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" हिन्दू" कोई संप्रदाय नहीं , एक " जीवनप्रणाली "

संस्कृति " स्वयं" में एक भावनात्मक संज्ञा है , जिसकी पहचान होती है उसमें पैदा हुए और उसे स्वयं जीते हुए लोगों के जीवनमूल्यों से जो उनके जीवन जीने की शैली का निर्धारण करते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि " हिन्दू" कोई संप्रदाय नहीं है। वह एक " जीवनप्रणाली " है। वह व्यक्ति की पारिवारिक और सामाजिक जीवन पद्धति का निरूपण है। व्यक्ति के जीवन का कल प्रायः सौ बर्ष है और हिन्दू धर्म अथवा हिन्दू जीवन प्रणाली को इसी कालखंड में विभाजित करके उसके आदर्शों की संरचना हमने की है। चार आश्रमों अर्थात ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थ , और सन्यास को 25, 25 बर्ष का समय दिया गया है। प्रत्येक में नारी पुरुष के सम्बन्धों के आदर्शों को विस्तार दिया गया है। मन , पत्नी, बहन , भाभी , ममी , बुआ आदि कितने ही रूपों में उसके कर्तव्यों की व्याख्या की गई है। पुरुष के भी ऐसे ही सम्बन्धों के आदर्शों का निरूपण हुआ है। यही नहीं स्त्री और पुरुष के सामाजिक उत्तरदायित्वों का भी पूरा- पूरा वर्णन किया गया है। इस सबके केंद्र में है शिक्षा के स्वरुप को व्याख्यायित करना। दुर्भाग्य से आज की शिक्षा प्रणाली से " अच्छे " व्यक्ति का निर्माण ही नहीं हो पा रहा है , भले ही वह " अच्छा डाक्टर या अच्छा " इंजीनीयर " क्यों न बन जय। उदहारण के लिए हम लें तो यह कौन नहीं जनता कि अधिकतर इंजीनीयर भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। जिसके कारण घटिया सामग्री प्रयोग में आती है , जिससे भवन और नहर समय से पहले ही धरासायी हो जाती है। स्पष्ट है कि कुशल कारीगर होकर भी उनका कार्य " अकुशल " हो जाता है और समाज को उसका हर्जाना भरना पड़ता है। दूसरी ओरउनकी सही ट्रेनिंग भी हर स्थान पर ठीक नहीं हो पा रही है। किताबी शिक्षा तो हो जाती है , प्रैक्टिकल अनुभव नहीं। नए - नए आबिष्कारों के लिए एक समय में भारत जाना जाता था , चाहे वह खगोलशास्त्र हो अथवा हड़प्पा और मोहनजोदड़ो के भवनों का निर्माण , अथवा आयुर्विज्ञान, किन्तु आज की शिक्षा के द्वारा हैम यह नहीं कर प् रहे हैं। हैम छोटी - छोटी मशीनों के लिए भी विदेशों को मोटी रायल्टी देकर ले लेते हैं। नए मूलभूत आबिष्कारों की तो बात ही जेन दें। अतः न हम एक अच्छे मनुष्य हो पा रहे हैं, न एक अच्छे विचारक , न एक अच्छे वैज्ञानिक और न ही शाश्वत सामाजिक मूल्यों के आधार पर अपने जीवन को ही रच पा रहे हैं।

(साभार : आरा के नर्मदेश्वर ओझा द्वारा लिखित पुस्तक " राष्ट्रीयता सांस्कृतिक अवधारणा " में शुभाशंसा शीर्षक अंतर्गत भारतीय पुरातत्व परिषद् , दिल्ली के स्वराज्य प्रकाश गुप्त के उदगार )

Comments

  1. Yes i agree with you and i respect you and your blog. Hindu is not religious. It is livelife. I appreciate to your blog. I work in Vehicle towing company near me ,it is best.

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