. इसकी अलौकिक पवित्रता अथवा आध्यात्मिक महिमा एवं ऐतिहासिक गरिमा का गुणगान करना सूर्य को दीपक दिखाना है. यह युग युगांतर तक विश्वविजयी चक्रवर्ती रघुवंशियों की राजधानी रही है. यह अपने अलौकिक ऐश्वर्य और दिव्य वैभव के  कारण अमरावती से भी श्रेष्ठ मानी जाती थी. इसे भगवन मनु ने बसाया था. यहीं से उनहोंने मानव सृष्टि का विस्तार और मानव धर्म का निर्माण किया था. इस आदि राजधानी के वे ही आदि पुरुष आदि नपति थे. मनु की संतान होने से ही हम लोग नर जाति के प्राणी मनुज या मनुष्य कहलाते हैं. उन्हीं के कुल में और उन्हीं की आविर्भूत की हुई इस पुन्य्तामा अयोध्या में आदर्श नायक मर्यादा पुरुषोत्तम स्वयं भगवन श्री रामचंद्र जी अवतरित हुए. इससे अधिक और इसकी पवित्रता एवं महत्ता का क्या प्रमाण हो सकता है? इसकी अपूर्व आध्यात्मिक महत्ता की इतनी व्यापकता है कि जैन, बौद्ध भी इसे अपना सर्वोत्कृष्ट तीर्थ मानते हैं जैनों के आदि तीर्थंकर आदिनाथ ऋषभदेव यहीं हुए हैं तथा और भी चार तीर्थंकरों का  जन्म यहीं हुआ है. श्वेताम्बर और दिगंबर दोनों श्रेणियों के जैनों की श्रीअयोध्या प्रतिष्ठित पीठ है. दोनों के प्राचीन मंदिर भी यहाँ हैं. बौद्ध साहित्य में श्रीअयोध्याजी का “ साकेत” नाम अधिक प्रसिद्ध है. दिव्यावदान में साकेत शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार लिखी है-“ स्वयंमागतं स्वयंमागतं साकेत साकेतमिति संज्ञा संवृता “ इसका अर्थ यह है कि स्वयं (आपसे आप) आविर्भूत होने से अयोध्या को साकेत कहते हैं. भगवन बुद्ध ने श्रीअयोध्या में अपने विश्व व्यापक धम्म सिद्धांत निर्धारित किए थे. वे वर्षा ऋतू में साकेत में ही रहा करते थे. बौद्ध-जगत का परम श्रद्धेय बोधि वृक्ष भी यहाँ (दन्तधावन कुंड) पर था, जो किसी समय किसी असती रानी के स्पर्श से तत्काल सूख गया. श्रीअयोध्याजी की अद्भुत आध्यात्मिक महिमा से मुसलमान भी आकृष्ट हुए बिना नहीं रहे. हिन्दुओं की तरह वे भी अयोध्या को अपना मुख्य तीर्थ समझते हैं. वे उसे “खुर्द मक्का “ कहते हैं. “ मदीनतुल औलिया “ नमक पुस्तक में कहा गया है कि श्रीअयोध्याजी में हजरत आदम से लेकर अब तक कितने ही औलिया हो चुके हैं. इसलिए श्रीअयोध्या के पवित्र राज में लोटने में हिन्दू, मुसलमान दोनों ही अपना परम सौभाग्य समझते हैं. श्रीअयोध्या को सिद्धों का सराय भी कहा जाता है. इसकी अद्वितीय आध्यात्मिक महिमा को सिद्ध संतों ने ही समझा है. इसी से चाहे वे किसी मत सम्प्रदाय के हुए हों, उनहोंने श्रीअयोध्याजी के प्रति अपनी एकांत श्रद्धा प्रकट की है. अयोध्या महातम्य में लिखा है – अयोध्या के दर्शन से मनुष्य अपने जन्म- जन्मान्तर के किए हुए पापों से मुक्त हो जाता है.
