Skip to main content

अलग मिथिला राज्य का गठन क्यों नहीं?

[भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर के द्वारा की गई विभिन्‍न भाषाओं के अध्ययन के अंतर्गत मैथिली भाषायों की संख्या (२००१ के अनुसार) भारत में कुल १२,१७९१२२ है । जबकि वास्तविक रूप में यह संख्या कई गुणा अधिक है । ]

“मिशन मिथिला” ने संयोजक गोपाल प्रसाद ने अपने प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से कहा है कि जब पृथक तेलंगाना राज्य का गठन हो सकता है तो अलग मिथिला राज्य का गठन क्यों नहीं? उन्होंने कहा कि मिथिलांचल को पूर्ण न्याय अभी तक नहीं मिला है । सभी क्षेत्रों में मिथिलांचल की घोर उपेक्षा हो रही है । केन्द्र सरकार और बिहार सरकार ने अभी तक कोई उद्योग इस क्षेत्र में शुरू किया है, जिससे इस क्षेत्र के लोग पलायन को मजबूर हैं । असमान विकास के चलते देश का पिछड़ा राज्य बिहार में मिथिला अतिपिछड़ा क्षेत्र बनकर रह गया है । बिहार सरकार का पूरा ध्यान मात्र पटना एवं नालंदा को विकसित करना रह गया है ।
मिथिला में पर्यटन एवं खाद्य प्रसंस्करण हेतु भरपूर संभावना के बावजूद इसके साथ नकारात्मक रवैया अपनाया जा रहा है । इस क्षेत्र की भाषा मैथिली एवं मैथिला अकादमी अपने अस्तित्व हेतु संघर्ष कर रही है । बिहार सरकार के ‘युवा महोत्सव’ एवं दिल्ली के प्रगति मैदान स्थित बिहार पवेलियन में आईआईटीएफ के दौरान आहूत सांस्कृतिक कार्यक्रम में मैथिली की घोर उपेक्षा की गई जिससे सरकार की नीति और नीयत मिथिलावासियों को समझ में आ गया है । इन सारे समस्याओं के निदान का एकमात्र विकल्प अलग मिथिला राज्य ही है । बिहार सरकार प्रवासी बिहारियों की सुरक्षा, रोजगार एवं न्याय दिलाने में पूरी तरह से विफल रही है और इसके ज्यादातर शिकार मिथिला के लोग ही रहे हैं । महाराष्ट्र दिल्ली एवं पंजाब के बाद मध्यप्रदेश के राजनेताओं ने भी बिहारियों के साथ असंवैधानिक रूख अपनाया और बिहार सरकार ने केवल बयान देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लिया । बिहार सरकार का योजना विभाग, केन्द्र सरकार के योजना विभाग में बिहार यस्क फोर्स और बिहार फाउंडेशन के बावजूद मिथिला को बिहार मे पर्याप्त तवज्जो क्यों नहीं मिली? आधारभूत संरचना के विस्तार के बिना मिथिला कटा-कटा सा है ।
मिशन मिथिला के संयोजक गोपाल प्रसाद ने पूर्व लोकसभाध्यक्ष पी०ए० संगमा के बयान का स्वागत किया है जिसमें उन्होंने कह अथा कि “क्षेत्रवाद-नक्सलवाद असमानता की उपज है, जिसे छोटे राज्यों का गठन कर दूर किया जा सकता है । ” मिथिला के लोग बाढ़ झेलें और विकास की धारा अन्य क्षेत्रों में बहे यह नहीं चलेगा । उनका संगठन भारत के समस्त मिथिला मूलवासियों को इस आंदोलन हेतु जागरूक करेगा । डॉ० धनाकर ठाकुर के आह्यान पर अलग मिथिला राज्य के गठन हेतु अंतर्राष्ट्रीय “मैथिली परिषद” द्वारा कानपुर में २३-२४ दिसंबर को मिथिला के बुद्धिजीवियों, स्वैच्छिक संगठनों का सम्मेलन होगा जिसमें अआंदोलन की दशा-दिशा तय की जाएगी । मिथिला के सर्वागीण विकास, मधुरतम भाषा मैथिली को पूर्ण सम्मान एवं मिथिला के सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण-संवर्द्धन हेतु अलग मिथिला राज्य की माँग हेतु समस्त मैथिल समुदाय से अपील है कि वे केन्द्र सरकार पर दबाव बनाएँ कि पृथक तेलंगाना के साथ-साथ पृथक मिथिला राज्य के गठन की भी घोषणा हो । इस संदर्भ में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, गृहमंत्री आदि को ज्ञापन भी भेजा जाएगा ।
सर्वविदित है कि बिहार के पूर्व महाधिवक्‍ता पं० ताराकान्त झा एवं स्व० भोगेन्द्र झा आदि नेताओं ने भी अलग मिथिला राज्य हेतु जनजागरण एवं पदयात्रा कर चुके है । तेंदुलकर रिपोर्ट के नए मापदंड के बाद बिहार में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले लोगों का प्रतिशत ४२.५३ से बढ़कर ७५.१४ प्रतिशत हो गय अहै जो अपने आप सब कुछ बयान कर देता है । बिहार के मुख्यमंत्री (राज्य में कितने गरीब हैं, इसकी संख्या केन्द्र ने तय कर दी और उनकी पहचान के लिए राज्य सरकार को कह दिया, यह कैसी व्यवस्था है?”) में केन्द्र व राज्य सरकार के शह-मात का खेल स्पष्ट प्रतीत होता है ।

