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वैचारिक क्रांति की धारा को गति दे रही है डॉ० मुक्‍ता की रचनाएँ

स्त्रियों पर विचारहीनता का आरोप लगाया जाता है, मगर यह समझने की जरूरत है कि अनुभवों से ही विचार आता है और स्त्री विमर्श में अब वैचारिक लेखन की शुरूआत हो गई है । विचार का वध संभव नही है डॉ० मुक्‍ता ने बड़े साहस के साथ पुरूषसत्ता के औचित्य और शोषण का सटीक चित्रण प्रस्तुत किया है । उनके लेखनी के अकाट्‌य सत्य के अनुभूति और वैचारिक क्रांति की धारा को गति मिले यही हमारी आकांक्षा है । इनके कविताओं के मूल्यांकन पर मैं इतना ही कहूँगा कि “डॉ० मुक्‍ता की लेखनी सच्चाई से रूबरू तो कराती ही है साथ ही साथ समाजिक व्यवस्था के प्रति विद्रोह का जनसंचार करने की पूरी क्षमता है । एक पुरूष होने के बावजूद मैं उनके अन्याय, शोषण, विकृति तथा सांस्कृतिक कुठाराघात के खिलाफ स्वर को प्रणाम करता हूँ । संग ही इस सारगर्भित पुस्तक (अस्मिता) के अतिशीघ्र द्वितीय संस्करण किसी संस्था द्वारा प्रायोजित होने की कामना करता हूँ । जिससे इसके अधिकाधिक प्रतियों का प्रकाशन हो सके और अधिकांश पाठक इनके कविताओं का रसास्वादन ले सकें । ‘अस्मिता’ वास्तव में पाठकों को अपने अस्मिता का मान कराती है । समाज में पनप रही विकृति जो वास्तव में पश्‍चिमी सभ्यता की देन है, को केन्द्रित कर डॉ० मुक्‍ता द्वारा रचित काव्य संकलन शंखनाद सदृश है ।
भारतीय संस्कृति का पतन और मानवीय मूल्यों का हनन का संदेश देकर कवियित्री ने समाज को आगाज किया है कि अभी भी वक्‍त है, सँभल जाओ । संतुलन बिगड़ने पर खतरे बढ़ने की प्रबल संभावना को कवियित्री ने विभिन्‍न कविताओं के रूप में एक शिल्पी के रूप में उभरी हैं । महाभारत एवं रामायण कालीन नारी पात्रों का उदाहरण देकर डॉ० मुक्‍ता ने सिद्ध करने की कोशिश की है कि अपनों द्वारा ही अपनो का शोषण और दंश भोगना पढ़ता है । प्रस्तुत पुस्तक “अस्मिता” में नारी विमर्श का बेबाक चित्रण है । “अस्मिता” के रूप में जीवन का यथार्थ, समाज का कटु सत्य व प्रत्येक नारी की अनुभूतियों को काव्य पुष्प के रूप में बड़े ही सुन्दर ढंग से पिरोया गया है । हमें उम्मीद ही नहीं विश्‍वास है कि इस काव्य पुष्प की खुशबू वातावरण में नई चेतना का नवसंचार अवश्य होगा । संक्षेप में कहें तो प्रस्तुत पुस्तक का निम्न सूर्य में कितनी तपन सारे है अग्नि में कितनी जलन है बता सकते हैं वही लोग जिनकी जिंदगी हवन है । डॉ० मुक्‍ता ने अपने काव्य संकलन में कलियुग के भगवान को भी नहीं बख्शा है । संस्कृति पर हो रहे कुठाराघात का सजीव चित्रण, उन्होंने रामायण व महाभारत कालीन पात्रों को लक्षित संस्कृति की धरोहर, तथागत जो कालन्तर में भगवान बुद्ध के निर्णय को कटघरे में लाकर खड़ा करके निरूत्तरित कर दिया है । गीता के संदेश का सूसरा पहल कवियित्री ने प्रस्तुत किया है । अभिमन्यु शीर्षक में युद्ध के नियमों पर इन्होंने गंभीर और चिंतनीय प्रश्‍न उठाए हैं । इक्‍कीसवीं सदी के रावण का सजीव चित्रन करके इन्होंने जो पर्दाफाश किया है वह वाकई काबिलेतारीफ है । राजनीतिज्ञों को हिरणकश्‍यप का दर्जा देकर एवं प्रहलाद शीर्षक में राक्षसत्व का अंत का संदेश अपने आप में बहुत कुछ बयाँ कर देता है । मूल्यहीनता मिटाने की चुनौती देकर उन्होंने पाठको को ललकारा है, अवश्य ही इसका स्पन्दन सकारात्मक परिवर्त्तन की दिशा में अपनी भूमिका निभाएगा । कलियुग का अंत क्यों किया जाना चाहिए, की प्रस्तुति अंतर्मन को झकमभेड़ देती है । एक स्वपुन शीर्षक कविता में नायिका स्वयं को सीता जैसा बनना स्वीकार है परन्तु नायक को राम के रूप स्वीकार नहीं । कवियित्री की प्रस्तुति राम के व्यक्‍तित्व एवं निर्णय को नायिका के माध्यम से नाजायज करार देती है । समाज के तथाकथित ठेकेदारों एवं पुरूष वर्ग द्वारा निर्मित अग्निपरीक्षा के औचित्य पर, डॉ० मुक्‍ता ने सवाल उठाया है ।
नारी का वजूद शब्दशिल्प की अनुपम मिशाल लगती है । आधुनिक डॉक्टरों द्वारा की जा रही भ्रूणहत्याओं का जिक्र “अजन्मी” शीर्षक में किया गय अहै । नारी सशक्‍तिकरण, मानवाधिकार समानता, स्नेह और सौहार्द, सामंजस्यता व समरसता अदालत की फाइलों एवं कानून की धाराओं में कैद होने का नजरिया “एक प्रश्न” के अंतर्गत प्रस्तुत किया गया है ।

गोपाल प्रसाद
४/१९ ए , साकेत ब्लॉक, मंडावली दिल्ली -९२
संपर्क - 9289723145

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