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साहित्य जगत में "विश्व हिंदी साहित्य परिषद् का उदय"

साहित्य जगत में एक नवोदित संस्था का उदय हुआ है, जिसका नाम है-" विश्व हिंदी साहित्य परिषद् ". नाम के अनुरूप ही संस्था ने काम भी किया है. संस्था ने अपने प्रथम स्थापना दिवस समारोह प्रख्यात साहित्यकार जगदीश चतुर्वेदी के साहित्य में छह दशकीय योगदान पर उनके ही आवास पर परिचर्चा आयोजित करके किया. इस अवसर पर सुश्री सुनीता डागर द्वारा रचित काव्य संग्रह "कविता की डगर" का लोकार्पण भी हुआ. इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रसिद्ध साहित्यकार अजित कुमार एवं विशिष्ट अतिथि अनुभूति चतुर्वेदी थी.
विश्व हिंदी साहित्य परिषद् के अध्यक्ष आशीष कंधवे ने कार्यक्रम का सफल संचालन करते हुए कहा - परम आदरणीय जगदीश चतुर्वेदी के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देना तो अत्यंत दुष्कर कार्य है . मैं कोशिश करूंगा की जितनी भी जानकारी मेरे पास है वह सब आप से बाँट सकूं. जगदीशजी ने श्रमसाध्य जीवन अब तक व्यतीत किया है . इनकी साहित्य साधना अपूर्व है. इनकी कविताओं में राष्ट्रीय चेतना और व्यापक सांस्कृतिक दृष्टि है जो एक नए क्रांतिकारी युग का प्रतिनिधित्व भी करती है. इनकी कविता देश ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण विश्व में अकविता यानी एंटी पोएट्री के नाम से जानी जाती है ,इसलिए इन्हें अकविता का जनक कहा जाता है . इनकी वाणी का ओज और काव्य भाषा के तत्वों पर बल तथा उनके सात्विक मूल्यों का आग्रह इनको आधुनिक होने के साथ-साथ पारंपरिक रीतियों से भी जोड़े रखता है . इनकी कविताओं में समकालीन स्थितियों के प्रति उनकी भावनात्मक प्रतिक्रियाएं सशक्त रूप से प्रस्फुटित हुई है. जगदीश जी का काव्य के प्रति गहन चिंतन "दस्तावेज़" के रूप में हम सब के सामने अद्वितीय उदाहरण है. इन्होने हिंदी भाषा में लोकप्रियता के चोटी को छूने के साथ-साथ अहिन्दी भाषी जनता में भी उतने ही लोकप्रिय हैं क्योंकि इनका हिंदी प्रेम दूसरों की अपनी मातृभाषा के प्रति श्रद्धा और प्रेम का विरोधी नहीं बल्कि प्रेरक है. इन्होने भारतीय भाषाओँ को हिन्दी से जोड़ने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई . इनकी रचनात्मक कोशिशों के कारण भारतीय ही नहीं बल्कि विश्व के कई भाषाओँ के द्वारा हिन्दी को सम्मानित किया गया. इनके ऊपर कई महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों शोध कार्य किया गया है और किया जा रहा है.अभी तक देश- विदेश में इनके ऊपर 6 -7 पी.एच.डी. और डिलीट किया जा चुका है. यह गर्व का विषय है की भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए जो छात्र हिन्दी साहित्य विषय को चुनते हैं ,उन्हें एक विषय के रूप में अकविता को अनिवार्य रूप से पढ़ना पड़ेगा. ये 20 वीं शताब्दी की हिन्दी कविताओं के इतिहास पर भारतेंदु से लेकर नवम दशक तकएक ग्रन्थ निकालने जा रहे हैं जो आगामी 3 -4 महीनों में सामने होगा. यह ग्रथ हिन्दी कविता के क्षेत्र में निश्चित रूप से एक मील का पत्थर सिद्ध होगा.
