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एक आरटीआई एक्टिविस्ट के संघर्ष की कहानी, उसी की जुबानी



पिताजी गुरु भी थे। गरीबी, प्राइवेट ट्यूशन वगैरह करके आजीविका चलाते; परिवार चलाने के साथ-साथ सारे समाज, देश की चिंता उनका प्रमुख स्वभाव रहा। हमेशा दूसरों से कुछ अलग करने की चाह; सीमित संसाधनों में भी देश, समाज और मित्रों के लिए समय निकालना; शायद उनका यही स्वभाव मेरे मस्तिष्क में रच-बस गया, कार्यशैली का हिस्सा बन गया। छात्र जीवन बहुत फाकाकशी, गरीबी का रहा, लेकिन मेरे पिताजी ने अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया। हमारे मकान का धरन (कड़ी) लकड़ी का था, जो टूट गया था। उसी पर पूरे छत का लोड था। मकान कब गिर जाय, कुछ ठिकाना नहीं। प्लास्टिक के टेंट लगाकर रहते थे। कभी घर में चूल्हा भी नहीं जलता था। ऐसी ही परिस्थितियों में एक बार गुल्लक तोड़ा, तो पाँच रुपए निकले। उन्हीं से दो किलो चूड़ा लाया था। उसी को भिंगोकर, नमक-मिर्च लगाकर सपरिवार ग्रहण किया। अपनी शादी बिना तिलक-दहेज के की। दो बहनों की शादी आज से बीस साल पहले दिल्ली में मात्र सत्रह हजार की मामूली रकम में ही की। दोनों बहनों की शादी एक ही तिथि में किया। हमारे समाज (अखिल भारतीय खटिक समाज) के जो राष्ट्रीय पदाधिकारी थे, उन्होंने अपना मकान पंद्रह दिनों के लिए दिया था।
[खटिक जाति बिहार में अनुसूचित जाति की सूची में नहीं है, ओबीसी में अति पिछड़ी जाति में है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में यह अनुसूचित जाति में भी है। बिहार में खटिक जाति फल और सब्जी के थोक आढ़तियों का काम करती है।]
अखिल भारतीय खटिक समाज का मैं राष्ट्रीय सचिव था, इसलिए संस्था के राष्ट्रीय पदाधिकारियों ने जन सहयोग, जन सहभागिता और जन संपर्क तीनों दिया।
बिहार की पृष्ठभूमि
छात्र जीवन में दरभंगा के सबसे टॉप कॉलेज सी॰एम॰ साइन्स कॉलेज का विद्यार्थी रहा। कायदे से मैं इस कॉलेज में एड्मिशन पाने का हकदार नहीं था, मेट्रिकुलेशन में मेरा मात्र 58% नंबर था, लेकिन 85% को इग्नोर करते हुए मुझे priority इसीलिए मिली कि मैं राष्ट्रीय प्रतिभा छात्रवृत्ति का घोषित विद्यार्थी था। घोषित इसलिए कि उस घोषणा के अनुरूप छात्रवृत्ति का पैसा ही मुझे नहीं मिला। लगातार आवेदन देने के बावजूद छात्रवृत्ति अंततः नहीं मिली और विभाग में मुझे बताया गया कि फंड आया ही नहीं (या divert कर दिया गया)। दोनों ही स्थितियों से बिहार की शैक्षणिक स्थिति की दुर्दशा का पता चलता है। ऐसे में पलायन नहीं होगा, तो और क्या होगा? मुझसे poor performance वाले विद्यार्थी कुछ शिक्षक बन गए, कई अन्य विभागों में चले गए, मैं वहीं का वहीं रह गया। ऐसी स्थिति में मैंने कुछ विशेष करने की ठानी। मैंने बुकमार्ट नाम से दरभंगा के भगत सिंह चौक पर दूकान खोला। मैंने हिन्दी एवं मैथिली साहित्य के rare books का collection करना शुरू किया और इसके लिए सबसे पहले प्रकाशकों, साहित्यकारों की सूची बनाई और विभिन्न संस्थाओं द्वारा साहित्यिक कार्यक्रमों में सहभागिता की तथा जगह-जगह मैथिली और हिन्दी साहित्य की पुस्तक प्रदर्शनी लगाई। इसके पीछे मेरे दो-तीन बड़े महत्वपूर्ण उद्देश्य थे -
