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मौलिक भारत ने लिया‘मतदाता जागरूकता अभियान’ प्रारंभ करने का संकल्प

राजनीतिक दलों में लोकतंत्र लाए बिना विधानसभा व संसद में लोकतंत्र की अपेक्षा नहीं की जा सकती है। जनजागृति के लोकतांत्रिक माध्यम से जनमत को तैयार कर व्यवस्था में व्यापक बदलाव का रास्ता अपनाया जा सकता है। मतदाता के रूप में अपने कर्तव्य व उत्तरदायित्व को समझाने के ध्येय के साथ अधिकतम लोगों को जागृत व सक्रिय करने हेतु सामाजिक संस्था "मौलिक भारत" ने कई संस्थाओं के साथ मिलकर ‘मतदाता जागरूकता अभियान’ प्रारंभ करने का संकल्प लिया है। लोकतंत्र की स्थापना व राजनीति को लोकनीति में बदलने हेतु सबसे आवश्यक है धोखतंत्र पर प्रहार। इसी भ्रम को समाप्त कर ही लोकतंत्र को वास्तविक अर्थों में स्थापित करने की प्रक्रिया प्रारंभ की जा सकती है।मौलिक भारत ने इस हेतु कुछ महत्वपूर्ण बिषयों को अपने जनजागरण का आधार बनाया है. मौलिक भारत संस्था के राष्ट्रीय संयोजक अनुज अग्रवाल के अनुसार मतदाताओं के लिए हेल्पलाइन/काल सेंटर का निर्माण,दिल्ली एवं देश भर में मतदाता सूची में करोड़ों फर्जी नामों को हटवाना, करोड़ों लोग जिनके नाम मतदाता सूची में नहीं हैं उनके नाम शामिल करवाना, मतदान करने के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए तथा मुस्लिम/दलित व महिलाओं के वोटबैंक के रूप में इस्तेमाल की प्रवृत्ति को मिटाने का प्रयास ,सरकारी अधिकारियों द्वारा राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ मिलीभगतकर फर्जी मतदाता, फर्जी मतदान की साजिशों का भांडाफोड़ करना,वोटिंग मशीनों की खामियों व सही उपयोग के प्रति मतदाता को जागरूककरना, मतदान की अनिवार्यता, यूआईडी की अनिवार्यता तथा यूआईडी के माध्यम से ही वोट डाले जायें इस प्रावधान के लिए माँग करना व जनमत तैयार करना,मतदान के समय ईवीएम में ऐसा साफ्टवेयर लगवाने की माँग करना जिससे प्रत्येक वोट देने के समय भी पता चल सके ताकि फर्जी मतदान अथवा अंतिम समय में लगातार बटन दबाकर फर्जी मतदान की गड़बड़ी को रोका जा सके। पूरे देश में एक ही दिन में पंचायत, नगर पालिका, विधानसभा एवं लोकसभा के चुनाव कराये जायें जिससे गड़बडि़यों एवं साजिशों को रोका जा सके, इसके लिए जनजागृति करना।वरीयता मतदान पद्धति को लागू किया जाये ताकि 50% से अधिक मत प्राप्त व्यक्ति ही चुनाव जीत सके।दलों में आंतरिक लोकतंत्र, उम्मीदवार का लोकतांत्रिक पद्धति से चयन/जन उम्मीदवार व जन घोषणा-पत्र को कानूनी मान्यता, असफल जनप्रतिनिधि को वापस बुलाने की प्रक्रिया, उम्मीदवार की निश्चित समय तक सामाजिक सक्रियता के बाद चुनाव लड़ने की योग्यता, उम्र की सीमा, क्षेत्र बदलने पर प्रतिबंध, चुने जाने पर अपना कार्यकाल पूरा करने तक दूसरे चुनावों के लड़ने पर प्रतिबंध 80% समय अपने क्षेत्र में ही रहकर कार्य करना। चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर नजर रखने हेतु निगरानी तंत्र, आयोग को दलों की मान्यता रद्द