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मेघनाद साहा का पत्र गोपाल प्रसाद आरटीआई एक्टिविस्ट के नाम

नई दिल्ली 14 .02 .2011 . समीपेषु : श्री गोपाल प्रसाद बाबुसाहब, तुम याद तो आते ही हो मगर आज मुझे विवश करते हुए बहुत याद आ रहे हो . इसलिए वार्तालाप से अपारग होकर मैंने लेखनी उठाई है .दरअसल बीते दिन रविवार को टी.वी. पर एक कार्यक्रम देखा और गहन मनोयोग के साथ सुना .हाँ ,दूरदर्शन राष्ट्रीय प्रसारण के कार्यक्रम "जानने का हक " दोपहर के तीन बजे से देख रहे थे . अधीर आग्रह के साथ साँस रोककर हमलोग इंतिजार कर रहे थे. अंततः जो सूचना मिली थी ,उसकी सच्चाई भरी इंटरव्यू के जरिए पाए. जो खबरें अंगरेजी और हिंदी समाचारपत्रों में आई थी वह सब पढ़कर हमलोग अत्यंत दुखी हुए थे -"अशोक विहार के सत्यवती कॉलेज के हाते में जघन्य रूप से हरे - भरे जीवंत पेड़ों को काटा गया." एक शैक्षिक प्रतिष्ठान के अधिकारी ऐसा कैसे कर सकते हैं-सोचना हमारे लिए संभव नहीं हो पा रहा था . मगर जान लो ,सुन लो -हम खुश थे ,क्योंकि तुम परमेश्वर की असीम अनुकम्पा से कुछ आक्रमणकारियों के हाथों से बच पाए. हम देशवासी वाकई खुश हुए थे , इसके लिए और उस साहसी महिमामयी नारी के लिए भी जो उस दिन उसी समय उन दुष्कर्मियों के हाथों हत्या होते होते बच गयी थी और तुम दोनों के जीवनहानि होते-होते बच जाने से तुम्हारे निकटजनों को ,परिचित -अपरिचितों को अत्यंत आनंद मिला ही होगा . फरवरी के तीन तारीख को समाचारपत्रों में अधूरे खबर पढ़कर ही सब के दिल धंस गए थे -आज तो सोंचते हुए भी रोंगटे खरे हो जा रहें हैं. गतकाल भारत सरकारके दूरदर्शन चैनल पर गोपाल प्रसाद तुम्हारे और श्रीमती नंदा सावंत के साक्षात्कार प्रत्यक्ष कर हम बहुत कुछ जान पाए . मैं निश्चित हूँ की मेरी तरह सब के हृदयों में यह तांडव घृणा के रूप में तिरस्कृत हुए होंगे . फिर दूरदर्शन के कर्त्पक्षों के प्रदर्शन से साफ-साफ पता चला है कि तुम्हारा और श्रीमती नंदा सावंत के यह दु:साहसिक विरिध प्रदर्शन उन्हें गर्वित किया है. अतः सरकार भी आपके ऐसे पुण्यकर्मों से प्रभावित होकर आपके साथ है -इसमें कोइ संदेह नहीं . कम से कम यह तो संभव हो सका कि सरकारी उद्यम "सूचना तथा प्रसारण विभाग " तुम दोनों पर हमला करने वालों की निंदा की .मगर यथार्थ रूप से सब कुछ सूचित नहीं हुआ .हम ,आप को करीब से जानने वाले तो आप से पूछकर जान पाएँगे ,बांकी कुछ और लोग भी हमसे सूचना प्राप्त करेंगे -किन्तु जनसमुदाय नहीं जान पाएँगे. यह ठीक बात नहीं है क्योंकि जब तुमलोग इस तरह से जान हथेली पर लिए सरे देश में फैले अंधकार दूर हटाने का शपथ लिए हो -तब देश के हर कोने से दल के दल नौजवानों को ,नवयुवतियों को ऐसे महान कर्मों में अवश्य ही साथ देना चाहिए .दिल के हर अंश में डंके की चोट पा रहा हूँ -क्योंकि सोंच कर भी समझ में नहीं आता कि कैसे उस कॉलेज के विद्यार्थियों पर उन पेड़ों को कटवाने का प्रभाव ही नहीं पड़ा?....