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अलग मिथिला राज्य आंदोलन पर एक पैनी दृष्टि

अलग मिथिला राज्य की माँग वर्षों पुरानी है । इसके लिए कई बार धरना प्रदर्शन सभी, गोष्ठियाँ तथा माँगपत्र दिए जा चुके हैं । ३ अगस्त २००४ में बिहार से अलग करके झारखंड राज्य का गठन किया गया । ४ अगस्त २००४ को एक प्रेस कांफ्रेंस में बिहार के पूर्व महाधिवक्‍ता एवं भाजपा नेता पं० ताराकांत झा ने अलग मिथिला राज्य हेतु आंदोलन की घोषणा की । वे चंदा झा के रामायण तथा महाविष्णुपुराण के अनुसार मिथिला के गठन के पैरोकार रहे । भाजपा से निष्काशित होने पर वे मिथिला आंदोलन को हवा देते रहे परन्तु विधान परिषद सदस्य बनते ही अआंदोलन को ढंढे बस्ते में डाल दिया ।
वर्तमान में अलग मिथिला राज्य हेतु सर्वाधिक सक्रिय संस्था “अंतर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद” की बागडोर मुख्यतः डॉ० धनाकर ठाकुर एवं डॉ० कमलाकान्त झा ने संभाल रखी है । अधिकांश राज्यों में संस्था ने अपनी प्रदेश शाखाओं का विस्तार एवं जनसंगठन तैयार किया है । संस्था द्वारा दिसंबर में कानपुर में राष्ट्रीय अधिवेशन एवं जंतर-मंतर पर धरने का आयोजन किया गया जिसमें आंदोलन से जुड़े जमीनी कार्यकर्त्ताओं की सहभागिता रही । उधर विद्यापति सेवा संस्थान के महासचिव वैद्यनाथ चौधरी बैजू “अंतर्राष्ट्रीय मैथिली सम्मेलन” का छठा अधिवेशन २१-२२ दिसंबर २००९ को तिरूपति बालाजी में आयोजित की । मुख्य रूप से इनका मकसद मैथिली आंदोलन की आड़ में धनसंग्रह व अपने हित हेतु चंद लोगों को उपकृत करना व एक कॉकस निर्माण का रहा । साहित्य अकादमी जैसी सरकारी संस्था को भी धूल झोंकने में सफल रहे । परिवारवाद को प्रश्रय देने तथा मैथिली को वर्गविशेष की भाषा के रूप में जानने का श्रेय इनको अवश्य दिया जा सकता है । बैजू एवं अमर के गठबंधन की गाथा से मिथिला के हर जागरूक नागरिक अवगत हैं । इन्होंने मैथिली को जनभाषा तो नहीं ही बनने दिया बल्कि मैथिली के नाम पर एक जागीर खड़ी की । पुरस्कार, अनुदान एवं विभिन्‍न संस्थाओं की योजनाओं पर इनकी गिद्धदृष्टि रहती है । इनके सद्‌प्रयासों से मिथिला के दलित, सर्वहारा मजदूरवर्ग एवं मुस्लिम जमात का समर्थन मिथिला आंदोलन को नहीं मिल पाया ।
स्व० जयकांत मिश्र ने मैथिली की सर्वाधिक सेवा तो की ही, साथ ही मिथिला आंदोलन को खड़ा करने के लिए “मिथिला राज्य संघर्ष समिति” का गठन किया था । वर्तमान में चुनचुन मिश्र इसके अध्यक्ष एवं उदयशंकर मिश्र इस संस्था के महासचिव हैं ।
अंतर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद के डॉ० कमलाकान्त झा कहते हैं कि “मिथिला राज्य हड़प लिया गया है, वह हमको वापस चाहिए । वैशाख शुक्ल नवमी (सीताजी का जन्म दिवस) को जगत जननी जानकी नवमी के रूप में स्थापित कर राष्ट्रीय नारी दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिये । गुरू गोविन्द सिंह की जयंती की तरह सीताजी की जयंती मनाने से नारी, मैथिली और मिथिला तीनों को सम्मान मिलेगा । शासन- प्रशासन की सुविधा के हिसाब से यूनिट छोटा हो गया है । जिला, अनुमंडल, पंचायत, प्रखंड छोटा हो गया है तो राज्य क्यों नहीं ? द्रुत विकास, आर्थिक विकास, प्रशासनिक सुविधा हेतु भारतीय संविधान के अनुसार अलग मिथिला राज्य का जल्द से जल्द गठन होना चाहिये । इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय सुगौली संधि की पुर्नसमीक्षा की जानी चाहिए ।
दिल्ली में प्रवासी मैथिलों को जोड़ने में “अखिल भारतीय मिथिला संघ” के अध्यक्ष पूर्वसांसद राजेन्द्र प्रसाद यादव की अस्वस्थता एवं महासचिव विजय चंद झा की कम सक्रियता की वजह से दिल्ली में मिथिला आंदोलन फिलहाल शांत है परन्तु यूथ ऑफ मिथिला (अंतर्राष्ट्रीय मैथिली परिषद की दिल्ली इकाई) के भवेश नंदन जमीनी कार्यकर्त्ताओं, युवाओं एवं बुद्धिजीवियों को जोड़ने में जुटे हैं । उनका मानना है कि देर सबेर ही सही उनका प्रयास रंग लाएगा । मिथिला आंदोलन के संदर्भ में मुंबई के चक्रधर झा की कुछ अलग सी राय है । वे मानते हैं कि “मिथिला के बुद्धिजीवी वर्ग धीरे-धीरे आक्रोशित हो रहा है । दलित मैथिल के हाथ में नेतृत्व दिए जाने से आंदोलन प्रखर होगा ।
मैथिली नाटक के माध्यम से अलख जगाने में दिल्ली की सुप्रसिद्ध संस्था ‘मिथिलांगन” एवं “मैलोरंग” न केवल नाट्‌य विधा बल्कि मैथिली साहित्य के प्रकाशक के आधारभूत स्तंभ है । जहाँ मिथिलांगन में अभयलाल दास संजय चौधरी, सुंदरम एवं कुमार शैलेन्द्र की टीम तेजी से सक्रिय है वहीं दूसरे तरफ राष्ट्रीय नाट्‌य विद्यालय की पत्रिका रंगप्रसंग के उपसंपादक एवं मैलोरंग के महासचिव प्रकाश झा सुविख्यात नाट्‌यकर्मी महेन्द्र मलंगिया के संरक्षण व निर्देशन में युवाओं को मैथिली रंगमंच से जोड़कर आंदोलन का प्लेटफॉर्म तैयार कर रहे हैं ।
संक्षेप में कहा जाय तो भले ही मिथिला आंदोलन शांत दिखता हो परन्तु अंदर की ज्वालामुखी कभी भी फट सकती है । यह शांति आंदोलन की आंधी के आगाज जैसा ही है ।

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