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गंगा- एक लुप्त होती नदी

“उत्तरकाशी से गंगोत्री तक शेष बचे अंतिम प्राचीन सतत प्रवाह का चलता विनाश गंगा आह्यान ः गंगा के नैसर्गिक एवं सांस्कृतिक प्रवाह के लिए एक जन‍आंदोलन

सरकार क्या करने जा रही है?
आजकल सरकार गंगा पर बांधों की श्रृंखला की निर्माण प्रक्रिया में लगी है जो कि प्राचीन हिमालय में इसके स्त्रोत निकट गंगोत्री से प्रारंभ होती है, ये परियोजनाएँ टिहरी बांध एवं हरिद्वार तक के अन्य बांधों को जाकर मिलेंगी ।

इस प्रकार गंगोत्री से हरिद्वार तक गंगा का संपूर्ण बहाव वास्तव में बांधों की श्रुंखला है ।

इन परियोजनाओं में क्या समाहित है?
ये परियोजनाएं सुरंग तथा ऊर्जागृह की निर्माण प्रक्रिया में पहाड़ों में विस्फोटों, खुदाई और पहाड़ी ढलानों को गिराने से हो रहे हिमालय के भारी-विनाश को समाहित करती हैं, इनमें शामिल है, जंगलों का कटना, पेड़ों क अकटना, हमारे पहाड़ों के प्राचीन एवं अनछुए भागों का मलिन होना तथा स्थायी रूप से संपूर्ण घाटी का भयभीत होना, अंततः चूंकि परियोजनाएँ लगातार एक के बाद एक हैं, यह संपूर्ण नदी को बिना किसी विराम के अंधियारी प्रकाशविहीन सुरंगों में डालकर भूमिगत बना रही हैं ।

वर्तमान परियोजनाएँ जिनका तत्काल रूकना आवश्यक है, इस प्रकार हैं ः
१. भैरोंघाटी १- विचाराधीन (गंगोत्री से मात्र ९ किलोमीटर दूरी पर)
२. भैरोंघाटी २. - विचाराधीन (भैरोंघाटी १ के तुरंत बाद)
३. लोहारीनाग - पाला- निर्माण प्रारंभ
४. पाला - मनेरी- निर्माण हेतु तैयार (लोहारीनाग-पाला के तुरंत बाद)

गंगा में क्या बाकी रहेगा?
कुछ नहीं !!! अपनी उद्‌गम घाटी में गंगा पूर्णतः अस्तित्वविहीन हो जायेगी । ये परियोजनाएँ नदी के लगभग संपूर्ण प्रवाह को हिमालय में खुदी सुरंगों के भीतर मोड़ रही हैं । जो शेष बचेगा वह है नदी का सूखा बिछौना, शायद एक छोटी-सी धारा से युक्‍त जो कि टखनों तक के भाग को गीला करने के लिए मुश्किल से पर्याप्त हो । यह मूलतः २-३ क्यूमेक्श जल है जो पर्यावरण प्रभाव आकलन में बतआई गई जल की छोड़ी जानेवाली न्यूनतम मात्रा है । प्रायोगिक रूप में जो दिखता है, वह है एक संकीर्ण, स्थान-स्थान पर शैवालों से युक्‍त छिछली धारा, और यह दयनीय प्रवाह है उस गंगा नदी का जोकि दिव्य, शक्‍तिमान मानी जाती है ।

क्या विकास की इस आंधी में गंगा बचेगी ?
३०.२ किमी लंबा गंगोत्री ग्लेशियर हिमालयी ग्लेशियरों में एक बड़ा ग्लेशियर है और २३ मीटर प्रतिवर्ष की चिन्तित दर से इसका पीछे सरकना दर्ज किया गया है । यह अनुमान लगाया गया है कि २०३० तक ग्लेशियर लुप्त हो सकता है । ग्लेशियर विज्ञानियों के अनुसार पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर के स्त्रोत के इतने निकट भारी मशीनरी गतिविधियां केवल ग्लेशियर के पीछे हटने की दर को बढ़ाने जा रही हैं ।

पर्यावरणविद्‌ क्या कहते हैं?
W W F ने दर्ज किया है कि विश्‍व की “१० संकटग्रस्त नदियों” में गंगा एक है तथा पृथ्वी पर १२ मुख्य रूप से संकटग्रस्त स्थानों में हिमालय शामिल है । इन परियोजनाओं के माध्यम से एक मार्ग से हम दोनों का ही विनाश कर रहे हैं ।