इनका जन्म जनवरी सन 1932 को म.प्र. के ग्वालिअर शहर में हुआ था. ये शुरू से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी रहे हैं और साहित्य के प्रति इनकी अगाध अभिरुचि रही. इन्होने सन 1955 में उज्जैन विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर(हिन्दी) किया, फिर नागपुर विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रहे . सन 1959 -91 तक केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय में रहे तथा यहीं निदेशक के रूप में भी कार्य किया . ये प्रतिष्ठित पत्रिका भाषा एवं वार्षिकी के सन 86 -91 तक संपादक रहे. इन्होने कई बार भारत वर्ष की और से विदेशों में साहित्यिक प्रतिनिधि के रूप में यात्रा की है , जिनमें ग्रेट ब्रिटेन , इराक , साउथ कोरिया आदि प्रमुख है . इनके द्वारा रचित कई काव्य संग्रहों , कहानियों, उपन्यासों को कई भाषाओँ में अनुदित किया जा चुका है, जिनमें इंग्लिश फ्रेंच, पौलिस, बुल्गेरियन, अरबी, कोरियन, नेपाली आदि प्रमुख है. इनके रचनाधर्मिता को देखते हुए भारत सरकार ने सन 2003 में पद्मश्री से सम्मानित किया. इसके अलावा इनको सन 1996 में अज्ञेय राष्ट्रीय सम्मान (रा. हिन्दी अकादेमी ) , सन 1995 में अक्षर आदित्य सम्मान (म.प्र.) , सन 1990 में पेगासस गोल्ड मेडल (बुल्गारिया लेखक संघ) , सन 1989 में प्रियदर्शिनी सम्मान (मुम्बई अकादेमी) , सन 1987 में साहित्यकार सम्मान (हिन्दी अकादेमी दिल्ली),सन 1979 में उ.प्र. हिन्दी संसथान सम्मान , सन 1976 में उ.प्र. हिन्दी संसथान सम्मान (सुर्यपुत्र के लिए) एवं सन 1970 में अखिल भारतीय सूर पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है. इनकी प्रायः सभी कृतियाँ बहुचर्चित रही है लेकिन उनमें मुख्य रूप से विजय, इतिहासहन्ता ,सूर्यपुत्र, पूर्वाराग, नए मसीहे का जन्म -कहीं कुछ कुरेदता है मुझे , जगदीश चतुर्वेदी रचनावली (6 खण्डों में) तथा कहानी संग्रह के रूप में जीवन का संघर्ष , निहंग, अन्धयुग का आदमी, विवर्त एवं उपन्यास (कनाट प्लेस) ,नाटक (कपास के फूल ) आदि काफी चर्चित है.
संस्था के अध्यक्ष आशीष कंधवे ने जगदीश चतुर्वेदी की तरफ इशारा करते हुए कहा की हमारे सामने जो चुपचाप मौन समाधिस्त व्यक्ति बैठा है , वह मानवतावादी मूल्यों का उपासक एवं साहित्य का सच्चा साधक है. इतिहास इनके अतुलनीय योगदान के लिए सदा आभारी रहेगा तथा हम सब बीसवीं शताब्दी के इस ओजस्वी -तेजस्वी विभूति के दीर्घायु होने की कामना करते हैं. इस मौके पर अनुभूति चतुर्वेदी ने कहा की जगदीश चतुर्वेदी की पुत्री होने का मुझे गर्व है. मैं अपेक्षा करूंगी की उनकी साहित्यिक विरासत को सहेजने, सवांरने का कठिन कार्य सभी के सहयोग से अवश्य पूरा करूँ. आप सभी मनीषीयों के शुभकामनाओं के बदौलत ही मेरे पिता को एक नई जिन्दगी मिली है और वे कोमा से पुनः वापस आ गए है. यह आप सभी के प्रार्थना और दुआओं का ही असर है.
सूचना का अधिकार कार्यकर्ता गोपाल प्रसाद ने कहा की मुझे अनुभूति जी से यह प्रेरणा मिलती है की किस तरह विरासत को सहेजा और बचाया जाय . अपने गृहस्थी से समय निकलकर वृद्ध माता- पिता की सेवा और उनके सपनों को साकार करने की कला हमें इनसे सीखने को मिली है. कुर्सी से हटने के बाद जहाँ एक और साहित्यकारों की घोर उपेक्षा हो रही है वहीं दूसरी और विश्व हिन्दी साहित्य परिषद् ने पद्मश्री जगदीश चतुर्वेदी के आवास पर कार्यक्रम आयोजित करके साहित्यिक ट्रैक को एक नई दिशा देने का अनुकरणीय प्रयास किया है, जो वास्तव में प्रेरणा योग्य है.
इस पावन अवसर पर जगदीशजी के एक कवितापाठ से कार्यक्रम का विराम हुआ .
"शब्द मेरे गीत बन जाए
कथा का रूप धर ले
नित्य के व्यवहार को अभिव्यक्ति दें या
शून्य में खो जाए
तो क्या हुआ
यह तो प्रकृति है ------ "
इस कार्यक्रम में जगदीश चतुर्वेदी के अलावे उनकी अर्धांगिनी कौशल्या चतुर्वेदी, उनकी सुपुत्री अनुभूति चतुर्वेदी ,अजित कुमार , आशीष कंधवे ,ममता गोयनका ,विनोद अग्रवाल, नीलांजन बैनर्जी, मुन्ना पाठक , अखिलेश गुप्ता, सुनीता डागर,सुशील बंसल एवं गोपाल प्रसाद आदि की उल्लेखनीय भूमिका रही.

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