गोपाल प्रसाद (संयोजक, मिशन मिथिला)
प्रबंध संपादक, मिथिला महान
४/१९ ए, साकेत ब्लॉक, मंडावली, दिल्ली-९२
मोबाइल - 9289723145
Email - missionmithila@gmail.com
Blog - www. missionmithila.blogspot.com

Comments

Popular posts from this blog

वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चों को एक परिपक्व इन्सान बनाना होता है, ताकि वो कल्पनाशील, वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और देश का भावी कर्णधार बन सकें, किन्तु भारतीय शिक्षा पद्धति अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त कर सकी है, कारण बहुत सारे हैं । सबसे पहला तो यही कि अंगूठाछाप लोग डिसा‌इड करते हैं कि बच्चों को क्या पढ़ना चाहिये, जो कुछ शिक्षाविद्‍ हैं वो अपने दायरे और विचारधारा‌ओं से बंधे हैं, और उनसे निकलने या कुछ नया सोचने से डरते हैं, ऊपर से राजनीतिज्ञों का अपना एजेन्डा होता है, कुल मिलाकर शिक्षा पद्धति की ऐसी तैसी करने के लिये सभी लोग चारों तरफ से आक्रमण कर रहे हैं, और ऊपर से तुर्रा ये कि ये सभी लोग समझते हैं कि सिर्फ वे ही शिक्षा का सही मार्गदर्शन कर रहे हैं, जबकि दर‌असल ये ही लोग उसकी मां बहन कर रहे हैं । मैं किसी एक पर दोषारोपण नहीं करना चाहता, शिक्षा पद्धति की रूपरेखा बनाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिये और सोचना चाहिये, कि क्या उसमें मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है। आज हम रट्टामार छात्र को पैदा कर रहे हैं, लेकिन वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और परिपक्व छात्र नहीं, क्या यही हमा…

राजनीति में भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार और राजनीति का एक गहरा संबंध है । जहां हम विकास की एक नई गाथा को रचने का सपना संजोए हुए हैं वहीं दुनिया के सामने हमारी गरीबी की सच्चाई को स्लमडॉग मिलेनियर जैसी फिल्मों के सहारे परोसा जा रहा है । आज हम भ्रष्टाचार के मामले में बंग्लादेश, श्रीलंका से भी आगे हैं ।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री सह सांसद मधुकोड़ा का मामला भ्रष्टाचार के मामले में सामने आया है । जिसमें ४ हजार करोड़ के घपले का पता चला है । कोड़ा का नाम भी उन राजनेताओं में जुड़ गया है जो भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाये गए हैं या घिरे हुए हैं । भ्रष्टाचार को फैलाने वाले राक्षस सत्ता में आसीन राजनीति के शीर्ष नेता हैं इसकी शुरूआत भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय से ही हो गई थी । १९५६ में खाद्यान्‍न मंत्रालय में करोड़ों रूपये की गड़बड़ी पकड़ी गई । जिसे सिराजुद्दीन काँड के नाम से जाना जाता है । उस समय केशवदेव मालवीय खाद्यान्‍न मंत्री थे उन्हें दोषी पाया गया । १९५८ में भारतीय जीवन बीमा में मुंधरा काँड हुआ जिसकी फिरोज गाँधी ने पोल खोली थी । १९६४ में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए “संथानम कमिटी” का गठन किया गया ।…

काले धन एवं नकली नोटों से छुटकारा - भ्रष्टाचार पूर्णत: खत्म

प्राय: सभी देशों की सरकारों का एक रोना साझा है और वो भी अति भयंकर रोना! देश की अर्थ व्यवस्था में काला धन । यह काला धन बहुत से देशों को, बहुत सी सरकारों को बहुत रुलाता है और बुद्धिजीवी वर्ग को अत्यंत चिंतित करता है । अर्थशास्त्रियों की नाक में दम करके रखता है । रोज न‌ए-न‌ए सुझाव दि‌ए जाते हैं, विचार कि‌ए जाते हैं कि किस तरह इस काले धन पर रोक लगा‌ई जा‌ए. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट तो छापों में विश्वास रखता है, जहाँ कहीं सुंघनी मिली नहीं कि पहुँच ग‌ए दस्ता लेकर । अजी! काले धन की बात तो छोड़ि‌ए! नोटों को लेकर इससे भी बड़ी समस्या का सामना क‌ई देशों को करना पड़ता है, और वो है नकली नोटों की समस्या । दूसरे देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करना हो या बेहाल करना हो, प्रिंटिंग प्रेस में दूसरे देश के नोट हूबहू छापि‌ए और पार्सल कर दीजि‌ए उस देश में, बस फ़िर क्या है - बिना पैसों के तमाशा देखि‌ए उस देश का । अब तो उस देश की पुलिस भी परेशान, गुप्तचर संस्था‌एं भी परेशान और सरकार भी परेशान! नकली नोट कहां-कहाँ से ढ़ूंढ़े और किस जतन से? बड़ी मुश्किल में सरकार ।
बचपन से छलाँग लगाकर जब हमने भी होश सँभाला तो आ‌ए दिन काले धन …