प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में लिखा है कि इसमें अठारह आवरण हैं- दस भीतरी और आठ बाहरी. इसके द्वादश नाम मुख्य हैं :- अयोध्या, अपराजिता, नंदिनी, सत्य, विमला, कोशला, ब्रह्मपुरी, प्रमोदवन, साकेत, शांतनिकेतन, सत्यलोक और दिव्यलोक. इसकी चरों दिशाओं में चार पर्वत थे. उत्तर में मुक्ताद्री, पूर्व में श्रृंगाराद्रीदक्षिण में मणिकूट (रत्नाद्री) और पश्चिम में लिलादरी. प्रत्येक पर्वत के आश्रित तीन- तीन वन थे.. इस प्रकार अयोध्या में द्वादस वन थे.
जन्मभूमि : श्रीराम जन्मभूमि भूमंडल की वह पवित्र भूमि है, जहां पर मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्रजी का जन्म हुआ था. यह स्वयं सिद्ध पृष्ठ इतना पवित्र एवं महिमान्वित है कि यहाँ साधना करके स्वल्प काल में ही अनेक साधक सिद्ध हो गए हैं. आराधना करके कितने ही संतों ने भगवद दर्शन का अपूर्व लाभ प्राप्त किया है. हिन्दुओं में तो सिद्धों की गिनती ही नहीं की जा सकती और अयोध्या तो उनका घर ही है. यह सिद्धों की सराय भी कही जाती है. इसके पवित्र रज के प्रसाद से कितने मुसलमान भी सिद्ध हो गए हैं. जिनमें फजल अब्बास भी प्रसिद्ध है. इन्हीं  फजल अब्बास  के आदेश और आग्रह से जन्मभूमि का (विक्रमादित्य का बनवाया हुआ) प्राचीन मंदिर तोड़कर बबर्शः ने उसी स्थान पर प्रसिद्द बाबरी मस्जिद बनबायी, जिसे सजग हिन्दुओं ने छह दिसंबर को तोड़ दिया था. इस समय जन्मभूमि का मंदिर एक छोटे चबूतरे पर बना है और तिरपाल से आच्छादित है. जन्मभूमि पर बाबरी मस्जिद बन जाने के पश्चात् आचार्य देवमुरारीजी के शिष्य स्वामी श्री रामदास जी ने अपना चिमटा गाड़कर आसन जमा दिया था, कुछ दिन बीतने पर यह स्थान जन्मस्थान के नाम से प्रसिद्द हो गया. इसके पत्थर पर सीता पाक स्थान भी (इसका एक नाम) खुदा हुआ है.
 हनुमानगढ़ी : अयोध्या स्टेशन से उत्तर की ओर हनुमानगढ़ी रोड होकर लगभग दो फर्लांग जाने पर बाई ओर एक ऊँचे टीले पर यह परम प्रसिद्द स्थान स्थित है. गढ़ी के पूर्व भाग में ऊँचाई पर कुछ असली और कुछ नकली तोपें लगाई हुई हैं. स्थान का मुख्य फाटक उत्तर की ओर है. भीतर आँगन में वीरेश्वर भगवन श्रीहनुमान जी का एक पत्थर का विशाल मंदिर है. कहा जाता है कि बाबा अभयरामजी की साधुता और सिद्धी से प्रभावित होकर नबाब सुजाउद्दौला ने इसे बनबाया था और आसफ उद्दौला के मंत्री टिकैत राय ने पूरा किया था . इस मंदिर में पांच सौ से अधिक साधू निवास करते हैं. इसका प्रबंध चार पत्तियों द्वारा होता है. प्रत्येक पत्ती में एक महंत होते हैं. प्रधान श्री महंत गद्दीनशीन कहे जाते हैं.जो बरी बारी प्रत्येक गद्दी से चुने जाते हैं. यहाँ प्रत्येक मंगलवार को विशेष मेला लगता है.  कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को श्री हनुमानजी की जयन्ती बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाता है. ऐसी मान्यता है कि मंदिर में सुन्दर काण्ड (बाल्मीकीय अथवा तुलसीकृत) का पाठ करने से मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है.