ऐसी शीतलता ! हाय परमेश्वर ...ओ परवरदीगार !! उनका स्मरण तथा ध्यान करते हुए सत्य कथा कह रहा हूँ कि ,'बाबू गोपाल तुम्हारे लिए तो सावित्री मिल जाती मगर उस नारी के चलते क्या होता? प्रलय नृत्य शुरू कर देता एक ' राजा '-चाहे भाग्यवती या गुणवती महाविद्यालय का प्रांगण क्यों न हो !सरे विद्यार्थीगण भी समवेत होकर ' नटनृत्य -प्रलय नर्तन 'आरम्भ कर देते .फिर ?...मार गंडासा ,मार त्रिशूल ...जैसे प्रहार वज्र से ,उन्मूलन पवन देव से ! हाँ ,तुम दोनों बचे ,तो बच गयी यहाँ की सामाजिक स्थिति -अन्यथा कुछ भयंकर घटना घट जाती तो यहाँ की धरती पर मातम छा जाता .सारे राजस्थान के वासी यहाँ आ जुटते ....सारे उत्तरप्रदेशी उमर -घुमड़ कर आ जाते ...और?सारे बिहारी बाबु यहाँ आकर आंधी उठाते !हर तरफ गूंजती दलितों के विक्रम की भाषा पर्यावरण की रक्षा के लिए -'पेड़ों को बचाओ -प्रकृति बचाओ !'-नारे. अतः कहता हूँ :"संवेदनशील व्यक्ति या गोष्ठी ,स्वभावतः केवल मात्र मानवाधिकार रक्षा के लिए ,दुखियारों पर हो रहे अत्याचारों को बंद करने के लिए -तथा भ्रष्टाचार जड़ से उखाड़ाने के लिए तत्पर नहीं होते ;वरन चरित्र अनुयायी बन जाते हैं स्वयं शोषित ...दलित भी .रहा नहीं जाता उन लोगों से -लुगाइयों से और स्वेच्क्षा से बन जाते हैं सुधारक .दृढ -कर्मठ -क्रांतिकारी -निडर युवक-युवती !" हाँ ऐसा ही है . फिर हो रहे दुष्कर्मों की खबरें उन्हें मिल ही जाती है ,और गहन जानकारी के लिए निकल पड़ते हैं दुष्कृतियों के आलयों पर दृढ़ता के साथ आहटें देने के लिए . फिर यह भी गर्व की बात है कि सरकार की ओर से ' जानने का अधिकार ' सब को है. अतः वर्तमान काल के समाज से फिर अनुरोध करता हूँ :'सावधान दलित -दुखियारों को और ण तड़पाओ !!'आप कहेंगे :'कहाँ,कोइ किसी को तड़पा रहा है ?...कटे तो हैं सिर्फ चंद पेड़ों को !बस इसके लिए नानी मारी ?' शाबाश दुष्कर्म -जगत के आधुनिक रावणों ! नए आकार में आज भी हो !! महातीखी गली न देते हुए कह रहा हूँ कि : 'अबे ! उफ तक नहीं करते इसलिए पेड़ -पौधों को काटकर प्रकृति का विनाश करोगे ?...सावधान पृथ्वी तप रही है !पेड़-पौधों को ण काटो !! बहुत हो गया ,अब दिन आ रहें हैं जब एक काटोगे तो तो अपना गर्दन खोओगे . गजब है , जो ऐसा करने के लिए मन करने जाती /जाता है उनकी हत्या करने हावी होते हो !...सावधान ,महान अनिष्ट की संभावना है ...सावधान पृथ्वी तप रही है !' और श्री गोपाल प्रसाद ,आप से निवेदन है कि जो कुछ भी हुआ उसके कारण उदास न होना . हरप्रभ होने का प्रयोजन ही नहीं -सारा जमाना तुम्हारा तथा श्रीमती नंदा सावंत के साथ है. भविष्य में और करीब होंगे . ऐसे में तो तुम्हे असीम खुशी हासिल होनी चाहिए क्योंकि हम जनगण को पता चल गया है कि गत 3 फरवरी के दोपहर को सूचना मिलते ही सरकार के प्रशासन - कर्माधिकारीगण किस तरह से तत्पर हुए थे और कुछ ही अन्तराल में घटनास्थल पर जा पहुंचे थे . परमाराध्य देव- देवियों से नियत प्रार्थनारत रहूँगा कि सेवारत कनिष्ठ तथा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी महोदयों का सम्पूर्ण सहारा सर्वदा आप पर रहे ...