करने का अधिकार, सरकारी खर्च पर चुनाव, चुनाव आयोग के पास अपने बजट के कानूनी प्रावधान, दलों में आंतरिक लोकतंत्र के संवैधानिक प्रावधान ,आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन पर चुनाव आयोग को कानूनी कार्यवाही के अधिकार,अपराधी/भ्रष्टाचारी जनप्रतिनिधि/उम्मीदवार के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करना तथा सही जनप्रतिनिधि/ उम्मीदवार के आंकलन के लिए मतदाताओं को जागरूक करना/आदर्श उम्मीदवार के लक्षणों को बताना तथा वोट बेचने/खरीदने के खेल को रोकने के उद्देश्य से दिल्ली के अधिकाधिक विधानसभा क्षेत्रों में 15 नवम्बर से 2 दिसंबर तक मौलिक भारत से जुड़े विभिन्न विशेषज्ञोंद्वारा हेतु जागरूकता लाने का कार्यक्रम किया जाएगा। मौलिक भारत के आरटीआई प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय संयोजक गोपाल प्रसाद ने कहा है कि अब पार्टियों के टिकट लेना बड़ा खेल बन गया है। टिकट के इच्छुक व्यक्ति को अनेक जनसभाएं, कार्यक्रम, भोज, चंदा बाँटना, शराब पिलाना, पार्टी फंड में चंदा देना, प्रमुख नेताओं के घरों पर चक्कर काटना, उन्हें नकद धनराशि देना, स्थानीय स्तर पर चमचों-समर्थकों को पाल कर रखना, वोट बनवाना, विरोधियों के दांव-पेंच काटने के उपाय करना, चुनाव के समय वोटरों को नकद पैसे, शराब, भोजन इत्यादि देना, पोस्टर, बैनर, झंडे, बोर्ड, अखबारों-टीवी आदि में विज्ञापन देना, पत्रकारों को खरीद कर 'पेड न्यूज छपवाना, विभिन्न प्रभावी समूहों, जाति समूहों आदि को अपने पाले में करना, सरकारी मशीनरी को अपने पक्ष में करना जैसे तिकड़म करने पड़ते हैं। इस सब के लिए करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं।यदि भारत में जनतंत्र है, तो इस जनतंत्र के स्वरूप, कार्यतंत्र, व्यवस्था आदि का निधार्रण जननीति के द्वारा होना चाहिए या राजनीति के द्वारा? यदि निर्धारण का अधिकार जननीति के द्वारा होना चाहिए तो इसके लिए हमें जननेता चुनने चाहिए या राजनेता? आज ज्वलंत सवाल यह है कि संवैधानिक तौर पर भारत एक जनतंत्र या राजतंत्र? यदि भारत में जनतंत्र है, तो इस जनतंत्र के स्वरूप, कार्यतंत्र, व्यवस्था आदि का निधार्रण जननीति के द्वारा होना चाहिए या राजनींित के द्वारा? यदि निर्धारण का अधिकार जननीति के द्वारा होना चाहिए तो इसके लिए हमें जननेता चुनने चाहिए या राजनेता? जननेता यानी जनाधार वाला नेता अर्थात सही मायने में जनप्रतिनिधि। राजनेता यानी जो राज करना चाहता हो, जिसकी मानसिकता राजतांत्रिक हो।जननेता का चुनाव हो, इसके लिए भारत में चुनाव व्यवस्था है; कायदे-कानून हैं और उन्हे अंजाम देने के लिए चुनाव आयोग है। बावजूद इसके क्या आज हम वाकई जननेता चुन पा रहे हैं?चुने जाने के बाद जनप्रतिनिधियों पर जनता का कोई नियंत्रण नहीं रहता।यह स्थिति किसी एक स्तर पर नहीं, कमोबेश हर स्तर पर है। ग्राम पंचायत,जिला पंचायत, शहरी निकाय और विधानसभा से लेकर लोकसभा तक; प्रधान से लेकर प्रधानमंत्री तक। पंचायत स्तर पर पंचायत प्रधान को वापस बुलाने के अधिकार के बावजूद परिदृ्श्य अनियंत्रित जैसी ही है।