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कुछ सत्य घटनायें

१ * ईसाईयों ने गोवा में जहां लाखों निरपराध हिन्दू स्त्री, पुरूषों व बच्चों का कत्‍ल किया, वहाँ २८० मन्दिर भी तोड़े और दैनिक जीवन पर अनेक प्रतिबन्ध लगाये । जैसे हिन्दू रीति-रिवाजों के तहत विवाह व नामकरण संस्कार न करने देना, यज्ञोपवीत न होने देना, चोटी न रखने देना, घर के आँगन में तुलसी का पौधा न लगाने देना आदि । जिन हिन्दू स्त्रियों ने अपने साथ बलात्कार का विरोध किया, उन्हें जेलों में डालकर अपनी कामवासना की पूर्ति के बाद उन्हें हेरेटिक्स यानी ईसाई अन्धविश्‍वासी कहकर जिन्दा जलाने का आदेश दे दिया ।
२ * जब मदर टेरेसा से पूछा गया कि आप वहां के गरीबों को बिना ईसाई बनाये सहायता क्यों नहीं करतीं तो उन्होंने उत्तर दिया “बाइबिल में लिखा है कि जो ईसाई बनकर बयतिस्मा लेंगे, वे बचाये जायेंगे, शेष नष्ट कर दिये जायेंगे ।” इसी मदर टेरेसा को नवम्बर १९९४ में बी.बी.सी फिल्म में ‘नरक की परी’ कहा था ।
३ * हिन्दूओं को धोखे से ईसाई बनाने के लिये उत्तरांचल के गढ़वाल क्षेत्र के पर्वतीय नगर में योग आश्रम तथा अहमदाबाद से १२० किमी. दूर सच्चिदानन्द आश्रम के नाम से दो रोमन कैथोलिक चर्च चल रहे हैं । यहाँ की रूप रेखा व रहने वाले लोगों के नाम तथा मन्दिर जैसा रूप देखकर कोई भी हिन्दू धोखा खा सकता है । दोनों स्थानों पर ईसा मसीह को भगवान बनाकर कमल में बिठाया हुआ है ।
४ * संविधान के अनुच्छेद १४ के अनुसार कोई भी व्यक्‍ति अनुसूचित जाति से ईसाई बनने पर पहले की भांति सुविधायें प्राप्त नहीं कर सकता । इसके साथ ही ६ जून १९३६ को भारतीय गजट के अनुसार संविधान के अनुच्छेद ३६६ और ३९१ के अन्तर्गत स्पष्ट है कि कोई भी दलित ईसाई अनुसूचित जाति में नहीं आता ।
अब भारत के लोग जागें और दलित ईसाइयों के आरक्षण का डटकर विरोध करें । दलितों को सावधान करते हुये हम कहना चाहते हैं कि वे इस लोभ में पड़कर ईसाई न बनें कि वे बहुत ऊँचे समझे जायेंगे क्योंकि “फ्रंटलाइन” २९ दिसम्बर १९९५ में श्रीमान्‌ जफेता मसीह का स्पष्ट बयान है- “ईसाई बनने पर भी हम दलितों को उच्च जाति में नहीं मिलाया जाता । चर्च में हमें कहीं और बैठने की इजाजत न होकर केवल बाँये हाथ बैठना होता है । हम उच्च ईसाइयों के घरों में नहीं जा सकते, हम उनकी दुकानों पर हजामत नहीं बनवा सकते । हमारे पहले पानी पी लेने पर वे उन नलों को अछूत समझकर धोते हैं फिर पानी पीते हैं ।
(झारखण्ड वनांचल टाइम्स, अंक 13, 2008 से साभार)
- डॉ. ए. कीर्तिवर्द्धन

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