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मनोरोगियों की है अलग दुनियां : गोपाल प्रसाद




डा. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के मनोरोग विभाग में रोगियों की संवेदनाएं , वैचारिक आदान- प्रदान, मनोभाव, उल्लास-उमंग, सुख-दुःख, घृणा- अपनत्व व्यक्त करने के अजब- गजब तरीके हैं. यहाँ के हर मरीज के अलग-अलग लक्षण हैं. कई के तौर तरीके तथा लक्षण तो उनके नाम के अनुरूप हैं , परन्तु कई के लक्षण उसके नाम के बिलकुल विपरीत है. एक रोगी जिसका नाम शांति है , के महिला वार्ड में आते ही अशांति फैल गई. विलक्षणा नाम की रोगी हर डॉक्टर -नर्स से स्वयं को डिस्चार्ज करने एवं हर किसी से मोबाईल पर अपने पारिवारिक सदस्यों से बातचीत करवाने का आग्रह करने और जिन्दगी के यथार्थ दर्शन के अनुभवों को बाँटने का पुनीत कार्य कर रही है.

बेबी नाम से यह मत सोचिए की यह कोई बच्ची है. 32 साल की इस उग्र रोगी ने अपने पति के कमीज, बनियान फाड़ने, उनके सभी जरूरी कागजात के साथ-साथ अस्पताल में भर्ती होने के भी कागजात फाड़ने एवं पति के साथ अस्पताल परिसर में भी दुर्व्यवहार करने और अस्पताल से भाग जाने का उदाहरण प्रस्तुत कर चुकी है . जहाँ एक रोगी कई बार स्नान करती है एवं अस्पताल के बर्तन में खाना तक नहीं खाती , वहीं एक रोगी बिना पति के न तो खाना खाती है , न ही दवा लेती है. अपने पति का महिला डाक्टर या नर्स से बातचीत करना भी उसे पसंद नहीं. सबसे खास बात यह है की इन महिला रोगियों में एक दूसरे के प्रति डर, क्रोध ,घृणा, चिढ , वैमनस्यता तो रहती है , परन्तु जैसे-जैसे उनके तबियत में सुधार आता जाता है , ठीक उसी के अनुरूप दूसरे के प्रति आदर, प्रेम , संवेदना, सहयोग भी पनपने लगते हैं. एक दूसरे के लिए सुखमय एवं खुशाल जिन्दगी की कामना भी करते दिखाई देते हैं. आंसू, चीख, गुस्सा के बाद हंसी, खुशी, और प्रेम में परिवर्तन के सजीव माहौल स्पष्ट रूप से दर्शन होते हैं यहाँ.

इसी उतार -चढाव के बीच एक रोगी का मनोभाव , लक्षण वाकई उसके नाम के अनुरूप एवं सबों के लिए अनुकरणीय लगा. दिल्ली की नांगलोई इलाके की इस मरीज का नाम है - श्रीमती ममता प्रभाकर. ईश्वर के अनेक नाम , पूजा के विभिन्न मन्त्रों , प्रमुख समाचारों, सूक्तियां, (आदर्श वचन), महापुरुषों की वाणी, जीवन के मनोभावों को कॉपी पर उतारना एवं अन्य रोगियों में बांटना इनके दिनचर्या में शामिल है. अन्य महिला रोगियों को आचार-विचार , सुलक्षण, शिष्टाचार, परहेज की सीख देना ये अपना कर्तव्य समझती है. अपनी मनोभावों एवं संवेदनाओं को अक्सर कागजों पर उकेरने के साथ-साथ समय- समय पर कविता, दोहे, गीत, गजल, भजन आदि से भी इन्हें काफी लगाव है. महिला वार्ड की सभी रोगी , नर्स व डाक्टर इनकी प्रशंसा के पुल बांधते रहते हैं. प्रशंसा क्यों न हो , जब किसी रोगी को कोई समयबद्ध करे, अनुशासित करे, जीवन का सही सलीका सिखाए . इनके मनोभावों , लक्षणों , संवेदनाओं को उनके द्वारा लिखित कागजों पर से ही संकलित कर आपके समक्ष प्रस्तुत है...

ममता का दिल

मैं कहाँ लिखती हूँ

लिखते तो हैं अल्फाज मेरे

मानो ढूंढ ही लेते हैं

जर्रानवाज मेरे

लाल स्याही के लिए हमने

निचोड़ा खुद को

दिल के टुकडे भी चीख के

दे रहे आवाज मेरे ..... ( शुक्रवार, 28 .09 .2012)



(सूक्तियां)

गुप्तता: बुद्धिमान मनुष्य अपने धन- नाश , मनस्ताप, घर के दुस्चरित्र ,

धोखा खाने के प्रसंग तथा अपमान की बातों को प्रकाशित न करें........अज्ञात.

घृणा : वैर का आधार व्यक्तिगत होता है , घृणा का सार्वजानिक.......रामचंद्र शुक्ल.

जीवन : हमारे जीवन का ताना-बना मिलेजुले अच्छे बुरे धागों का है........शेक्सपियर.

ज्ञान और बुद्धि : ज्ञान का स्थान मस्तिष्क और बुद्धिमत्ता का स्थान ह्रदय में है ,

यदि हम अनुभव नहीं करते तो निश्चित ही गलत मूल्यांकन करेंगे....हैजलिट.

तथ्य : आंकड़ों की अपेक्षा तथ्य अधिक जोर से बोलते हैं.... स्ट्रीट फील्ड.

कृपणता :कंजूसी कला रंग है जिस पर दूसरा कोई रंग , चाहे कितना

ही चटख क्यों न हो , चढ़ नहीं सकता.....प्रेमचंद

चाटुकारिता : जिन्हें खुशामद प्रिय होती है , उन्हें सच्ची बातें मीठी भाषा

में भी कही जाए , तो भी कड़वी लगती है.....सरदार पटेल.

दुर्लभ प्रश्न : क्या मैं पागल हूँ या समझदार? मुझे डा. स्मिता देशपांडे जी से लिखित में चाहिए.

शब्द नहीं यातना : मुझसे अब मेंटल , पागल शब्द सहन नहीं होता .

क्यों और किसलिए : मैं यहाँ डा. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में क्यों लई गई और किसलिए?

मनोभाव जो बहुत कुछ कहती है : मैं यहाँ बहुत खुश हूँ . मुझे गरीब इंसान की सेवा करना बहुत

अच्छा लगता है. मैं यह चाहती हूँ की मेरी सेवा से अगर यहाँ खुशी मिलाती है तो , मैं यहाँ ही रहना चाहती हूँ .

ईश्वर से गुजारिश में भी खासियत : हे मां मैं ममता आपसे यह प्रार्थना करती हूँ की मुझे इतनी शक्ति

देना की मैं आपके आशीर्वाद को दुनियांवालों की झोली में डाल दूं.

विचारणीय प्रश्न : राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जन्मदिवस पर दो मिनट का मौन क्यों नहीं?

विचारणीय सुझाव : बेइज्जती की रोटी से इज्जत की मौत अच्छी .

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