1॰ साहित्य की dead marketing में जान फूंकना,
2॰ पढ़ने के प्रति जो लोगों की अभिरुचि घट गई है, उसमें बढ़ोतरी लाना,
3॰ हिन्दी और मैथिली साहित्य के क्षेत्र में maximum variety का collection करना, पाठक/ग्राहक मूल्यांकन करने के बाद अपनी पुस्तक खरीद सकें।
चूँकि यह काम राजधानी पटना के अलावा और कहीं नहीं होता था, वह भी साल में केवल एक बार पटना पुस्तक मेला में, इसलिए मेरा किसी के साथ competition नहीं था। निष्कंटक रूप से आगे संपर्क सूत्र बढ़ाने में कामयाब रहे। धीरे-धीरे हिन्दी और मैथिली साहित्य के प्रकाशकों, रचनाकारों एवं विधाओं के साथ-साथ पाठकों की मांग और उनकी मानसिकता को समझने का भी प्रयास करता था। एक दिन अचानक हमारे मित्र रणजीत कुमार झा के बहनोई आनन्द कुमार झा (मूलतः बांसोपट्टी, मधुबनी) जो दिल्ली में आईटी कम्पनी चला रहे थे, वे मेरी बुक मार्केट नामक दूकान पर आए और मेरे तमाम संग्रह का अवलोकन किया। अवलोकन के उपरान्त उन्होंने पूछा कि आप इससे कितना कमा लेते है? मैंने कहा, बस दाल-रोटी चल जाती है, संग्रह करने लायक कुछ नहीं बचता। वैसे भी, धन कमाना मेरा लक्ष्य नहीं था। अगर रहता, तो उसके अनुरूप कार्य करता। लेकिन मेरा उद्देश्य तो साहित्य सेवा, सृजनकर्मियों की सेवा और पुस्तकों की अभिरुचि के साथ-साथ बुद्धिजीवियों के सान्निध्य पाने का था। आनन्द कुमार जी ने जो पूछा था कि कितना कमा लेते हो, खास करके बरसात के समय आमदनी बहुत कम हो जाती थी। दूकान का किराया देना भी मुश्किल हो जाता था। तो ऐसी स्थिति में आज से बीस साल पहले उन्होंने मुझसे पूछा कि आप दिल्ली आना चाहते हैं और क्या आप मिथिला/मैथिली से संबंधित प्रोजेक्ट पर कार्य करना पसंद करेंगे? मैंने हामी भर दी और मैं दिल्ली चला आया। मेरा शुरुआती वेतनमान 5000 रुपया था (1998)। लक्ष्मी नगर में ही आनन्द कुमार झा की कम्पनी Hope All Infoline Private Limited थी। मैं उस समय इंटरनेट का एबीसीडी भी नहीं जानता था, इन्होंने मुझे काम सिखाया। आज मैं इंटरनेट पर सर्च करने और R&D करने का अच्छा जानकार बन गया हूँ। निश्चित रूप से इन सब का श्रेय आनन्द कुमार झा जी को जाता है, जिन्होंने मुझे मिथिला बिहार डॉट कॉम का प्रोजेक्ट coordinator बनाया और इस तरह दिल्ली में रहकर मिथिला की माटी और संस्कृति से जुड़े रहे। मुझ जैसे अनगढ़ व्यक्ति को आईटी क्षेत्र की बारीकियों से अवगत कराया। यहाँ आने के बाद मैंने अपने आपको समुद्ररूपी माहौल में पाया। ऐसा लगा कि मैं तो कुएँ का मेढक था। देखा जाय तो पहले मैं बहुत घमंडी भी था, घमंडी स्वभाव का था। इसका मूल कारण वर्ग में प्रथम होना (क्लास 1 से 8 तक) और निबन्ध व वाद-विवाद प्रतियोगिताओं तथा स्कॉलरशिप छात्रवृत्ति परीक्षाओं में स्थान पाना रहा है। लेकिन दिल्ली आने पर समाज के बड़े दायरे का वास्तव में मुझे एहसास हुआ। उसके बाद मैंने यह तय किया है, मैंने सोचा है कि इन बड़े-बड़े लोगों के बीच मेरा अस्तित्व क्या है? इन्हीं उलझनों के बीच मैंने तय किया कि मुझे दूसरों से अलग विशेष