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नए वर्ष में ले नया संकल्प

अब हम नए वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं । नए दशक में प्रवेश के साथ ही हमें नए संकल्प भी लेने होंगे क्योंकि बगैर संकल्प लिए भारत को महाशक्‍ति बनाने का मंसूबा अधुरा ही रह जाएगा । पिछले वर्षों में हमलोगों ने बहुत सारी समस्याओं पर चिंतन-मनन किया पर नए वर्ष में हमें केवल और केवल समाधान ढूँढकर भी कहा है कि “अगर समस्या है तो उसका समाधान भी है । ” सभी क्षेत्रों में सफल देशों की सूची में भारत का नाम तभी शामिल हो सकता है जब इस देश के नागरिक नई मानसिकता, नई तकनीक, नई ऊर्जा एवं नए दृढ़संकल्प के साथ देश को अग्रणी बनाने में अपना योगदान देंगे । निश्‍चित रूप से यह कठिन है मगर असंभव नहीं । सकारात्मकता के लीक पर चलकर हम इसे निश्‍चित रूप से पूरा कर सकते हैं । राष्ट्र के सर्वागीण विकास हेतु आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, आध्यात्मिक एवं नैतिक पुनर्जागरण की आवश्यकता है । आर्थिक सुधार एवं विकास का फायदा जनसंख्या के बड़े भाग को मिले, यह हमें सुनिश्‍चित करना होगा । ऐसा देखा गया है कि ज्यादातर योजनाएँ सुविधा संपन्‍न वर्गों के हित में ही होती है जबकि देश के विकास में सभी वर्गों का सम्मान योगदान है । क्या सरकार के खजाने में गरीबों से वसूली गई कर शामिल नहीं है? फिर उनकी उपेक्षा क्यों? गरीबों के खून-पसीने की कमाई रूपी टैक्स का उपयोग नेताओं, अफसरों के नाजायज खर्चों पर ना हो यह कौन सुनिश्‍चित करेगा? यह कैसी मानसिकता है कि एक आम नागरिक से वसूली गई कर रूपी राशि के इस्तेमाल हेतु फैसलों में उनकी कोई भूमिका नहीं होती ।
हमारे देश की अधिकांश विकास परियोजनाएँ लेटलतीफी की शिकार है । वास्तव में उपयुक्‍त सुधार हेतु व्यापक संतुलन और समयसीमा का निर्धारण अतिआवश्यक है । हमें अपनी पुरानी कार्यशैली के स्थान पर “सिंगल विंडो सिस्टम” और हाइटेक तरीके अपनाने पड़ेगे । आगे बढ़ने के लिए सहभागिता, सहकारिता एवं समन्वय को अपनाना ही पड़ेगा इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है संवेदनशील होना क्योंकि “जब-जब संवेदना खत्म होती है, तब-तब युद्ध होता है । जरूरतमंद लोगों के प्रति हमें और अधिक संवेदनशील होने चाहिए सामाजिक उत्तरदायित्व क अनिर्वहन करके ही वास्तविक समृद्धि लाई जा सकती है । वास्तव में राजनैतिक सुधार, सामाजिक सुधार एवं न्यायिक सुधार एक दूसरे से संबद्ध हैं । देरी से मिली न्याय से विद्रोह होना ही है और इस बात को देश के मुख्य न्यायाधीश भी स्वीकार कर चुके हैं । त्वरित सुधार संभव है । हमें समस्या नहीं बल्कि समस्याओं के जड़ों को देखना होगा । जमीनी स्तर पर समस्याओं के निदान के बिना सब कुछ बेकार है । उदाहरण स्वरुप गंगा एवं यमुना नदी को ही लीजिए । इन नदियों को प्रदूषणमुक्‍त करने के नाम पर करोड़ों-अरबों की राशि खर्च कर दी गई, परन्तु समस्या जस की तस है फिर भी मंत्री बयान दे रहे हैं कि गंगा-यमुना को प्रदूषणमुक्‍त कर देंगे । क्या प्रदूषणमुक्‍त करने के लिए अब उनके पास कोई अलादीन का चिराग मिल गया है । गंगा के उद्‌गम स्थल गंगोत्री के पास गंगा को बाधित कर डैम बनाकर गंगा को मृत करने की साजिश से बिजली पैदा हो ना हो राजनेता ठेकादों के जेब निश्‍चित रूप से गर्म होंगे । क्या गंगा केवल नदी है? यह राष्ट्रीय नदी हमारे देश की संस्कृति और हमारी अस्मिता है । जिसे नष्ट करने पर राजनेता, अफसर ठेकेदारों ने कमर कस ली है । देश के बुद्धिजीवियों पर्यावरणविदों, चिंतकों एवं आंदोलनकारियों को गंगा की अविरलधारा को अक्षण्ण बनाने हेतु पुनः एक भागीरथी प्रयास करने होंगे । सरकार की कथनी एवं करनी में एकरूपता नहीं हैं । वास्तव में नीति और नीयत दोनों में खोट होने के कारण ही सारी समस्याएँ बढ़ रही है । जो नदी पनबिजली हेतु उपयुक्‍त नही हैं उसे रोककर पर्यावरण असंतुलित करके अनेक समस्याओं को आमंत्रित कर दिया है । आपको गंगा की सौगंध है कि नए वर्ष में आप गंगा को मुक्‍त करने का प्रण अवश्य लें ।

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