Skip to main content

सत्य अहिंसा का नहीं, बल्कि घोटालों का देश बन गया बापू का भारत

झारखंड जैसे पिछड़े प्रदेश में वहाँ के मुख्यमंत्री ने ही इतना बड़ा घोटाला किया, यकीन करना मुश्किल लगता है, लेकिन ये है सच । मधू कोड़ा, जी हाँ ये वही मधू कोड़ा हैं जो एक छोटे से गरीब परिवार से आते हैं और काफी संघर्ष करते हुए उन्होंने झारखंड के मुख्यमंत्री पद को हथिया लिया । मधू कोड़ा आदिवासी परिवार में आते हैं । इन्होंने अपने जिंदगी में इतने संघर्ष किये कि जिसके कारण इन्होंने शादी भी मुख्यमंत्री बन जाने के बाद की ।
मधू कोड़ा और उनके साथियों ने मिलकर कोड़ा शासनकाल के दौरान झारखंड में करोड़ों डॉलर का घोटला किया । इस घोटाले की रकम तकरीबन ४००० करोड़ आंकी जा रही है । भारत एक विकासशील देश है, और यहाँ एक मुख्यमंत्री अपने शासनकाल के दौरान लाख-पचास नहीं ४००० करोड़ का घोटाला कर जाता है । जिस देश में आधी से ज्यादा आबादी एक वक्‍त भूखे पेट सोती है, उस देश की ऐसी हालत चिंताजनक ही नहीं विचारणीय है ।
कोड़ा और उसके साथियों ने मिलकर करोड़ों का वारा न्यारा किया । इनके तार दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों- लाओस, वियतनाम, थाईलैण्ड आदि से लेकर यूरोप, अमेरिका तक फैले थे । खाड़ी के देश भी इसमें शामिल हैं । इन्होंने थाईलैण्ड आदि देशों की करोड़ों की जमीनें खरीदी एवं वहाँ पर उद्योग लगाए और निवेश किया, ये सारे कार्यकलाप गैरकानूनी ढंग से बनाए गये पैसों से किया गया, जिससे देश को इसका नुकसान उठाना पड़ेगा । इस खबर के प्रकाश में आने के बाद प्रशासन तो हरकत में आती है, लेकिन सी आई डी जाँच, सीबीआई जाँच, ये सभी चीजें अब इस देश में मात्र औपचारिकता ही लगती है । अगर हम थोड़ी देर के लिए भूतकाल में जाएं तो हमें पता चलेगा कि करीब एक दर्जन से अधिक घोटाले इस गरीब देश ने झेले हैं । एक से एक बड़े नाम इन घोटालों में शामिल हैं । घोटला लाख-करोड़ का नहीं अरबो-खरबों का रहा । किसने किया घोटाला- बड़े-बड़े नेताओं ने, अफसरों ने, अधिकारियों ने, ठेकेदारों ने । जब किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री ही घोटाले करने लगे तो फिर कानून-व्यवस्था, सुशासन और सरकार जैसी संस्थाओं से आम आदमी का विश्‍वास उठने लगता है ।
भारत में घोटाला होना कोई नई बात नहीं है । इस देश में अभी तक एक दर्जन से अधिक घोटाले हो चुके हैं । भारत में हुए घोटालों का एक संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है ः-
बोफोर्स घोटाला- इन घोटालों को १९८० के दशक में अंजाम दिया गया था । इसके मुख्य अभियुक्‍त राजीव गांधी थे । इस मामले भारत को १५५ एम एम के फिल्ड होविज्जर खरीदने थे । इस खरीदारी में मध्यस्थता करने वाला इटालियन नागरिक ओटावियो कवात्रोची एक बिजनसमैन था जो राजीव गांधी का करीबी माना जाता था । उसी ने डील फाइनल करवायी थी । यह करीब ६४० में सरकार की खूब किरकीरी हुयी थी । इस घोटाले के कारण १९८९ के आम चुनावों में राजीव गांधी की कुर्सी भी छिन गयी थी । ५ फरवरी २००४ को इस मामले में राजीव गांधी एवं अन्य पर घूस लेने के आरोप लगाये गये ।
चारा घोटाला- बिहार के दो मुख्यमंत्रियों द्वारा इस घोटाले को अंजाम दिया गया । लालू प्रसाद यादव और जगन्‍नाथ मिश्रा इस घोटाले के मुख्य अभियुक्‍त थे । इन घोटालों में ९५० करोड़ डकारे गये । इसमें सीबीआई जाँच भी हुयी । यह १९९६ में प्रकाश में आया था ।
टेलीकॉम घोटाला ः-
