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विकास के नाम पर बांघ निर्माण बहुत बड़ा धोखा

क्यों बन रही हैं बांघ परियोजनाएं?

* आज देश के कुल स्थापित ऊर्जा लगभग १,४०,००० मेगावाट है । इसी प्रकार लौहारीनाग-पाला (६०० मैगावाट) तथा पाला-मनेरी (४८० मैगावाट) मिलाकर भी देश की कुल ऊर्जा में एक प्रतिशत भी योगदान नहीं करेगी । जब कि इसकी कीमत देश को गंगा की बलि देकर तथा उससे जुड़े दिव्य पर्यावरण व राष्ट्रीय संस्कृति के भारी विनाश पर चुकानी पड़ेगी । आज ऊर्जा के कई विकल्प आधुनिक विज्ञान हो चुका है और ऊर्जा, पवन ऊर्जा, वायुमास, भुतापी ऊर्जा, समुद्र की लहरों से प्राप्त होने वाली ऊर्जा के साथ ही कई अन्य साधनों पर सफल खोजे हो चुकी है । यह सब जानते है इस दिव्य राष्ट्रीय नदी की उदगम घाटी में इतना बड़ा खिलवाड़ होने दिया जाना बांध परियोजनाओं एवम्‌ इससे जुड़े तंत्र के देश व्यापी भ्रष्टाचार को उजागर करत अहै ।
* चिन्ताजनक दर से गंगौत्री ग्लेशियर का पिघलना क्षेत्र का अति संवेदनशील भूंकप जो ५ में होने के बावजूद भी एक के बाद एक बांध बनाने की तैयारी है, क्योंकि बड़ी-बड़ी लोहे की मशीनें, सीमेंट, कंकीट, सरीया आदि के उद्योगों की खपत सुरंगो, बराज आदि निर्माण में आसानी से होती है तथा इस प्रकार से बांधों द्वारा एक विशेष पूजीपति तथा सरकारी वर्ग को भारी भरकम मुनआफा प्राप्त होता है जो कि स्वच्छ रूप से निर्मित सौर तथा पवन ऊर्जा आदि में प्राप्त नहीं होगा ।
* महानगरों में बहुमंजिली इमरतों की चकाचौध तथा पंजीपति वर्ग की उपभोग प्रधान शैली को जगमगाने में हजारों मेगावाट बिजली का व्यय होता है । नेताओं, नौकरशाहों तथा पूजीपतियों की २४ घंटे जगमगाती कंपनियां तथा लाखों एयरकंडीशनरों के ऐशे आराम की पूर्ति के लिए गंगा की बलि दी जा रही है और इसे नाम दिया जा रहा है - विकास ......... ।
* लोगों की उनकी सभ्यता संस्कृति एवं इसके आधारभूत मानबिदुओं से तथा पृथक कर एक विशिष्ट आद्यौगिक एवं पूंजीपति वर्ग का गुलाम बनाए रखने के विश्‍व व्यापी षड़्यंत्र का ही बांध निर्मआण भी एक स्वरूप तथा अंग है ।
घाटी पर हो रहे बांधों के दुष्परिणाम ः-
(१) मनेरीभाली (१) के कारण निर्मित सुरंग निर्माण से शिरोर आदिस्थानों के प्राकृतिक जल स्त्रोत लुप्त हो गये तथा जामक गांव को भूंकप में भारी जान-मान का नुकसान उठाना पड़ा ।
(२) मनेरी भाली (११) की सुरंग निर्माण से घाटी से जुड़े तथा सुरंग के क्षेत्र में आये गांव दयोली के समस्त जल स्त्रोत सूख गये आज खच्चरों द्वारा गांव में पेय जल की ढुलाई कराई जा रही है कंपनी अपना मुनाफा कमाकर ज अचुकी है, और आज पूरा गांव ही विस्थापन की कगार पर है ।
(३) इसके साथ ही जुड़े गंवाणा, पुजार गांव, हिटाणू तथा सिगंणी के जल स्त्रोत भी सूखे है, तथा सिचाई का प्रमुख साधन “कैड़ी गाड़” भी पूर्णतः सूख चुका है ।
(४) लोहारीनाग-पाला के निर्माण से भी पाला, सैज, हूरी, तिहार, तिहार से जुड़े जल के स्त्रोतों पर भारी दुष्प्रभाव देखने में आया है ।
(५) यह क्षेत्र भूंकप संवेदनशील जोन- ५ में आता है, जहां निर्मित ग्रामीणों के भवनों में परियोजना के दौरान हो रहे विस्फोटो द्वारा दरारें आयी है, इस प्रकार संपूर्ण क्षेत्र में मकान भविष्य के लिए अत्यंत असुरक्षित हो गये है ।