स्थानीय रूप से इन परियोजनाओं का क्या मायने है?
यदि कोई सोचता है कि ये परियोजनाएं स्थानीय रूप से भौतिक समृद्धि लाती है तो वह पूर्णत गलती पर है, विस्तृत रूप से जो वहां पाया जाता है वह है-
* जल स्त्रोतों का हास - सारे गांव पीने का जल खो चुके हैं ।
* विस्फोटों से घरों में दरारें ( यह क्षेत्र जोन ५ में है जो कि भारत में भूकंओ की सर्वाधिक संभावना वाला क्षेत्र है।) यह घर इस प्रकार भूकंप क्षेत्र में लोगों के रहने के लिए अत्यंत असुरक्षित हो गये हैं ।
* भूमि का क्षय एवं इस प्रकार जीविका एवं आय का क्षय ।
* चारेयुक्‍त भूमि एवं जंगलों का क्षय जिसपर की पहाड़ीजन भारी रूप से निर्भर हैं ।
* पर्यटन द्वारा चलने वाली जीविका का क्षय- जोकि निश्‍चित ही गंग अके क्षय से, भूस्खलन से और प्राकृतिक सुंदरता के विनाश से गहरे रूप से प्रभावित होने जा रहा है ।
* स्थानीय संस्कृति का क्षय जोकि गंगा के चारों ओर व्याप्त है ।
* बांध कर्मियों के द्वारा शीत में नीचे आने वाले वन्य जीवों का शिकार ।

क्या यह परियोजनाएँ रोजगार उपलब्ध कराती हैं?
परियोजना विवरणों में यह स्पष्ट स्वीकारा गया है कि बहुत रोजगार खुलन अप्रत्याशित नहीं है । वस्तुतः कार्यरत बांध में बहुत कम कर्मचारियों की आवश्यकता है । उदाहरण के लिए पिछले २० वर्षों से कार्यरत मनेरी बांध १ में केवल ७० लोगों की नियुक्‍ति है (जिले की जनसंख्या ३ लाख है) । यहां तक कि निर्माण के अस्थायी रूप से मजदूरी या ठेके पर कार्य कर रहे हैं । अतः यह निश्‍चित रूप से देखा जा सकता है कि लंबे चरण के लिए इन परियोजनाओं ने रोजगार के अवसरों को, स्वतंत्रता को, प्राकृतिक संसाधनों को कम किया है और कुल मिलाकर क्षेत्र को गरीब बनाया है । गरीब और गरीब हुआ है ।

निर्माण कंपनियों की आचार नीति ?
हालांकि धूसरी गाद के खुले रूप में गंगा में डाले जाने का प्रमाण चित्र है, किंतु क्षेत्र में कार्यरत NTPC कंपनी ने सूचनाधिकार द्वारा की गई पूछताछ में बताया कि “गंगा में कोई धूसरी गाद नहीं डाली जा रही है” । वे इस बात से भी साफ इंकार करते हैं कि उनके द्वारा कराये जा रहे विस्फोटों से घरों में दरारें आ रही हैं । यद्यपि घाटी के दोनों ओर के ६ गांवों के लोगों ने घरो के हिलने, दरारें आदि की शिकायतें की हैं, इस प्रकार उन्हें किसी उत्तरदायित्व का आभास नहीं है । इस संबंध में सभी परीक्षण कंपनियों के द्वारा नियुक्‍त एजेंसियों के माध्यम से कराये गये हैं । अतः इन्हें निष्पक्ष कहना कठिन है । उनके द्वारा नियुक्‍त स्थानीय मजदूर स्वतंत्र रूप से ईधन के लिए जंगल से लकड़ी काटने और जंगल नदी आदि को शौच के लिए प्रयोग करने की बात स्वीकारते हैं । यद्यपि उनके लिए यह सब नहीं करने की प्रतिबद्धता है । उत्तरांचल जल विद्युत निगम द्वारा किए गए कार्य के दौरान ५ वर्षों से सीमेंट नदी में डाला गया सीमेंट स्थानीय लोगों के खेतों में भी जम गया और खेत बंजर हो गये ।
कंपनियों ने सूचनाधिकार द्वारा की गई पूछताछ का जबाव नहीं दिया और स्वभावतः वे सूचनाओं की भागीदारी में तत्पर नहीं है । स्थानी लोगों को हिंदी में कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराये गये ।

