Skip to main content

लाखों की साईकल और फोल्डिंग साईकल

विदेशी साईकिल आयातक कंपनी फायरफौक्स का स्टाल प्रगति मैदान का मुख्य आकर्षण है क्योंकि इनके स्टाल पर लाखों की साईकल और फोल्डिंग साईकल मिलती है | ऑटो ज़ोन स्पीड के मुख्य प्रतिनिधि गोपाल प्रसाद से कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर शिव इंदर सिंह की बातचीत के मुख्य अंश:
*ऐसी क्या खासियत है की आपकी साईकिल इतनी महँगी है?
मुख्य अंतर टेक्नोलोजी का है. आज के जागरूक बच्चे इन्टरनेट पर हर नयी तकनीक का अवलोकन कर रहे होते है. ऐसी स्थिति में वे चाहते है की अत्याधुनिक तकनीक की साईकिल भारत में मिले और हमने उसी कमी को पूरा किया है .इन्टरनेट यूजर बच्चे ही हमारे ग्राहक बनाते हैं. साईकिल इंडस्ट्री में तकनीक का महत्त्व है . प्राईस लेबल पर हमारा मार्केट अलग है हमारा ध्यान इन्ज्वायमेंट, स्वास्थ्य तथा भारतीय तकनीक में सर्वोच्च अंतर्राष्ट्रीय मानकों का ख्याल रखना है .
*आपकी मार्केटिंग रणनीति क्या है?
मार्केट बदल रही है . आम डीलर को फ्रेंचाईजी नहीं देते उनका अपना शोरूम होना चाहिए . मर्सीडीज को एम्बेसडर के शोरूम से नहीं बेच सकते .
*सरकार से साईकिल उद्योग को क्या सहयोग मिल रही है?
सरकार साईकिल इंडस्ट्री के प्रति गंभीर नहीं है. साईकिल लें में खम्बे, रोड ठीक नहीं . गाड़ियों को घटाना हो तो साईकिल को बढ़ाबा देने हेतु बी आर टी को पूरी दिल्ली में फैलाना चाहिए. हमलोग साइकिलिंग चैम्पियनशिप, पुणे तथा दिल्ली में स्पोंसेर्शिप के माध्यम से सहयोग करते रहते हैं. ऑटो पत्रिका, विद्यालय आदि के माध्यम से हम अपनी मार्केट बना रहे हैं. इंडिया में कंपोनेंट नहीं है , हमें विदेश से आयात करना पड़ता है . हमने यह कंपनी २००५ से शुरुआत की है और अपनी उपलब्धि से संतुष्ट हैं.
*अपने बचपन और साईकिल के सम्बन्ध में कुछ बताबें ?
जब हम बच्चे थे , साइकिल नहीं मिलाती थी हम अभिभाबकों से कहेंगे की अपने बच्चों को साईकिल की आदत डालें क्योंकि इसकी आदत बहुत जरूरी है. इससे आजादी, संतुलन , स्वास्थ्य और उत्तरदायित्व की भावना बढ़ती है जिससे जीवन को बैलेंस मिलता है.

Comments

Popular posts from this blog

वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चों को एक परिपक्व इन्सान बनाना होता है, ताकि वो कल्पनाशील, वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और देश का भावी कर्णधार बन सकें, किन्तु भारतीय शिक्षा पद्धति अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त कर सकी है, कारण बहुत सारे हैं । सबसे पहला तो यही कि अंगूठाछाप लोग डिसा‌इड करते हैं कि बच्चों को क्या पढ़ना चाहिये, जो कुछ शिक्षाविद्‍ हैं वो अपने दायरे और विचारधारा‌ओं से बंधे हैं, और उनसे निकलने या कुछ नया सोचने से डरते हैं, ऊपर से राजनीतिज्ञों का अपना एजेन्डा होता है, कुल मिलाकर शिक्षा पद्धति की ऐसी तैसी करने के लिये सभी लोग चारों तरफ से आक्रमण कर रहे हैं, और ऊपर से तुर्रा ये कि ये सभी लोग समझते हैं कि सिर्फ वे ही शिक्षा का सही मार्गदर्शन कर रहे हैं, जबकि दर‌असल ये ही लोग उसकी मां बहन कर रहे हैं । मैं किसी एक पर दोषारोपण नहीं करना चाहता, शिक्षा पद्धति की रूपरेखा बनाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिये और सोचना चाहिये, कि क्या उसमें मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है। आज हम रट्टामार छात्र को पैदा कर रहे हैं, लेकिन वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और परिपक्व छात्र नहीं, क्या यही हमा…

