Skip to main content

शिक्षा में हिंदू संस्कृति का विशेष ध्यान रखते हैं आर० पी० मलिक

पूर्वी दिल्ली के ख्यातिप्राप्त लवली पब्लिक स्कूल के निदेशक आर०पी० मलिक बच्चों की शिक्षा एवं स्वास्थ्य के प्रति काफी गंभीर रहते हैं । गोपाल प्रसाद द्वारा लिए गए साक्षात्कार के प्रमुख अंश ः-
हमारा प्रथम प्रयास होता है कि बच्चे ठीक-ठाक आएँ और चले जाँय तथा स्वस्थ हों क्योंकि जब स्वस्थ होंगे तभी पढ़ाई करेंगे । हमलोग योग, प्राणायाम, सूर्य प्रणाम और आध्यात्मिक शिक्षा पर विशेष ध्यान देते हैं जिससे बच्चे स्वाभाविक रूप से अच्छे होंगे । हम हिंदू संस्कृति पर विशेष जोर देते हैं । बच्चे बोर ना हों, इसके लिए शिक्षा के साथ-साथ मनोरंजन एवं खेल भी आवश्यक है । विद्यालय में आध्यात्मिक संतों एवं योगाचार्यों के संदेश का लाभ सबों को मिले, इस पर भी हमारा झुकाव रहता है । आशाराम बापू एवं सुधांशुजी हमारे यहाँ पधार भी चुके हैं । आज बच्चों को भी संस्कार एवं आस्था चैनल के कार्यक्रमों को देखने चाहिए । आज के बच्चे पहले से काफी जागृत हैं । बच्चों के जागरूक होने के कारण ही वे सुनते सबकीं है परन्तु करते अपने मन की हैं ।
हमारे देश में विद्यालय का वातावरण घर में जाता है जबकि पश्‍चिमी देशों में स्थिति ठीक इसके उलट है । भारतीय संस्कृति एवं मूल्यों को बचाने की आज आवश्यकता है । बच्चों के ऊपर से किताबी बोझ घटाने के लिए हमारे विद्यालय में रैक सिस्टम विकसित की गई है । केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल द्वारा पाठ्‌यक्रम बदलाव के संदर्भ में वे कहते हैं कि “ग्रेडिंग सिस्टम गलत है । प्राचार्य/निदेशक के स्थान पर संबंधित विषय के शिक्षकों का सुझाव पाठ्‌यक्रम बदलाव के संबंध में लिया जाना चाहिए । ”

Comments

Popular posts from this blog

वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चों को एक परिपक्व इन्सान बनाना होता है, ताकि वो कल्पनाशील, वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और देश का भावी कर्णधार बन सकें, किन्तु भारतीय शिक्षा पद्धति अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त कर सकी है, कारण बहुत सारे हैं । सबसे पहला तो यही कि अंगूठाछाप लोग डिसा‌इड करते हैं कि बच्चों को क्या पढ़ना चाहिये, जो कुछ शिक्षाविद्‍ हैं वो अपने दायरे और विचारधारा‌ओं से बंधे हैं, और उनसे निकलने या कुछ नया सोचने से डरते हैं, ऊपर से राजनीतिज्ञों का अपना एजेन्डा होता है, कुल मिलाकर शिक्षा पद्धति की ऐसी तैसी करने के लिये सभी लोग चारों तरफ से आक्रमण कर रहे हैं, और ऊपर से तुर्रा ये कि ये सभी लोग समझते हैं कि सिर्फ वे ही शिक्षा का सही मार्गदर्शन कर रहे हैं, जबकि दर‌असल ये ही लोग उसकी मां बहन कर रहे हैं । मैं किसी एक पर दोषारोपण नहीं करना चाहता, शिक्षा पद्धति की रूपरेखा बनाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिये और सोचना चाहिये, कि क्या उसमें मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है। आज हम रट्टामार छात्र को पैदा कर रहे हैं, लेकिन वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और परिपक्व छात्र नहीं, क्या यही हमा…

राजनीति में भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार और राजनीति का एक गहरा संबंध है । जहां हम विकास की एक नई गाथा को रचने का सपना संजोए हुए हैं वहीं दुनिया के सामने हमारी गरीबी की सच्चाई को स्लमडॉग मिलेनियर जैसी फिल्मों के सहारे परोसा जा रहा है । आज हम भ्रष्टाचार के मामले में बंग्लादेश, श्रीलंका से भी आगे हैं ।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री सह सांसद मधुकोड़ा का मामला भ्रष्टाचार के मामले में सामने आया है । जिसमें ४ हजार करोड़ के घपले का पता चला है । कोड़ा का नाम भी उन राजनेताओं में जुड़ गया है जो भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाये गए हैं या घिरे हुए हैं । भ्रष्टाचार को फैलाने वाले राक्षस सत्ता में आसीन राजनीति के शीर्ष नेता हैं इसकी शुरूआत भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय से ही हो गई थी । १९५६ में खाद्यान्‍न मंत्रालय में करोड़ों रूपये की गड़बड़ी पकड़ी गई । जिसे सिराजुद्दीन काँड के नाम से जाना जाता है । उस समय केशवदेव मालवीय खाद्यान्‍न मंत्री थे उन्हें दोषी पाया गया । १९५८ में भारतीय जीवन बीमा में मुंधरा काँड हुआ जिसकी फिरोज गाँधी ने पोल खोली थी । १९६४ में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए “संथानम कमिटी” का गठन किया गया ।…

एक आरटीआई एक्टिविस्ट के संघर्ष की कहानी, उसी की जुबानी

पिताजी गुरु भी थे। गरीबी, प्राइवेट ट्यूशन वगैरह करके आजीविका चलाते; परिवार चलाने के साथ-साथ सारे समाज, देश की चिंता उनका प्रमुख स्वभाव रहा। हमेशा दूसरों से कुछ अलग करने की चाह; सीमित संसाधनों में भी देश, समाज और मित्रों के लिए समय निकालना; शायद उनका यही स्वभाव मेरे मस्तिष्क में रच-बस गया, कार्यशैली का हिस्सा बन गया। छात्र जीवन बहुत फाकाकशी, गरीबी का रहा, लेकिन मेरे पिताजी ने अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया। हमारे मकान का धरन (कड़ी) लकड़ी का था, जो टूट गया था। उसी पर पूरे छत का लोड था। मकान कब गिर जाय, कुछ ठिकाना नहीं।प्लास्टिक के टेंट लगाकर रहते थे। कभी घर में चूल्हा भी नहीं जलता था। ऐसी ही परिस्थितियों में एक बार गुल्लक तोड़ा, तो पाँच रुपए निकले। उन्हीं से दो किलो चूड़ा लाया था। उसी को भिंगोकर, नमक-मिर्च लगाकर सपरिवार ग्रहण किया। अपनी शादी बिना तिलक-दहेज के की। दो बहनों की शादी आज से बीस साल पहले दिल्ली में मात्र सत्रह हजार की मामूली रकम में ही की। दोनों बहनों की शादी एक ही तिथि में किया। हमारे समाज (अखिल भारतीय खटिक समाज) के जो राष्ट्रीय पदाधिकारी थे, उन्होंने अपना मकान पंद्…