क्या ये परियोजनायें चलने योग्य हैं?
सूचनाधिकार से की गई पूछताछ में बताया है कि पहले से ही स्थित मनेरी बांध १ पिछले १० वर्षों से ९० मेगावाट क्षमता का मुश्‍किल से ५०% उत्पादन दे रहा है । U.J.V.N द्वारा कारण भागीरथी में सदियों में कम पानी का होना और बरसात में अत्यधिक गाद का होना बताया गया है । ये चार परियोजनाएं जो कि उत्तर काशी में ऊपरी जल धारा पर प्रस्तावित हैं कुल मिलाकर १००० मेगावाट के हैं । तेजी से घटते ग्लेशियर, ग्लोबल वार्मिग आदि के साथ इनका चलना कैसे स्वीकारा जा सकत अहै । ये परियोजनाएं लंबे समय तक स्वयं को कैसे बचाए रख सकती हैं?

एक अद्वितीय नदी?
अपनी स्वतः शुद्धता के गुणों के लिए गंगा प्रसिद्ध है, परंपरागत रूप से यह एक ज्ञात तथ्य है कि बिना किसी क्षय के गंगा जल कितने भी लंबे समय के लिए रखा जा सकता है । जबकि अन्य जल ऐसे रखने पर क्षय हो जाते हैं । वैज्ञानिक अध्ययन भी इस तथ्य को दृढता से प्रमाणित करते हैं । शायद विश्‍व में अपने तरह की यह एकमात्र नदी है ।

क्या अद्वितीय गंगाजल अब भी गंगाजल है?
नहीं, ये परियोजनाएं स्वीकारती हैं कि जल का तापमान बढ़ेगा, प्रवाह दर घटेगी, जलीय जीव एवं वनस्पति नष्ट हो जायेंगे । जल स्वाभाविक रूप से हिमालयी चट्‌टानों से न बहकर सीमेंटी सुरंगों से होकर गुजरता है । पहले से ही कंपनियों द्वारा सीमेंट को नदी में डालने के, धूसरी गाद के एवं अन्य अपशिष्ट पदार्थों के नदी में डालने के प्रमाण है । इस प्रकार गंगाजल की गुणवत्ता ठीक इसके स्त्रोत से ही विनाश के कगार पर है । इस प्रकार संपूर्ण नदी ही विनाश के प्रभाव में आ रही है ।

लगभग १०० वर्ष पूर्व हुए समझौते की अनदेखी की जा रही है?
लगभग शताब्दी पूर्व जब अंग्रेज गंग अके प्रवाह को हरिद्वार में रोकने की योजना बना रहे थे । मदनमोहन मालवीय और कुछ राजा, चारों शंकराचार्य तथा जनत ऐसके विरोध में संगठित हुई । अंग्रेज मंद हो गये, संयुक्‍त प्रांतीय मुख्य सचिव ICS आर. बर्नस्‌ ने २०/४/१९१७ को गंगा के प्रवाह को मुक्‍त बनाए रखने का आदेश (संख्या-१००२) जारी किया । जिन आध्यात्मिक परंपराओं क अएक परदेशी सरकार ने तक सम्मान किया, आज हमारे अपने नेता इन्हें तोड़ रहे हैं ।

एक स्वर्गिक नदी
गीता में अपनी शेष्ठ अभिव्यक्‍तियों के वर्णन में कृष्ण घोषित करते हैं, “समस्त जल स्त्रोतों में मैं गंगा हूँ” स्वामी विवेकानंद ने कहा- ‘गीता और गंगा हिन्दुओं का हिन्दुत्व निर्मित करते हैं.. जन्म से मुत्यु तक करोड़ों जन इसकी जल की बूंदों का आदरभाव से पान करते हैं । यहां तक की विदेशी भूमि से लोग उनकी राख को इसके प्रवाह में प्रवाहित कर स्वयं को धन्य समझते हैं । हमारे अस्तित्व में समाहित गंग अके स्थान से जुड़े निर्विवाद एवं स्वतः प्रमआणित तथ्यों को पूर्णतः अनदेखा किया जा रहा है ।

अंतिम आघात
जब पर्यावरण आकलन रिपोर्ट बताती है कि क्षेत्र में चलने वाली विभिन्‍न परियोजनाओं द्वारा कोई भी ऐतिहासिक, धार्मिक या पुरातात्विक स्मारक प्रभावित नहीं हो रहे हैं, - तो यह कथन सभी प्रतीकों में सर्वशक्‍तिमान, सभी पूजाओं का सार, सबसे प्राचीन, सभी परंपराओं की ऐतिहासिक स्वयं गंगा का आश्‍चर्यजनक रूप से परित्याग करता है । इस प्रकार यह परित्याग एक बड़ी भारी भूल है, समस्त राष्ट्र का भारी अपमान है ।