एवं बड़ा काम करना चाहिए। इस बीच में शैक्षणिक प्रमाण पत्रों के प्रति मेरे मन में विक्षोभ उत्पन्न हुआ और उनको अग्नि के हवाले कर दिया। अब स्वयं की कम्पनी बनाऊँगा और दूसरों को नौकरी दूँगा, उद्यम खड़ा करूँगा, अपने जीवन काल में सेल्स मार्केटिंग, कंटेंट राइटिंग, मीडिया मैनेजमेंट, मीडिया कोऑर्डिनेशन, इवैंट मैनेजमेंट एवं जन-सम्पर्क के माध्यम से अपनी आजीविका का स्रोत बनाया। शुरू में इसे फ्रीलांस बेसिस पर करता रहा, परन्तु वर्तमान में मैंने इसे प्राइवेट लिमिटेड फ़र्म के रूप में परिणत कर दिया।
दिल्ली में श्री श्रीरविशंकर की संस्था आर्ट ऑफ लिविंग के प्रशिक्षण शिविर में ही मूलतः वाराणसी के राजेश पराशर जो बिज़नेस स्टैंडर्ड और मिंट अखबार में फोटो स्ट्रेटजी जर्नलिस्ट रहे हैं, के साथ मिलकर अनलॉक कम्युनिकेशन प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी पंजीकृत कराई, जिसका कार्यालय आईपी एक्सटैन्शन, मधु विहार मार्केट, दिल्ली – 92 में है। ये आजीविका के स्रोत के ऊपर की बातें। इस बीच 2010 में हमारे मित्र (दरभंगा के रहनेवाले) जो राज्य सभा में अधिकारी हैं, उनके माध्यम से संजय जोशी (पूर्व राष्ट्रीय संगठन महामंत्री, भाजपा) के यहाँ जुड़ा और सहायक केआर रूप में डेढ़ वर्ष सेवा दी। वहाँ मेरा कार्य प्रतिदिन 23 अखबारों को पढ़कर उसके महत्वपूर्ण कटिंग्स का पेस्टिंग करके, फ़ाइल तैयार करके देना होता था। उनके यहाँ के सेवाकाल में भाजपा और संघ के जिला से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक के पदाधिकारियों से सम्पर्क का अवसर प्राप्त हुआ। अचानक एक दिन मन में संकल्प किया कि देश में व्याप्त कुव्यवस्था के लिए सर्वाधिक दोषी कांग्रेस पार्टी है, क्योंकि उसी ने देश पर सर्वाधिक राज किया है। इसलिए मैंने तय किया कि मुझे देश के उस सीट पर अपना ध्यान फोकस करना चाहिए, जहाँ कांग्रेस की मूल जड़ है। चाणक्य के पैर में जब कुश चुभ गया था, तब उन्होंने उस कुश को उखाड़ने के साथ-साथ उसकी जड़ में मट्ठा भी डाला था, ताकि वह कुश उस जगह पुनः पनप नहीं सके। इसी दृष्टिकोण पर आधारित हमारे दिल में यह संकल्प किया कि मुझे कांग्रेस अध्यक्ष के गढ़ में चुनौती देनी चाहिए। वास्तव में यह विचार तब आया, जब सबसे ज्यादा अखबार, पत्रिकाओं, राजनीतिक भाषणों एवं खोजी पत्रकारों के सम्पर्क में आया। मैं वर्ष 2011 से 2014 तक अमेठी नगर के गंगागंज मुहल्ले में किराये के मकान में रहते हुए अमेठी को, अमेठी की समस्याओं को, अमेठी के विकास की अवरूद्धताओं को, कांग्रेस पार्टी को, पार्टी अध्यक्ष के बयान/भाषण, एजेंडा, मानसिकता से संबंधित जानकारी एकत्र करने के प्रति उन्मुख हुआ। अमेठी में रहते हुए मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा भी जाने लगा और अमेठी नगर में स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में प्राथमिक प्रशिक्षण (आरएसएस का) प्राप्त किया। वर्ष 2014 में लॉक सभा चुनाव के तुरंत बाद मैंने गोरखपुर से आरएसएस का प्रथम वर्ष प्रशिक्षण प्राप्त किया। 