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पर्यावरण संरक्षण हेतु जनचेतना का सजीव चित्रण

कोपेनहेगन में जलवायु परिवर्तन रोकने की दिशा में समझौता कहा जाने वाला मसौदा कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होने, कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए बगैर लक्ष्य जैसा रहा । आश्‍चर्य की बात यह है कि विकसित देशों ने दो दशक पूर्व ही पर्यावरण असंतुलन को लेकर चिंतित थे परन्तु यह मात्र चिंता ही बनकर रह गई । विकसित देश कार्बन उत्सर्जन में आगे रहते हैं और उसे कम करने में पीछे हो जाते हैं । धीरे-धीरे पर्यावरण के समक्ष चुनौतियाँ कठिन होती जा रही है । विश्‍व के प्रमुख देशों द्वारा पर्यावरण की अनदेखी कर संसाधनों के बेतहाशा दोहन में तो संलग्न हैं ही साथ ही वे हानिकारक गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने की दिशा में पहल भी नहीं कर रहे हैं । विकास के नाम पर पर्यावरण की जान बूझकर उपएक्षा तथा विलासी जीवनशैली की प्रवृत्ति संपूर्ण विश्‍व के लिए घातक है । अंततः जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम सभी को भुगतने पड़ेंगे । हमारा देश भी इस प्रवृत्ति से वंचित नहीं है । हमें सर्वप्रथम पर्यावरण को क्षति पहुँचानेवाले कारणों की समीक्षा तथा जनचेतना की आवश्यकता है । एक तरफ जहाँ हिमालय पर्वत की चोटिओं के बर्फ तेजी से पिघलकर बाढ का तांडव कर सकती है वहीं दूसरी तरफ बढते गर्मी के कारण फसल चक्र भी कुप्रभावित हो सकता हैं । समुद्री जलस्तर की बढ़ोत्तरी से तो मालद्वीप का नामोनिशान मिट जाएगा तथा बांग्लादेश भी बाढ़ में डूब सकता है । ऐसी स्थिति में आने वाले २५ वर्षों में भारतीय उपमहाद्वीप में करोड़ों लोगों को पलायन करना पड़ सकता है । यह पलायन हमारे समाज के समक्ष तो एक चुनौती हैं ही, साथ ही यह देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए भी घातक है । भारत को पर्यावरण संरक्षण का कहर समर्थक बनना पड़ेगा । विश्‍वगुरू बनाने का संकल्प दिलाने वालों को सर्वप्रथम देशवासियों में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनचेतना जगाने की परम आवश्यकता है । वर्तमान में मूल समस्या एकमात्र यही है कि देश की अधिकांश जनता पर्यावरण असंतुलन से होनेवाले नुकसान से अवगत ही नहीं है । ठोस उपायों पर अमल किए बिना जलवायु परिवर्तन रोक पाना दिवास्वप्न ही है ।
satyamev jayate prakashan dwara prakashit गर्गऋषि शांतनु द्वारा प्रस्तुत पुस्तक “सावधान- पृथ्वी तप रही है!” पर्यावरण संरक्षण के प्रति लिखित जनजागरण हेतु नाटक विधा को आधार देगी । निश्‍चित रूप से यह पुस्तक सभी पाठकों, में जनचेतना का स्वर देने में सक्षम होगी जिसकी आज परमावश्यकता है । सभी पर्यावरणविदों शिक्षार्थियों, अध्यापकों एवं प्रकृतिप्रेमियों के लिए यह एक अनूठा कृति साबित गोगी, यह हमारा विश्‍वास है ।
- गोपाल प्रसाद (प्रकाशक)

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