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क्या हम स्वाधीन हैं ? : गोपाल प्रसाद





            आज देश अपनी आजादी की 65वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है . देश की जनता अपनी मांगों को लेकर सडकों पर है . अहिंसा के पुजारी बापू को तो हमने नहीं देखा परन्तु अब अहसास होता है की अहिंसा की लड़ाई में उन्हें क्या हम स्वाधीन हैं ?कितने दुःख देखने पड़े होंगे.  विदेश से आए अंग्रेजों को हमारे वतन, हमारे दुःख दर्द , देश के नागरिक से  कोई मतलब नहीं होना तो समझ में आता है , परन्तु आज हमारे देश के लोग , जिनके हाथ में सत्ता है , वे ही अपनी जनता की उचित मांगों को कुचलने में लगी है . देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति मूकदर्शक बने बैठे हैं . देश की क्षति हो रही है पर उन्हें दिखाई नहीं दे रही. भारत में कहने भर के लिए लोकतंत्र है , जहाँ जनता की आवाज को अनसुनी करना अथवा उनकी आवाज को कुचल दिया जाना ही नियति बन चुकी है. क्या यही लोकतंत्र है , जिसके लिए हमारे जांबाज क्रांतिकारियों को अपनी जान की बाजी लगानी पडी थी ? यदि ऐसा है तो हमें ऐसा लोकतंत्र  और ऐसा संविधान नहीं चाहिए . आज शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात कहने के लिए भी सरकार से इजाजत लेनी पड़ती है और सर\कार  रात  के अँधेरे में लोगों पर बर्बरतापूर्वक लाठी चार्ज करती है , आंसूं गैस छोडती है .  बाबा रामदेव के साथ हुए अन्याय को लोग भूल नहीं पाए  हैं . अन्ना हजारे के साथ वही इतिहास दोहराने की तैयारी में सरकार  की मंशा जान पड़ती है. आज लाखों लोग जेल जाने को तैयार हैं. बाबा रामदेव एवं अन्ना हजारे के आन्दोलनों ने जनता को जगाकर अपने अधिकार के प्रति सजग कर दिया है. इसका अंजाम चाहे कुछ भी हो परन्तु जनमानस में भ्रष्टाचार  के प्रति आक्रोश बढ़ा  है तथा भ्रष्ट व्यवस्था को उखाडने में निष्क्रिय सरकार  को उखाड  फेंकने का लोग मन बना लिए हैं. पेट्रोल, खाद्य -सामग्री, बिजली, पानी, किराया भाडा की कीमतों में उत्तरोतर वृद्धि हुई है. सरकार  मूल्य  नियंत्रित करने  , कालाबाजारी एवं अनुत्पादक खर्च रोकने के बजाय बेतहासा खर्च करने में आगे है. आम जनता की बुनियादी जरूरतों का सरकार को कोई मतलब नहीं है. हमारे नेतागण भ्रष्टाचार मिटाने की बात तो अवश्य करते हैं , पर उस दिशा में ईमानदारीपूर्वक प्रयास करने की कोई जरूरत नहीं समझी जाती है, क्योंकि सभी दल जनता के हितों के बजाय स्वहित में लगें है. जनसेवकों की आमदनी में बेतहाशा  इजाफा हो रहा है. क्या  सरकार  को यह मालूम नहीं है?सर्कार कालाधन वाले व्यक्तियों के नाम उजागर नहीं करना चाहती है. आखिर क्यों? ऐसा लगता है जैसे उसे आम जनता के बजाय कला धन के मालिकों से प्रेम हो गया है. देश के राजनैतिक पार्टियों को करोड़ों/ अरबों दान देनेवालों का ब्यौरा सरकार के पास उपलब्ध ही नहीं है. वह वही आंकड़ा दिखा रही है जो राजनैतिक पार्टियां बता रही है , अर्थात पता करने की कोई जरूरत ही नहीं. क्या इससे प्रतीत नहीं होता की सब कुछ गोलमाल है?
 केद्र सरकार के  550 अफसरशाह  एवं विभिन्न प्रदेशों के मंत्री, विधायक, संसद सदस्य अपने संपत्ति के ब्यौरे अभी तक  जमा नहीं कर पाए हैं. केन्द्र एवं राज्य सरकार के मंत्रालय एवं उनके अधीन आयोग औपचारिक भूमिका निभा रहे हैं. कोई करोड़ों /अरबों की राशि का खर्च  मूर्ती /पार्क  पर कर रहा है , तो कोई लाखों के शौचालय बनबा रहा है. लाखों भूखी  जनता जिसे दो वक्त की रोटी नसीब नहीं है उसे मोबाईल का सौगात दिया जा रहा है, जबकि उसकी जरूरत कुछ और है. झूठे आंकड़े और थोथी  दलील के बदौलत सरकार  फूट करो और राज करो की नीति पर चल रही है. राजधानी दिल्ली में 100 में से केवल 10 शिकायतों को ही फिर F I R  के  रूप में दर्ज किया जाता है. उपरोक्त सभी तथ्य  सूचना के अधिकार से उजागर हो चुका है. हमें इस तथ्य को गंभीरता पूर्वक समझाना पड़ेगा. आज आम जनता को जागना होगा और अपने हक के लिए सडकों पर आना होगा . यदि अब भी जनता चुप रही तो भ्रष्टाचार  का दानव उनको कब निगल जाएगा , पता भी नहीं चलेगा.  जनता को जनहित में स्वार्थ से परे हटकर अपने वोटों का प्रयोग सरकार  बदलने एवं भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ करने के लिए तैयार रहना चाहिए.
(लेखक आर टी आई एक्टिविस्ट हैं) 

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