1998 से अब तक के लंबे सफर में अपनी जातीय अस्मिता को भी नहीं भूला। मेरा मानना है कि जातिगत संगठनों के माध्यम से अशिक्षा, मृत्यु-भोज, सती-प्रथा, बाल-विवाह, छुआछूत के खिलाफ जंग छेड़ने का काम आसानी से किया जा सकता है। इसके साथ ही आर्थिक रूप से निर्बल परिवारों के सामाजिक-आर्थिक उन्नयन के साथ-साथ शादी-ब्याह के मामलों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जा सकती है। अपने कर्तव्य की पूर्ति करते हुए अपने अधिकार की मांग करना पूर्णतः न्यायसंगत है। वास्तव में समाज में इसी माध्यम से बदलाव की उम्मीद की जा सकती है। केवल सरकार पर निर्भर होना उचित नहीं। हमें सरकार और न्यायालय पर बोझ बढ़ाने के बजाय बोझ घटाने के लिए संकल्पबद्ध होना चाहिए। इसके लिए वार्ड लेवल पर जुझारु, कर्मठ, क्रियाशील युवावर्ग के साथ-साथ सेवानिवृत कर्मियों को भी सलाहकारमंडल के रूप में उनके अनुभवों का देश और समाज के हित में व्यापक रूप से योगदान सुनिश्चित करना चाहिए। मैंने अनुभव किया कि देश के प्रायः सभी राज्यों के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में प्रमुख समस्याएँ कॉमन हैं। जैसे विद्युतीकरण, सिंचाई, पेयजल, खाद और बीज का अभाव, अन्न भंडारगृह एवं शीतगृह, सड़क, भूजल स्तर में गिरावट, यूरिया एवं पेस्टिसाइड्स के अधिकाधिक उपयोग के कारण बंजर जमीन के क्षेत्रफल में बढ़ोतरी, बृक्षारोपण का संरक्षण एवं मॉनिटरिंग के अभाव के कारण पौधों की मृत्यु दर की अधिकता, पंचायती राज व्यवस्था के नियमों, परिनियमों का उल्लंघन, तालाब, ग्रामसभा एवं गोचर भूमि का अतिक्रमण (दबंगों एवं माफियाओं के द्वारा), वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के अभाव के कारण नालियों तथा कारखानों से उत्सर्जित रासायनिक दूषित जल का नदियों एवं विभिन्न जल स्रोतों में जाने के कारण प्रदूषण की विशाल समस्या और मानव स्वास्थ्य पर उसका प्रतिकूल प्रभाव, कुकुरमुत्तों की तरह शिक्षा का बाजारीकरण करनेवाले स्कूलों और सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की अनुपस्थिति एवं पढ़ाई की प्रतिकूल गुणवत्ता के कारण प्रतिस्पर्धा के युग में ग्रामीण परिवेश के समक्ष चुनौतियाँ यथावत हैं। देश की शासन व्यवस्था समर्थ और स्वावलंबी गाँव के बजाय स्मार्ट सिटी की तरफ अपने खजाने का मुंह खोल चुकी है। हमारा भारत देश कृषि प्रधान देश रहा है। देश की 85% जनता गाँवों में बसती है। ऐसी स्थिति में गाँव में जन सुविधाओं के विस्तार से ही गाँव को स्वावलंबी बनाया जा सकता है और वास्तव में तभी गाँव से पलायन रुक सकता है। यह कैसी विडम्बना है कि हमारे देश की पॉलिसी निर्धारित करनेवाला योजना आयोग (वर्तमान में नीति आयोग) 32 रुपए से नीचे प्रतिदिन खर्च करनेवाले को ही गरीब मानते हुए गरीबी रेखा निर्धारित करता है। लेकिन वहीं दूसरी ओर राजनेताओं, मंत्रियों, सांसदों, विधायकों के ऐशोआराम एवं विलासी जीवन के खर्चों को बढ़ा दिया गया है। यह कैसा न्याय है? दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कर्नाटक के मुख्यमंत्री के शपथग्रहण समारोह के दौरान 80 हजार रुपए की शराब गटक जाते हैं। एक ओर सुप्रीम कोर्ट से मौत की सजा पाए अपराधी को बचाने हेतु तथा तमिलनाडु के भूतपूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि की लाश को दफनाने हेतु रात में कोर्ट खुलवाया जाता है, वहीं दूसरी ओर भारत के आम नागरिकों का केस देश की विभिन्न अदालतों में वर्षों से धूल फांक रहा है। उसे न्याय कब और कैसे मिलेगा? विलम्ब से मिला न्याय वास्तव में अन्याय के समान है।