स्वाभिमान रहित राष्ट्र
गंगा के गुणों और प्रवाह के विनाश के साथ गंग अको लुप्त होने दिया जाना प्रदर्शित करता है एक महान तिरस्कार हमारे प्राचीन भारत का, उन पीढ़ियों का जिन्होंने उसका मां और देवी की तरह पूजन किया, उन वर्तमान भारतीयों का जो करते हैं और भविष्य के भारत का जिसकी राष्ट्रीय और आध्यात्मिक धरोहर के प्रयोग से हम उसे वंचित कर रहे हैं ।

* पृथ्वी पर तथा मानव शरीर में जल का भाग लगभग ७०% है, तथा जल किसी भी प्रकार की जैव-विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा के प्रति अति संवेदनशील है ।
* जल पर व्यक्‍ति के विचारों, भावनाओं, प्रतिक्रियाओं से उत्पन्‍न ऊर्जा का गहरा प्रभाव होता है, प्रार्थना या शुभ विचारों के प्रभाव में लाये गये जल के क्रिस्टल स्वरूप में परमाणुओं एवं अणुओं का एक सुन्दर, सुव्यवस्थित और आकर्षक क्रम दिखता है वहीं अशुभ या दुर्भावनाओं से प्रभावित जल के स्वरूप में अणु-परमाणुओं की व्यवस्था पूर्णतः खंडित एवं कुरूप हो जाती है ।
* इसी प्रकार बहते झरने, नदियों के जल का स्वरूप स्वस्थ, सुन्दर एवं सुव्यवस्थित है, वही बांधों में रूके, स्तब्ध, सड़ते जल का स्वरूप बिगड़ा हुआ, खंडित सा है, जो यह सिद्ध करता हैं, कि शुद्ध, मुक्‍त अविरल प्रवाह से निर्मित जलीय जीवन एवं उसका मूल तत्व, प्रवाह को रोकने उसे बांधने तथ अबलपूर्वक नैसर्गिक प्रवाह को बदल देने से परिवर्तित एवं विक्षिप्त हो जाता है ।
इस प्रकार वैज्ञानिक दृष्टि से भी सदियों से गंगा के प्रवाह से सम्बद्ध रीति-रिवाज, परम्परायें, करोड़ों जनों की श्रद्धायें, आस्थायें तथा ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रहने के कारण गंगा जल के भीतर एक विशिष्ट आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रवाह भी सम्बद्ध है,
हिमालय क्षेत्र की विशेष पारिस्थितिकी, पर्यावरण, एवं तीव्र, डलानदार घाटी की भौगोलिकता से जुड़ा गंगा का नैसर्गिक प्रवाह अद्वितीय भौतिक विशेषतायें प्राप्त करने के साथ ही इस प्रकार एक शुभ विचारों, भावनाओं , मंत्रों, तप, जप के साथ ऋषियों-साधुओं के स्नान एवं आश्रमों के वातावरण से गुजरकर आध्यात्मिकता से अनुप्रआणित हो मैदानी क्षेत्रों में उतरता है, तो वहीं ऋषिकेश, हरिद्वार, प्रयास, काशी, पटना, क्लकत्ता से होकर गंगासागर तक इसके तट पर सैकड़ों तीर्थ, हजारों मंदिर, घाट इत्यादि भावनात्मक एवं वैचारिक रूप से जल को समृद्ध करते है ।