क्या यह सच नहीं है कि हम अपने ही द्वारा चुने हुए जनप्रतिनिधि द्वारा शासित हो रहे हैं?यदि हां, तो खामी कहां हैं? हमारे चुनने में या चुनाव प्रणाली या चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में? इसका जवाब तलाशना चाहिए।संभवत: सुधार की जरूरत तीनो स्तर पर है। मतदान जागरुकता के तमाम अभियानों के बावजूद क्या यह सच नहीं है कि हमारे मतदान का आधार जाति, धर्म, वर्ण, वर्ग और निजी लाभ, प्रलोभन के इर्द-गिर्द सिमट गया है?क्या यह सच नहीं है कि धर्म-जाति-वर्ग-वर्ण आदि की छूत लगाये बगैर सत्ता में आना किसी भी दल के लिए असंभव हो गया है?प्रश्न यह है कि मतदान के चुनाव का आधार क्या हो, यह चुनाव आयोग तय करता है, उम्मीदवार या मतदाता? क्या यह सच नहीं है कि आज की पूरी चुनाव प्रक्रिया धनबल, बाहुबल,मीडिया और संवेदनशील मुद्दों के जरिए प्रभावित की जा रही है?क्या यह सच नहीं है कि भारतीय जनतंत्र जनता नहीं, अपराधी, धनपति और कट्टर ताकतों द्वारा संचालित किया जा रहा है? जन, जननेता और जननीति तो कहीं प्रभावी भूमिका निभा ही नहीं पा रहे।इस बात को काफी शिद्दत से महसूस किया जा रहा है कि चुनाव से पहले औरचुनाव के बाद की जिम्मेदारियों को लेकर मतदाताओं को जागरुक व सशक्त करने के काम को पूरे पांच साल और संगठित तरीके से करने की जरूरत है। यह कैसे हो सकता है?क्या पूरे देश में मतदाता परिषदों का गठन और उन्हे चुनाव आयोग द्वारा अधिकारिक मान्यता की मांग इस दिशा में पहली सीढ़ी हो सकती है? सुधार की दूसरी जरूरत चुनाव प्रणाली और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली में है। यह बात नई नहीं है। कई संगठनों द्वारा की गई शुरुआत जनमांग कैसे बने? जनसंसद इसमें अहम भूमिका निभा सकती है। चुनाव सुधार के मुद्दे को जनता के बीच ले जाकर हमें बताना पड़ेगा कि वर्तमान चुनाव प्रणाली की सबसे बड़ी खामी क्या है?क्या यह प्रणाली धनबल, बाहुबल, परिवारवाद, जातिवाद जैसे अलोकतांत्रिक कदमों पर रोक लगाती है? क्या यह विवेकपूर्ण मतदान को प्रोत्साहित करती है? क्या यह जनता तथा संविधान के प्रति जनप्रतिनिधियों को कर्तव्यनिष्ठऔर जवाबदेह बनने के लिए बाध्य करने में सक्षम है? क्या यह राजनीतिक अस्थिरता, दलबदलू प्रवृति आदि अनैतिक प्रवृतियों को रोकने में कारगर है? यदि नहीं तो इसका जिम्मेदार कौन है? क्या इसे बदल जाना चाहिए? यदि हां! तो इसका सही विकल्प क्या है? गम्भीर चिंता का बिषय यह भी है कि धनबल कैसे रुके? चुनावी खर्च कैसे कम हो? पैसा देकर टिकट लेना; पैसा देकर वोट हासिल करना कैसे खत्म हो? क्या इस दिशा में कोई उपाय किए गये हैं? क्या वे कारगर साबित हो रहे हैं? क्या सरकार द्वारा उम्मीदवार का खर्च वहन करने से यह संभव है? क्या उम्मीदवार की बजाय दल चुनने का सुझाया फार्मूला इसमें सहयोगी हो सकता है? आज हमें सोचने के लिए मजबूर होना पद रहा है कि परिवारवाद कैसे रुके? क्या परिवारवाद रुकना चाहिए? यदि हां , तो