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जिनका लक्ष्य है संस्कृत शिक्षा में सुधार लाना

बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष एवं हिंदी के लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार सिद्धेश्‍वर से गोपाल प्रसाद द्वारा लिए गए साक्षात्कार के मुख्य अंश ः

प्रश्न ः बिहार संकृत शिक्षा बोर्ड की स्थापना कब हुई तथा इसका उद्देश्य क्या है?
उत्तर ः बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड की स्थापना सन्‌ १९८१ में हुई जिसका उद्देश्य था संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार एवं संस्कृत शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार । संस्कृत भाषा के साथ लोगों ने ऐसा व्यवहार किया कि यह भाषा विलुप्त होने के कगार पर है । इसका मूल कारण उपर से नीचे तक भ्रष्टाचार व्याप्त होना है । प्रथमा, मध्यमा के केन्द्र का विक्रय हो रहा था । जितने विद्यालय हैं, वे शिक्षकों के झोले में हैं । संस्कृत शिक्षा की ओट में संस्कृत व्यापार बनकर रह गई । संस्कृत के बहाने मात्र दुकानदारी चलाई जा रही थी ।

प्रश्न ः आपके अध्यक्ष बनने के बाद क्या परिवर्तन हुआ?
उत्तर - १५ सितंबर २००८ को मैं इस बोर्ड का चेयरमैन बना । संस्कृत के विद्वानों से आशा क्षीण होने तथा भ्रष्टाचार के कारण ही हिंदी के साहित्यकार को दायित्व मिला ।

प्रश्न ः हिंदी के साहित्यकार संस्कृत की अनिवार्यता के मुद्दे को लेकर वीरचन्द्र राय नामक व्यक्‍ति की याचिका को पटना उच्च न्यायालय ने याचिका वापस लेने को मजबूर कर दिया, साथ ही ५ हजार रूपए का जुर्माना याचिकाकर्त्ता पर ठोका गया । इस संदर्भ में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के फैसले की पंक्‍ति ध्यान देने योग्य है, जिसमें उन्होंने कहा था कि “तीन दशक में संस्कृत के विद्वान कोई परिवर्तन नहीं कर पाए जबकि १ वर्ष में हिंदी के विद्वान आए और दशा सुधार दी । एक साल में नक्शा बदलता हुआ दिखाई पड़ा ।

प्रश्न ः आपने इस कठिन कार्य को कैसे संभव किया?
उत्तर ः मेरा पूरा जोर लोगों की मानसिकता बदलने पर केंद्रित था । मैंने संस्कृत को देवभाषा से जनभाषा बनाने की दिशा में पहल की । वास्तव में संस्कृत भाषा बिहार में जाति ही नहीं बल्कि एक परिवार में सिमटकर रह गया था । २००९ की मध्यमा परीक्षा पहली बार इतिहास में पारदर्शी और कदाचार मुक्‍त हुई तथा उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में गड़़बड़ियाँ नहीं हुई । पहले एक केन्द्र तीन लाख में बिकते थे जो इस बार नहीं बिके । शिक्षा माफियाओं ने पैसे लौटाए । साहस, संकल्प और ईच्छाशक्‍ति तथा पूरी ईमानदारी के साथ दायित्व का निर्वहन किया । २८-२९ दिसंबर २००९ को राष्ट्रीय सम्मेलन में सभी विद्वानों ने शिरकत की जिसमें ६००० प्रतिनिधियों ने २ दिनों तक सहभागिता की ।

प्रश्न ः संस्कृत के साथ मूल समस्या तथ आपकी उपलब्धियाँ क्या है?
उत्तर ः मौजूदा परिदृश्य में समाज रूग्ण और बीमार है, जिससे संस्कृति और संस्कार समाप्त हो रहे हैं । यही सारी समस्याओं की जड़ है । संस्कृत के विलुप्त होने से ही संस्कृति और संस्कार विलुप्त हो रही है । संस्कृत का उन्‍नयन नई पीढ़ी द्वारा संभव है । संस्कृत शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाकर तथा इसे रोजगारमूलक बनाने से ही लोगों का रूझान बनेगा । संस्कृत के पाठयक्रम में बदलाव लाने की परम आवश्यकता है । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अब इस भाषा के साथ सूचना तकनीक, नैतिक शिक्षा तथा योग का समावेश करने हेतु राज्य शिक्षा शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान से नए सिलेबस मॉडल हेतु अनुरोध किया है । २८ दिसंबर २००८ को पटना के तारामंडल सभागार में संस्कृत की गुणवत्ता पर केन्द्रित बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड की ओर से एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई जो १२ घंटे तक चली जिससे देश के ख्यातिप्राप्त संस्कृताचार्य विद्वानों के व्यक्‍त विचारों से सही दिशा और मार्गदर्शन मिला । इसी से प्रेरित होकर २८-२९ दिसंबर २००९ को श्रीकृष्ण स्मारक भवन में संस्कृत शिक्षण को केन्द्र में रखकर दो दिवसीय राष्ट्रीय संस्कृत सम्मेलन बोर्ड के तत्वाधान में किया गया । जिसके शैक्षिक सत्रों में संस्कृत साहित्य की समस्याएँ और समाधान, लौकिक संस्कृत साहित्य में बिहार की प्रतिभागिता, भारतीय संस्कृति के संदर्भ में संस्कृत की भूमिका और संस्कृत साहित्य में वैज्ञानिक चिंतन विषयों पर देश के सुपरिचित संस्कृत, पाली एवं हिंदी चिंतकों एवं विचारकों के विचारों का आदान-प्रदान हुआ । बोर्ड को संस्कृत उन्‍नयन के लिए रोशनी मिली । यह राष्ट्रीय सम्मेलन ऐतिहासिक इसलिए कहा जाएगा क्योंकि इस तरह का आयोजन बोर्ड के इतिहास में पहली बार हुआ, जिसमें संस्कृत के रास्ते तलाशने की सार्थक तलाश हुई ।

प्रश्न ः संस्कृत शिक्षा बोर्ड का अगला कदम क्या होगा?
उत्तर ः संस्कृत साहित्य को समृद्ध करने के लिए बोर्ड ने निर्णय लिया है कि बोर्ड के द्वारा “वाग्धारा नामनी” नामक त्रैमासिक पत्रिका प्रकाशित की जाएगी, जिसके प्रवेशांक का लोकार्पण फरवरी-मार्च २०१० में सकेगा । इसके द्वारा बोर्ड के स्तर पर भी कार्यकलापों को पारदर्शी और भ्रष्टाचारमुक्‍त करने का प्रयास किया जा रह अहै । प्रवेशपत्र तथा प्रपत्र भरने की प्रक्रिया में शिक्षकों एवं कर्मचारियों के सहयोग से भ्रष्टाचार का नामोनिशान देखने में नहीं आया । उसी प्रकार २००९ की मध्यमा परीक्षा के प्रमाणपत्र एवं अंकपत्र के वितरण में भी पारदर्शिता देखी गई । प्रमाणपत्रों की हेराफेरी ना हो इसके लिए बोर्ड ने पहली बार तस्वीर अनिवार्य कर दी है ।

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