रामकोट:-
सीता पाक स्थान:-
सीताकूप:-
वशिष्ठ कुण्ड:-
दुर्गेश्वरजी:-
जैन मंदिर:-
श्री कनक भवन:-
रत्नसिंहासन :-
लोमसटीला :-
मत्तगयंद :-
विभीषण कुण्ड :-
सप्तसागर :-
दन्तधावन कुण्ड:-
तुलसीचौड़ा:-
मणिपर्वत:-
तिलोदकी-गंगा :-
विद्याकुण्ड :-
खर्जूकुण्ड :-
सीताकुण्ड :-
अग्निकुण्ड :-
स्वर्णखनि कुण्ड :-
सिद्धेश्वरनाथ:-
सुग्रीव कुण्ड:-
क्षीरेश्वरनाथ :-
यमदग्निकूप :-
धनयक्ष कुण्ड :-
देवकाली (छोटी):-
जल्पा या जाल्पादेवी :-
बड़ी देवकाली :-
भरत कुण्ड :-
सूर्य कुण्ड :-
वासुदेवघाट :-
धमहरि:-
त्रेतानाथ:-
नागेश्वरनाथ:-कालेराम:-
चन्द्रहरि :-
लक्ष्मणकुण्ड :-
पापमोचनघाट :-
राजघाट:-
ऋणमोचनघाट:-
ब्रह्मकुण्ड:-
वासुकीकुण्ड :-
आदिनाथ का मंदिर :-
अजितनाथ का मंदिर :-
अभिनन्दननाथ का मंदिर :-
सुमंत्नाथ का मंदिर :-
अनंतनाथ का मंदिर :-
बाबा रघुनाथदासजी की छावनी :-
तपस्वीजी की छावनी:-
मधुकर निवास :-
चरण पादुका :-
भगवनदासजी  आचारी का मंदिर :-
यज्ञवेदी:-
मंदिर स्वामी- नारायण छपिया:-
रानूपाली:-
बाबा तुलसीदासजी का स्थान:-
मौनीजी का मंदिर :-
गुरुसदन बिहारी :-
वनादासजी का स्थान :-
सिद्ध्गिरी की मठिया :-
रूप कला कुञ्ज:-
सरयू मंदिर:-
चतुर्भुजी का स्थान :-
लक्ष्मणकिला :-
पलटूदासजी :-
आचारी बलराम स्वामी का मंदिर :-
दक्षिणी मंदिर:-
    विभिन्न जातियों के मंदिर
१.       मंदिर धोबी वंश                      मोहल्ला रायगंज में
२.       मंदिर ठठेर वंश                      मोहल्ला रायगंज में
३.       मंदिर बढई वंश                      मोहल्ला रायगंज में
४.       मंदिर सोनार वंश                     मोहल्ला रायगंज में
५.       मंदिर कुर्मी वंश                      मोहल्ला रायगंज में
६.       मंदिर रैदास वंश                      मोहल्ला रायगंज में
७.       मंदिर हलवाई वंश                     मोहल्ला रायगंज में
८.       मंदिर पासी  वंश                      मोहल्ला रायगंज में
९.       मंदिर नाऊ वंश                       मोहल्ला रायगंज में
१०.   मंदिर यादव (अहीर) वंश                मोहल्ला कैथाना में   
११.   मंदिर केवट  वंश                      मोहल्ला कैथाना में   
१२.   मंदिर मुराव वंश                       मोहल्ला कैथाना में   
१३.   मंदिर खटिक वंश                      मोहल्ला कजियाना में   
१४.   मंदिर कुम्हार  वंश                     मोहल्ला कजियाना में   
१५.   मंदिर भूज वंश                         मोहल्ला कटरा बेगमपुरा में  
१६.   मंदिर गडरिया वंश                      मोहल्ला रामकोट में   
१७.   मंदिर कहार वंश                        मोहल्ला कटरा में   
१८.   मंदिर कोहार वंश                        मोहल्ला स्वर्गद्वार में   
१९.   मंदिर तम्बोली वंश                      मोहल्ला ऋणमोचनघाट में   
२०.   मंदिर लोहार वंश                        मोहल्ला स्वर्गद्वार में   
२१.   मंदिर अयोध्यावासी ठठेर वंश              मोहल्ला नजरबाग में   


#( प्रस्तोता गोपाल प्रसाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम वर्ष प्रशिक्षित स्वयंसेवक एवं आरटीआई सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।  सूचना अधिकार के माध्यम से जनहित के मुद्दों यथा शैक्षणिक जगत और गौरक्षा विषय को प्रखरता से उठाने हेतु प्रयत्नशील हैं. ईमेल : missionmithila@gmail.com  तथा  मोबाइल नंबर -9910341785,8178949704 पर  उनसे संपर्क किया जा सकता है.)
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