(६) टिहरी समेत इन सभी परियोजनाओं के निर्मांण से अत्यंत दिव्य एवं संवेदनशील पर्यावरण भारी विनाश हुआ है इसमें जंगली जानवरों के स्वतंत्र आवागमन में भी बाधा अयई है और हिंसक होकर इनका दिनदहाड़े ग्रामीणों पर भी हमला करने की घटनायें सामने आयी है ।
(७) भारी पर्यावरण असंतुलन एवम्‌ गंगाजी की लुप्ति के कारण क्षेत्र के मौसम में भी चिंताजनक परिवर्तन देखने को मिल रहे है, जिसका दुष्प्रभाव कृषि पर सीधे तौर से देखा जा सकत अहै ।
(८) गंगा की लुप्ति से वर्ष के अधिकांश समय में होने वाली धार्मिक एवं सांस्कृतिक क्रिया कलाप, अंतिम संस्कार एवं साधुओं की जल समाधि को भारी अपमान सहना पड़ रहा है । आम जन मानस झील में रूके गंगा जल में सड़ते गलते कचरे, शवों मृत पशुओं आदि को देखकर अत्यंत मर्माहत होता है यह सांस्कृतिक आघात लगातार बढ़ता ही जा रहा है ।
(९) गंगा के इस लगातार व्यापार का दुष्परिणाम सांस्कृतिक एवं सामाजिक जीवन संबंधों पर पड़ रहा है, गंगा के तिरस्कार से क्षेत्र की मनोवृत्ति में धन एवं लोभ की प्रधानता के कारण सांस्कृतिक एवं सामाजिक संबंधों की मिठास में लगातार गिरावट आ रही है । विभिन्‍न उत्सव महोत्सवों शादी ब्याहों एवं अन्य परपंराओं में गहरी आत्मीयता एवं संबंधों की कमी स्पष्ट दिख रही है । अतः देवभूमि की संस्कृति, आदर्श एवं मर्यादा विलुप्ति की ओर जा रही है ।
(१०) लगातार भूस्खलन एवं भारी गतिविधियों के चलते पर्यटन पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है, गंगा जी की अविरल धारा की लुप्ति के कारण घाटी की चमक फीकी पड़ने से पर्यटन भी गंभीर रूप से प्रभावित होने जा रहा है ।
क्या यह वास्तविक विकास है ः-
ध्यान रहे कि इन बांधो का निर्माण क्षेत्र के विकास के लिए नहीं बल्कि महानगरों में बढ़ रही बिजली की मांग पूर्ति के लिए हो रहा है कंपनी भी यहां क्षेत्र का विकास करने नहीं बल्कि बिजली बनाने आयी है । जहां कंपनी एवं इससे जुड़ा तंत्र करोड़ों का मुनाफा कमा रहा है तथ कमायेगा यहीं यहीं दूसरी और यह घाटी भारी पर्यावरण के विनाश के साथ ही गंगा की लुप्ति हो जाने पर अपनी चमक एवं पहचान से दूर होई जाएगी ।
साथ ही अपने जंगल, जमीन, जल, जानवरों को गंवाकर हम इन्हें बांध-निर्माण की बलि चढ़ाते जा रहे है, और कंपनी के यहां मजदूर, चपरासी, श्रमिक या ड्राइवर की नौकरी कर रहे है । कभी अपने जंगल-जमीन के हम मालिक थे आज कंपनी के गुलाम होते जा रहे है । क्या यही विकास है?
निर्माणधीन बांधों को हटाये जाने के बाद हमारा संघर्ष तथा मांगे ः-
लोहारीनाग-पाला तथा पाला-मनेरी परियोजनाओं के निरस्तीकरण के तुरंत बाद हमारी निम्न मांगे होगे
ए ः-
(१) ग्रामीणों को उनकी जमीने उसी रूप में जैसे की वह पहले थी वापस लौटाई जायें ।
(२) दरार युक्‍त मकानों को सुरक्षित करवाकर ग्रामीणों को उचित हरजाना दिय अजायें ।
(३) जहां जल, स्त्रोत सूखे है वहआं नजदीकी स्त्रोतों से पर्याप्त जलापूर्ति की जाये ।
(४) बांध परियोजना गतिविधियों से जो भारी पर्यावरण नाश हुआ है उसकी क्षतिपूर्ति जो वृक्ष एवं पूर्व में थे उन्हें के सघन वृक्षारोपण द्वारा की जायें ।
इसके साथ ही क्षेत्र के अनुकूल सांस्कृतिक एवं सामजिक विकास तथा स्वावलंबन से युक्‍त रोजगार के निम्न विकल्पों पर हमार असंघर्ष रहेगा ।