राजनीति में भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार और राजनीति का एक गहरा संबंध है । जहां हम विकास की एक नई गाथा को रचने का सपना संजोए हुए हैं वहीं दुनिया के सामने हमारी गरीबी की सच्चाई को स्लमडॉग मिलेनियर जैसी फिल्मों के सहारे परोसा जा रहा है । आज हम भ्रष्टाचार के मामले में बंग्लादेश, श्रीलंका से भी आगे हैं ।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री सह सांसद मधुकोड़ा का मामला भ्रष्टाचार के मामले में सामने आया है । जिसमें ४ हजार करोड़ के घपले का पता चला है । कोड़ा का नाम भी उन राजनेताओं में जुड़ गया है जो भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाये गए हैं या घिरे हुए हैं । भ्रष्टाचार को फैलाने वाले राक्षस सत्ता में आसीन राजनीति के शीर्ष नेता हैं इसकी शुरूआत भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय से ही हो गई थी । १९५६ में खाद्यान्‍न मंत्रालय में करोड़ों रूपये की गड़बड़ी पकड़ी गई । जिसे सिराजुद्दीन काँड के नाम से जाना जाता है । उस समय केशवदेव मालवीय खाद्यान्‍न मंत्री थे उन्हें दोषी पाया गया । १९५८ में भारतीय जीवन बीमा में मुंधरा काँड हुआ जिसकी फिरोज गाँधी ने पोल खोली थी । १९६४ में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए “संथानम कमिटी” का गठन किया गया ।…

एक आरटीआई एक्टिविस्ट के संघर्ष की कहानी, उसी की जुबानी

पिताजी गुरु भी थे। गरीबी, प्राइवेट ट्यूशन वगैरह करके आजीविका चलाते; परिवार चलाने के साथ-साथ सारे समाज, देश की चिंता उनका प्रमुख स्वभाव रहा। हमेशा दूसरों से कुछ अलग करने की चाह; सीमित संसाधनों में भी देश, समाज और मित्रों के लिए समय निकालना; शायद उनका यही स्वभाव मेरे मस्तिष्क में रच-बस गया, कार्यशैली का हिस्सा बन गया। छात्र जीवन बहुत फाकाकशी, गरीबी का रहा, लेकिन मेरे पिताजी ने अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया। हमारे मकान का धरन (कड़ी) लकड़ी का था, जो टूट गया था। उसी पर पूरे छत का लोड था। मकान कब गिर जाय, कुछ ठिकाना नहीं।प्लास्टिक के टेंट लगाकर रहते थे। कभी घर में चूल्हा भी नहीं जलता था। ऐसी ही परिस्थितियों में एक बार गुल्लक तोड़ा, तो पाँच रुपए निकले। उन्हीं से दो किलो चूड़ा लाया था। उसी को भिंगोकर, नमक-मिर्च लगाकर सपरिवार ग्रहण किया। अपनी शादी बिना तिलक-दहेज के की। दो बहनों की शादी आज से बीस साल पहले दिल्ली में मात्र सत्रह हजार की मामूली रकम में ही की। दोनों बहनों की शादी एक ही तिथि में किया। हमारे समाज (अखिल भारतीय खटिक समाज) के जो राष्ट्रीय पदाधिकारी थे, उन्होंने अपना मकान पंद्…