राजनीतिक नेताओं ने दलितों को बहलाने के नाम पर आरक्षण लागू तो कर दिया, किन्तु क्या NDA की सरकार में उन रिक्त पदों को भरा भी गया है? जब उनके सम्पूर्ण कार्यकाल में रिक्तियाँ ही नहीं भरी गईं और कई पद समाप्त कर दिये गए, तो ऐसी स्थिति में किस बात का आरक्षण? किसके लिए आरक्षण और क्यों आरक्षण? जिस वर्ग को आरक्षण दिए जाने का प्रावधान है, उसको वह लाभ मिला ही नहीं। वहीं दूसरी ओर वह शोषित दलित वर्ग कथित सवर्णों के कोपभाजन और दबंगई का शिकार होता रहा है। इंटरनेट के इस आधुनिक युग में भी दलितों के प्रति छुआछूत, मनमाना सामंती व्यवहार और असंवैधानिक तरीके से बर्बरतापूर्ण घटनाओं की खबरें देश के विभिन्न हिस्सों से लगातार आती ही रहती हैं। हमारे देश के माननीय राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद जी को एक सभा में कहना पड़ता है कि दलितों और महिलाओं के साथ अमानवीय कृत्य की स्थिति में हमारा समाज किस ओर जा रहा है? वास्तव में यह चिंतनीय और निंदनीय है। इस परिप्रेक्ष्य में देश के प्रमुख बेस्टसेलर किताब जीत आपकी के रचयिता श्री शिव खेड़ा ने कहा था कि यदि किसी के साथ अन्याय हो रहा है और आप यह सोचकर उसका प्रतिकार नहीं करते हैं कि इसमें मेरा कोई अपना तो है नहीं, और आप उससे पिंड छुड़ाते हुए आगे बढ़ जाते हैं तो आप गलती कर रहे हैं और आप समझ लीजिये कि अगला नंबर आप ही का है। जयप्रकाश नारायण के गुजर जाने के बाद आम आदमी का मानना है कि उनका सपना (सम्पूर्ण क्रांति) खतम हो गया। परन्तु मेरा मानना इसके ठीक विपरीत है। मेरा मानना है कि सम्पूर्ण क्रांति के रूप में हमारे संविधान में आरटीआई के रूप में एक नया टूल दिया है। 2010 में मैंने इसी टूल को अपना हथियार मानते हुए लोक जागरण एवं लोक प्रशिक्षण के माध्यम के रूप में चुना है। वर्ष 2011 से 2018 की अवधि में अब तक साढ़े छः हजार से ऊपर आरटीआई आवेदन केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में दायर करके सूचना प्राप्त करके मीडिया में साझा किया है। वास्तव में मेरा उद्देश्य सूचना के अधिकार के माध्यम से पारदर्शिता स्थापित करना एवं भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर करना है, परन्तु यह कार्य इतना आसान नहीं। एक तरफ गाढ़ी कमाई का अधिकतम हिस्सा इस जुनून पर खर्च होने की चुनौती और दूसरी ओर गन पॉइंट पर काम करते हुए चुनौतियों का सामना करना। आरटीआई के कारण दिल्ली के अशोक विहार स्थित सत्यवती कॉलेज में अपने साथ हुए दुर्व्यवहार को जीवन भर नहीं भूल सकता। भ्रष्ट अफसरों, राजनेताओं एवं माफियाओं के नेक्सस द्वारा धमकियाँ भी मिलती रहती हैं, परन्तु मैं अपने निर्णय पर अटल हूँ।

जब नाव जल में छोड़ दी, तो धार क्या, मंजधार क्या?