आप जैसे नौजवानों ,नवयुवतियों पर रहे . सारे भारत में तमाम सेवानिवृत प्रशासनिक तथा अन्यान्य वरिष्ठ अधिकारीगण से निवेदन करता हूँ कि इस दिशा में उनके ह्रदय और संवेदनशील बनें , और वे सम्मिलित होकर वीरदर्प के साथ , प्रत्यक्ष रूप से आप जैसे समाज सेवियों के साथ रहें, सहारा दें. इसलिए ,सुनो श्री गोपाल श्रीमती नंदा : 'दुखी न होकर प्रकृति विनाश्कारियों से और गहरा सम्बन्ध स्थापित करना होगा . उन्हें यथार्थ रूप से प्रकृतिप्रेमी बनाना होगा अन्यथा हानि करने कि आदत वे नहीं छोड़ेंगे. सब को पूर्ण विश्वास है कि वह दिन दूर नहीं जब वे लोग तुम्हारे प्रयासों को समझ पाएँगे और सहयोगी बन जाएँगे! उदहारणस्वरुप सैवात्र सूचना देनी होगी कि निर्माणस्थलों में वृक्षों को काटना ही पड़ेगा ,ऐसी बात नहीं है . सब की रक्षा करते हुए अनायास निर्माणकार्य चलाया जा सकता है . अनुरोध करता हूँ कि नई दिल्ली स्थित अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के समीप निर्माणाधीन कार्यक्षेत्र पर एक बार आओ और यथार्थ रूप से जांचो किस मानवदरदी भावना के साथ उपवन बगैर विनष्ट किए वहां भवन बनाया जा रहा है . आशा है इसे और ऐसे कार्यस्थलों को जाँचकर तुमलोग जनगण को यथोचित सन्देश दोगे . परियोजना , प्रकृति विनाश के लिए नहीं है!! अंत में एक वक्तव्य रखना चाहता हूँ , : ' पर्यावरण तथा प्रकृति का आँचल की रक्षा करने के लिए अवश्य ही जनजागृति की जरूरत है -और इस दिशा में जनता की छह दृश्य -मन से होनी चाहिए..' जनचेतना जगाने के लिए मैं श्री गोपाल प्रसाद से अनुरोध करता हूँ कि मत भूलें , :' सावधान पृथ्वी तप रही है !' हाँ, आप ही द्वारा प्रकाशित यथार्थवादी नाट्य-साहित्य जनित यह पुस्तक 'सावधान पृथ्वी तप रही है !' के बारे में कह रहा हूँ , अनुरोध करता हूँ श्रीमती नंदा सावंत को और श्री राजा को कि इस नाटक को मंचन करें ! जनचेतना बढाएँ क्योंकि नाट्यकला -गीत नृत्य -धर्म दृश्यकला के आप पुजारी हैं .श्री गोपाल से भी मिन्नत कर रहा हूँ कि ,:'उनका प्रयास इस तरह से नाट्यमंच के माध्यम से और सशक्त होकर करवाएं , सहारा दें ..इस संकल्प में सफल होने के लिए यथार्थ सरकारी विभागों में दरबार करें !!" आशा तो है ही -निश्चित हूँ तुमलोग सफलता प्राप्त करोगे . ईश्वर मंगलमय हैं ...सदा निहारते हैं साईं ...आशीर्वाद देते हैं हरि-हर !... बख्शते हैं परवरदीगार !! इति :-- अनेक शुभकामनाओं के साथ , मेघनाद राजा

Comments

  1. आपके ब्लॉग पे आया
    बहुत ही बढ़िया पोस्ट है
    बहुत बहुत धन्यवाद|
    यहाँ भी आयें|
    यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो फालोवर अवश्य बने .साथ ही अपने सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ . हमारा पता है ... www.akashsingh307.blogspot.com

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