* जड़ी बूटियों एवं विभिन्‍न फूलों के माध्यम से उन्‍नत उद्योगों को रोजगार हेतु बढ़ाव अदेकर स्थापित किया जाये ।
* शिक्षण संस्थान आयुर्वेदिक कालेजों की स्थापना कराई जाये जिसके माध्यम से घाटी के जन पूर्ण प्रशिक्षण प्राप्त करें ।
* फल-फूलों एवं उन्‍नत कृषि के लिए क्षेत्र में किसानों को प्रशिक्षण दिया जाये तथ अविशेष प्रकार की फसलों एवं फलों के संवर्धन पर ध्यान दिया जाये ।
* घाटी के हर गांव में उसकी अपनी बिजली होनी चाहिए जिसकी पूर्ति आसानी से गाड गदेरों पर लघु बिजली संयंत्र लगाकर की जा सकती है ।
* गंगा का उद्‌गम होने के कारण सदियों से यहां विश्‍व भर के लोगों का आना जाना रहा है घाटी की संस्कृति विभिन्‍न मेलो, यात्राओ, त्यौहारों तथा लोक परंपराओं आदि) को बढ़ावा देकर इसका पर्याप्त प्रचार प्रसार सरकारी माध्यमों से हो जिससे पर्यटन उद्योग में वृद्धि हो तथा स्थानीय रोजगार को बढ़ावा मिले इसके लिए सरकार द्वारा संस्कृति एवं पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए अनुकूल व्यवस्थायें बनाई जाये ।
* पहाड़ी नवयुवकों को “साहसिंक पर्यटन” के लिए सुलभ प्रशिक्षण एवं संस्थानों का विकास किया जाये, विभिन्‍न पर्यटन स्थानों को विकसित एवं प्रचार-प्रसरित कर क्षेत्र में अनुकूल रोजगार को बढ़ाया जाये ।
* घाटी के समस्त ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्थानों का विकास किया जाये तथा इनके संस्कृति संरक्षण व संवर्धन के पर्याप्त व्यवस्थायें बनाकर इन्हें स्थायी रोजगार से जोड़ा जयए ।
* क्षेत्र की संस्कृति एवं संवेदनशील पर्यायवरण को ध्यान में रखते हुए क्षेत्र के अनुकूल विकास का मॉडल तैयार किया जाये तथा विकास कार्यो से पूर्व स्थानीय जनों का दूरदृष्टि पूर्वक विचार विमर्श विभिन्‍न गोष्ठियों के माध्यम से सुनिश्‍चित हो तथा इस प्रकार क्षेत्र को हम आधुनिकता के युग में एक आदर्श रूप में स्थापित करें ।

मैं गंगा के रूप में घाटी को जो दिव्य वरदान प्राप्त है, उसको सुरक्षित रखकर ही हम उपरोक्‍त समस्त विकास को प्राप्त कर सकते है । अतः समस्त बांध प्रभावितों एवं गंगा- भक्‍तों को यह आह्‌वान है, कि हमारे इस अभियान में अपनी सक्रिय भूमिका के साथ जुड़कर पुण्यलाभ अर्जित करें इसी आशा और अपेक्षा के साथ .............सभी के लिए

- गंगा रक्षा अभियान (योही आदित्यनाथ) / अखाड़ा परिषद
शंकराचार्य निश्‍चलानंद सरस्वती

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