क्या इसके लिए राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र कायम करना एक कदम हो सकता है? क्या एक परिवार से एक ही सदस्य को चुनाव लडऩे की अनुमति से यह हो सकता है? क्या एक परिवार के एक ही सदस्य को दल का पदाधिकारी का प्रावधान होने से कुछ नियंत्रण होना संभव है? क्या यह लोकतांत्रिक होगा? यदि हां! तो क्या ऐसा करने की कमान चुनाव आयोग को सौंपी जानी चाहिए या और किसी संवैधानिक संस्था की जरूरत महसूस होती है? क्या पार्टी व्हिप जैसे कदम किसी भी दल के आंतरिक लोकतंत्र के खिलाफ व्यवस्था हैं? क्या इस पर रोक लगनी चाहिए? आज हर जागरूक जनता यह सोच रही है कि अपराधियों का प्रवेश कैसे रुके? जिन पर आरोप पत्र दाखिल कर दिया हो, क्या उन सभी की चुनाव में उम्मीदवारी प्रतिबंधित हो या इस में भी कुछ सीमा बनाई जानी चाहिए। जैसे यदि आरोप पत्र ऐसे अपराध के लिए दाखिल किया हो, जिसकी सजा न्यूनतम पांच वर्ष हो आदि आदि। क्या ऐसे प्रतिबंध पंचायत से लेकर हर स्तर के चुनाव पर होने चाहिए? क्या स्वयंसेवी, सामाजिक, सहकारी संगठनों में भी इनकी उम्मीदवारी पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए? प्रतिबंध सिर्फ उम्मीदवारी के लिए होने चाहिए या ऐसे लोगों को मतदान व आम सदस्यता से ही वंचित किया जाना चाहिए? चुनाव पश्चात् जनप्रतिनिधियों पर मतदाता का नियंत्रण कैसे हो? क्या राइट टू रिकाल इस दिशा में सही कदम है? इस कदम का कोई व्यापक दुष्प्रभाव तो नहीं है? क्या जनघोषणा पत्र इस दिशा में सहयोगी हो सकता है? यदि हां! तो जनघोषणा लागू करने के लिए चुने गये जनप्रतिनिधि को बाध्य करने के लिए किन संवैधानिक प्रावधानों की आवश्यकता होगी? ग्रामसभा से लेकर लोकसभा स्तर तक मतदाता परिषदों का संवैधानिक ढांचा बने। मतदाता परिषदें अपने-अपने स्तर पर अगले पांच वर्ष के काम व योजना तय करें और जनप्रतिनिधि तथा अधिकारियों को उस स्तर पर उसी योजना के क्रियान्वयन की इजाजत हो। मतदाता परिषदों को उनके इलाके में खर्च हुए हर पैसे के पब्लिक ऑडिट का अधिकार हो। क्या यह व्यवस्था होनी चाहिए? क्या इससे लक्ष्य मिल जायेगा? पांच वर्ष से पहले दोबारा चुनाव कराने की नौबत न आये। यह कैसे हो? क्या एमएमपीएस इसका उपाय है? क्या बहुदलीय सरकारों के स्थान पर एकदलीय सरकारें होनी चाहिए? यदि हां, तो कैसे हो? क्या राज्य और राष्ट्र स्तरीय दलों की मान्यता के लिए तय मानदंडों में बदलाव से यह संभव है? क्या एमएमपीएस से यह संभव होगा? क्या चुनाव पश्चात् गठबंधन पर रोक लगनी चाहिए? यदि हां! क्यों और कैसे? हमें सोचना पड़ेगा कि क्या चुनाव में सीटों का आरक्षण होना चाहिए? विवेकपूर्ण मतदान प्रतिशत कैसे बढ़े? क्या मतदान से पहले और बाद जागरुकता के सतत् अभियान चलाने से बात बन सकती है? क्या नो कैंडिटेट वोट इसका सही उपाय है? क्या आवश्यक मतदान इसका उपाय है? क्या मतदान न करने वाले मतदाता को कुछ अति आवश्यक सुविधाओं से वंचित करके उसे मतदान के लिए बाध्य किया जाना चाहिए? यदि हां ! तो किन-किन सुविधाओं