बचपन में हिमालय नाम की कविता को मैंने अपने जीवन में आत्मसात कर लिया है, जिसकी पंक्तियाँ कुछ इस प्रकार हैं:

“खड़ा हिमालय बता रहा है, डरो न आँधी-पानी से,
डटे रहो तुम अविचल होकर, हर संकट तूफानी से।
मिली सफलता उसको जग में, जीने में, मर जाने में”




आरटीआई के फील्ड में कैसे आए
छात्र जीवन में मेरी एक हॉबी थी, देश एवं समाज की ज्वलंत समस्याओं के ऊपर प्रमुख राजनेताओं एवं प्रशासनिक अधिकारियों को पत्र भेजकर ध्यान आकृष्ट करना। उसमें से लगभग 90% का जवाब मुझे मिलता ही नहीं था। ऐसी स्थिति में मेरे मन में घोर निराशा का भाव जागृत हो चुका था। तभी वर्ष 2010 में प्रगति मैदान, दिल्ली में आयोजित पुस्तक मेले में नृपेन्द्र कालिया नामक व्यक्ति ने मुझे एक पुस्तक भेंट की और समीक्षा लिखने हेतु आग्रह भी किया। उस पुस्तक का नाम था सूचना का अधिकार। मैं उस पुस्तक को रात के ढाई बजे तक लगातार पढ़ता रहा और तदुपरान्त यह तय किया कि मुझे आरटीआई के टूल का इस्तेमाल जनहित से संबंधित मुद्दों/विषयों की जानकारी प्राप्त करने में करनी चाहिए। आरटीआई की दो खासियत ने मुझे मुग्ध कर दिया। इसकी पहली खासियत थी, 30 दिन की समय सीमा में विभाग द्वारा जानकारी मुहैया कराना। दूसरी खासियत थी, जानकारी नहीं मुहैया कराये जाने की स्थिति में 250 रु. प्रतिदिन और 25000 रु. अधिकतम जनसूचना अधिकारी के वेतन से काट लिये जाने का प्रावधान है। एक पल मैं सोचता रहा कि 2005 में लागू इस कानून से मैं 5 साल तक अनभिज्ञ क्यों रहा। अभी तक गँवाए 5 साल में काफी काम हो चुका होता। हर व्यक्ति के कार्य की एक सीमा होती है। चूँकि दिन, समय, कार्यकाल और जीवनकाल निश्चित है, अतः मैंने निर्णय किया कि अपनी सीमित सुविधाओं एवं संसाधनों से जितना कर पाने में सक्षम हूँ, उतना तो करूंगा ही, परन्तु अपनी मृत्यु से पहले कम-से-कम एक हजार गोपाल प्रसाद तैयार करने का प्रण मैंने कर लिया है। वास्तव में मेरे लिए आरटीआई सम्पूर्ण क्रांति है, क्योंकि इसके माध्यम से केंद्र सरकार, राज्य सरकार तथा नगर निकाय से संबंधित मामलों का खुलासा कर क्रांति की जा सकती है। RTI activists are just like intelligence agencies. राहुल गाँधी के खिलाफ चुनाव लड़ने की मेरी ( GOPAL PRASAD RTI ACTIVIST) घोषणा को The Sunday Guardian अँग्रेजी अखबार ने प्रकाशित किया है।

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