“गंगा के मूलत्त्व, आध्यात्मिकता एवं उसके गंगत्व का हास” ः-
वैज्ञानिकों ने पाया कि अन्य तमाम नदियों की अपेक्षा गंगा जल में २५ गुना अधिक आक्सीजन समाहित होती है, गंगा जल में स्वतः शुद्धता की क्षमता तथा रोगों का नाश करने की क्षमता अन्य नदियों के जल की अपेक्षा सर्वाधिक है, इसीलिए गंगाजल प्रधानतः शक्‍ति का द्योतक है, न कि पदार्थ का ।
सर्पिलाकार प्रवाह, घाटी की चट्टानों से उमड़ती-घुमड़ती धारा का सर्वाधिक संवेग, घाटी के तीव्र डलानयुक्‍त होने कारण उसके प्रवाह से जुड़ी ऐसी तमाम संवेदनशील तथा विशिष्ट भौगोलिक, पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिकीय विशेषतायें हैं, जो कि गंगा जल में दिव्य तथा औषधीय प्रभाव उत्पन्‍न करती हैं । गंगा की उद्‌गम घाटी में ही इसके प्रवाह को रोककर, बांधकर उसे बलपूर्वक भूमिगत बना देना, ठीक ऐसा ही है, जैसे कि एक स्वस्थ, ऊर्जावंत गतिशील व्यक्‍ति को बलपूर्वक बांधकर उसे कालकोठरी में बंद कर अपन अजीवन व्यतीत करने को बाध्य किया जाये, यह प्रयोग निश्‍चय ही व्यक्‍ति के स्वभाव उसके गुणधर्मो को बदलकर व्यक्‍ति को विक्षिप्त कर देगा ।
“ गंगोत्री से लेकर ऋषिकेश तक गंगा झीलों और सुरंगो में कैद की जा रही है, निश्‍चय ही गंगाजल का तत्व जो कि विशिष्ट वैज्ञानिक विशेषतायें समाहित किये हैं उसके नैसर्गिक प्रवाह से जुड़ा है, तथा स्त्रोत से ही गंगा को लुप्त कर झीलों और सुरंगों में कैदकर देना उसके मूल तत्व को ही परिवर्तित कर देगा, ” ।
- प्रो० यू० के० चौधरी (वैज्ञानिक, गंगा अनुसंधान प्रयोगशाला, BHU)

“उठो आज गंगा माता पर संकट के घन छाये हैं,
स्वार्थ लोभ की आंधी में गंगा को लोग भुलाए हैं ॥
आज धर्म धन से हारा है, गंगा का भी दाम लगा,
लोप हुआ स्वाभिमान राष्ट्र क अलिप्सा और अज्ञान जगा ॥
गंगा संस्कृति गंगा है मान, गंगा जो देश की है पहचान ।
चलो बूढ़ों, बच्चों, नौजवान, अब मिलकर करें गंगा-आह्‍वान” ॥

प्रवाह ही जीवन है, गंग अके नैसर्गिक प्रवाह को छिन्‍न-भिन्‍न कर खंडित करना गंगा-जल के गंगत्व में निहित जीवन को कैसे प्रभावित करता है, यह हम हाल ही में जापान में “डॉ० इमोटो एवं उनके दल (Hado Institute, Japan)'' के द्वारा जल के ऊपर चल रहे शोध के माध्यम से जान सकते हैं । डॉ० इमोटो ने उच्च स्तरीय वैज्ञानिक संयंत्रों का प्रयोग कर जल के विभिन्‍न क्रिस्टल संरचनाओं के चित्र लिये, चित्रों के विश्लेषण से निम्न निष्कर्ष प्रमाणित हुए ।
“ इस प्रकार निश्‍चत ही स्त्रोत से ही इसके प्रवाह के साथ निर्ममता से इतनी बड़ी छेड़छाड़ इसके प्रवह से जुड़ी परम्पराओं तथा संस्कृति को समाप्त कर गंगाजल के तव, इसकी आध्यात्मिकत अऔर इस प्रकार गंगा के गंगत्व का हास कर रही है । ”

गंगा की पुकार - “आह्‍वान”

‘मुक्‍त प्रवाहित गंगा मेरे देश, हमारी संस्कृति का एक अविच्छिन्‍न अंग है और हमारी धरोहर है, जल ऊर्जा के उत्पादन अथवा अन्य किसी भी कारण से इसके प्रवाह के विनाश एवं सुरंगों में चले जाने का मैं दृढ़ रूप से विरोध करता हूँ हमें अपने पूर्वजों द्वारा एक स्वच्छ पर्यावरण, समृद्ध प्रवाहमान नदियआं एवं अत्यंत सुंदर संस्कृति मिली है ।
अंतःकरण मांग करत अहै कि हम अपने देश की आनेवाले पीढ़ियों के लिए इसे उसी रूप में बिना किसी हानि के छोड़कर जायें ।
केवल उपभोग ही हमारी विकास प्रक्रिया का अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता ।
इस देश का नागरिक होने के नाते मैं मांग करता हूँ कि गंगा के प्रवाह को गंगोत्री से मैदानी भागों तक मुक्‍त एवं छेड़छाड़ रहित रखा जाये ।

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