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SAVDHAN -PRITHAVI TAP RAHI HAI !

ग्लोबल वार्मिंग को लेकर संपूर्ण विश्‍व में दहशत का माहौल है । एक मोटे अनुमान के मुताबिक सन्‌ २०५० तक यदि धरती के तापमान में दो डिग्री की कमी नहीं हुई तो धरती, मानव और अन्य जीवधारियों के जीवन के लिए कष्टकारी हो जाएगी । इस गंभीर चिंतन को लेकर गत दिनों विश्‍व के अनेक देश कोपेनहेगेन में चर्चा हेतु जुटे थे । ग्लोबल वार्मिंग जैसे गंभीर मुद्‌दे को लेकर बुलाया गया यह सम्मेलन दबंग देशों की राजनीति का शिकार हो गया । अनेक देशों ने जिम्मेदार ना होते हुए भी भारत को कठघरे में घेरने का प्रयास किया । हालाँकि विकासशील देशों की अग्रिम पंक्‍ति में खड़े भारत के नेताओं ने विकसित देशों के इस षडयंत्र का मुँहतोड़ जबाब दिया । परिणामस्वरूप कार्बन कटौती को लेकर अन्य देशों को भी उत्तरदायित्व उठाने पर विवश होना पड़ा । संपूर्ण मानवता के लिए बेहद खतरनाक होती जा रही ग्लोबल वार्मिंग के मुद्दे को सभी राजनीतिक पार्टियों को अपने घोषणापत्र में शामिल कर इसका समाधान हेतु सक्रिय होना चाहिए । ग्रीन हाउस गैसों में कटौती और कार्बन कटौती को लक्ष्य बनाकर सभी बुद्धिजीवी, मीडिया को समाचार, विचार एवं ज्ञान के द्वारा अपना भागीदारी अवश्य देना चाहिए । निश्‍चित रूप से यह कदम धरती माता के जख्मों पर मरहम लगाने का काम करेगा, जिन जख्मों के लिए हम आप स्वयं जिम्मेदार हैं । धरती माता के गोद में आश्रय पाने हेतु हमें प्रकृति के साथ छेड़छाड़ बंदकर पर्यावरण अनुकूल वातावरण तैयार करने होंगे । प्रस्तुत पुस्तक के लेखक ने इस पुस्तक को इसी संदर्भ में नाट्‌य रूप में परिणत कर जनजागरण हेतु शंखनाद किया है जो काबिलेतारीफ है । वर्तमान समय के संदर्भ में हो रहे घटनाक्रम को नाटक के माध्यम से प्रस्तुत करके ही हम भारतीय संस्कृति को भी वास्तव में जीवित रख पाएँगे । इस नाटक के लेखक गर्गऋषि शांतनु इंजीनियर होने के साथ-साथ पर्यावरण चिंतक तथा नाट्‌यकर्मी एवं विशुद्ध साहित्यकार भी हैं । संक्षेप में कहा जाय तो यह पुस्तक पठनीय, सराहनीय एवं आलोकित करनेवाली साबित होगी । “हम अपने मित्रों, शुभचिंतकों, संस्कृतिकर्मियों, पुस्तकालयों एवं विद्यार्थियों को उपहारस्वरूप देकर एक नई चेतना जगाने हेतु सहभागी हो सकते हैं । संपूर्ण मानवता और देश के पर्यावरण तथा जनता के जीवन और स्वास्थ्य की रक्षा की दिशा में यह पुस्तक अनमोल उपहार सिद्ध होगा ।
- गोपाल प्रसाद

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शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चों को एक परिपक्व इन्सान बनाना होता है, ताकि वो कल्पनाशील, वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और देश का भावी कर्णधार बन सकें, किन्तु भारतीय शिक्षा पद्धति अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त कर सकी है, कारण बहुत सारे हैं । सबसे पहला तो यही कि अंगूठाछाप लोग डिसा‌इड करते हैं कि बच्चों को क्या पढ़ना चाहिये, जो कुछ शिक्षाविद्‍ हैं वो अपने दायरे और विचारधारा‌ओं से बंधे हैं, और उनसे निकलने या कुछ नया सोचने से डरते हैं, ऊपर से राजनीतिज्ञों का अपना एजेन्डा होता है, कुल मिलाकर शिक्षा पद्धति की ऐसी तैसी करने के लिये सभी लोग चारों तरफ से आक्रमण कर रहे हैं, और ऊपर से तुर्रा ये कि ये सभी लोग समझते हैं कि सिर्फ वे ही शिक्षा का सही मार्गदर्शन कर रहे हैं, जबकि दर‌असल ये ही लोग उसकी मां बहन कर रहे हैं । मैं किसी एक पर दोषारोपण नहीं करना चाहता, शिक्षा पद्धति की रूपरेखा बनाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिये और सोचना चाहिये, कि क्या उसमें मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है। आज हम रट्टामार छात्र को पैदा कर रहे हैं, लेकिन वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और परिपक्व छात्र नहीं, क्या यही हमा…

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