से? विवेकपूर्ण मतदान के मद्देनजर क्या चुनाव की आचार संहिता लागू होने के दौरान उसके उल्लंघन के दोषी उम्मीदवार के साथ-साथ उससे निजी लाभ लेने वाले मतदाता को घूस लेने का दोषी मानकर दंडित किया जाना चाहिए? क्या मतदान का वर्तमान तरीका और माध्यम ठीक व पर्याप्त है? क्या मतदाता की न्यूनतम उम्र ठीक है? एक साथ अधिसूचित चुनावों के लिए मतदान एक ही दिन में होने चाहिए या कई दिन में? मतदान के लिए मतदाताओं को एक ही दिन दिया जाना चाहिए या एक से ज्यादा दिन में किसी एक दिन आकर मतदान का विकल्प देने से कोई फायदा होगा? आखिर अपने जनप्रतिनिधि का कैसे मूल्यांकन करें? क्या आपका जनप्रतिनिधि अपने पद की गरिमा व जिम्मेदारी समझता है? क्या उसकी शिक्षा अपनी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए पर्याप्त है? क्या उसने अपने चुनाव के समय चुनाव खर्चों के लिए निर्धारित धन से अधिक धन का उपयोग तो नहीं किया?उसकी आय के स्रोत क्या हैं?क्या वह पैसे/शराब व दावतों के बल पर चुनाव जीता है?क्या वह अपनी पद प्रतिष्ठा का प्रयोग अपने-अपने परिजनों, रिश्तेदार व दोस्तों के काम कराने के लिए तो नहीं करता?क्या उसकी संपत्ति अवैध धन/भूमि व्यापार आदि में आश्चर्यजनक वृद्धि तो नहीं हो रही?क्या वह स्थानीय हित व जनता की मांगों के लिए सरकारी अधिकारियों व सदन में आवास उठाता है? क्या वह चुनावी व पार्टी खर्चों के लिए चेक द्वारा जनता से दान लेता हे अथवा नकद धन स्वयं या व्यापारियों, उद्योगपतियों द्वारा लेता है? क्या वह अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों के घर जन्म, विवाह आदि समारोह में नकद पैसे बांटता है? यदि हाँ तो उसके इन पैसों का स्रोत क्या है?क्या उसने पैसे देकर तो टिकिट नहीं खरीदा था?क्या चुनाव से पूर्व भी निरंतर जनता के सम्पर्क में रहता था और जनहित के मुद्दों पर संघर्ष और अपनी प्रभावी भूमिका निभाता रहा?क्या उसमें नेतृत्व के पर्याप्त गुण अथवा अपने पारिवारिक सम्बन्धों, धन, बाहुबल आदि के दम पर राजनीति में उतरा है? क्या उसे सरकारी योजनाओं, उनमें आवंटित धन तथा जनता तक उसकी निरन्तर पहुँच की जानकारी है?क्या उसने जनता की मूल समस्याओं और उनके समाधान की कोई रूपरेखा तैयार की है?कहीं वह धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा के आधार पर तो वोट नहीं मांगता?कहीं वह ठेकों में, सदन में मत देते समय तथा अपने द्वारा आवंटित विशेष निधि में कमीशन तो नहीं मांगता?क्या वह अपने राजनीतिक दल में आंतरिक लोकतंत्र की स्वायतता के प्रति संवेदनशील है और सामूहिक नेतृत्व, सबसे सलाह लेते हुए काम करना पसन्द करता है?क्या वह कार्यकुशल व क्षमतावान कार्यकर्ताओं को प्रोत्साहित करता है तथा चमचागिरी व चापलूसी को अधिक महत्व देता है?कहीं वह राष्ट्रविरोधी नीतियों व गुटों को तो परोक्ष समर्थन व सहयोग तो नहीं दे रहा है? GOPAL PRASAD RTI ACTIVIST MOB:  09910341785 EMAIL: sampoornkranti@gmail.com

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