इस घोटाले को (हिमाचल प्रदेश) के तीन बार के सांसद एवं ५ बार विधायक रहे सुखराम के द्वारा अंजाम दिया गया । सुखराम पीवी नरसिंहा राव के कैबिनेट में दूरसंचार मंत्री थे । सीबीआई ने उनके कार्यालय से ३.६ करोड़ रू. बरामद किये थे । सन २००२ में उनपर लगे आरोप में उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट ने ३ साल की कैद की सजा सुनाई ।
हवाला कांड ः-
१९९७-१९९८ के बीच एक सनसनीखेज घोटाला सामने आया था । हवाला घोटाला कांड । इस कांड में देश के बड़े-बड़े नेताओं, लाल कृष्ण आडवाणी, शरद यादव, माधवराव, सिधिंया बलराम जाखड़, मदनलाल खुराना, अजीत पांजा, मोती लाल वोरा, अर्जन सिंह, सरीखे नेताओं का नाम सामने आया था । इस घोटाले के बाद आतंकवादी संगठन हिज्बुल मुजाहिद्दीन से जुड़े पाये गये थे । यह तकरीबन १८ मिलियन अमेरिकी डॉलर का घोटाला था । इस घोटाले का पर्दाफाश करने में सीबीआई फेल हो गयी थी, जिससे उसकी काफी किरकिरी हुयी थी ।
बराक मिसाइल स्कैंडल -इसके मुख्य अभियुक्‍त थे समता पार्टी के आर-के जैन । इसमें जॉर्ज फर्नांडिस और जया जेटली के खिलाफ एफ आई आर दर्ज की गयी थी । इसमें भारत को १९९.५० मिलियन अमेरिकी डॉलर के ७ बराक सिस्टम और ६९.१३ मिलियन अमेरिकी डॉलर में २०० मिसाइल खरीदने थे । भारत सरकार ने २३ अक्‍टूबर २००० को इस कॉंट्रैक्ट पर साईन किया था । सन २००१ में तहलका के द्वारा यह मामला प्रकाश में आया था यह मामला अभी सीबीआई के अंडर में है । एक और तहलका मामला २००१में ही मैच फिक्सिंग पर आधारित है, और इसमें बड़े-बड़े क्रिकेटरों के नाम सामने आये थे ।
तेल के बदले अनाज घोटाला - नटवर सिंह इसके मुख्य अभियुक्‍त थे जो कि मनमोहन सिंह सरकार में विदेश मंत्री थे । इसमें इराक में संयुक्‍त राष्ट्र के द्वारा यह प्रावधान किया गया था कि इराक के लोगों की आमजनों की जरूरत की चीजों का निर्यात कर इराक से तेल खरीदें। इसी निर्यात में व्यापक पैमाने पर घोटाला किया गया जिसके बाद नटवर सिंह को इस्तीफा देना पड़ा ।
तेलगी घोटाला - नकली स्टांप पेपर बनाकर बेचने के आरोप में अब्दुल करीम तेलगी को कर्नाटक की पुलिस ने गिरफ्तार किया था । तेलगी अपने तीन सौ ऐजेंटों की सहायता से इस फर्जी कारगुजारी को अंजाम देता था । यह घोटाला तकरीबन २०२ करोड़ का था । इस मामले में तेलगी का नार्को टेस्ट लिया गया तो उसने शरद पवार, छगन भुजबल जैसे नेताओं का नाम भी लिया था । कोर्ट ने २८ जून २००७ को तेलगी को १३ साल की सजा सुनाई । बाद में उसे जेल में एच्‌आईवी पॉजीटीव पाये जाने पर दया दिखाते हुए छोड़ दिया गया ।
नोट के बदले वोट - २२ जुलाई २००८ को आप सबने संसद में देश की अस्मिता को तार-तार होते टीवी पर देखा होगा । जब बैग से ३०० मिलियन रू. के नगदी नोट सदन में बीजेपी के सांसद लहराते हुये क्रांग्रेस पर आरोप लगा रहे थे कि नोट के बदले विश्‍वास मत हासिल करने के लिए वोट मांगा जा रहा हैं । यह एक बहुत बड़ा सनसनीखेज मामला सामने आया था ।
सत्यम्‌ कंपनी घोटाला - ७००० करोड़ डकार गये बी रामलिंगम राजू तथा उनके परिवार वाले । सन २००१ से ही राजू और उसके परिवार वाले कंपनी से कैश निकाल रहे थे और बैलेंस सीट में फायदा दिखा रहे थे । इस मामले की जांच सीबीआई के साथ-साथ अमेरिका से आयी टीम ने भी किया । इस घोटाले से भारतीय बाजार पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा और मंदी के दौरे में और मंदी हो गयी, और सारे शेयर धड़ाम से नीचे आ गिरे । सत्यम घोटला भारतीय व्यापरिक जगत के लिए एक बहुत बड़ा झटका था । इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय व्यापार के साख पर प्रश्नचिन्ह सा लग गया था ।
अंत में बात ये है कि आखिर इतने घोटाले हो कैसे जाते हैं, सरकार क्या करती रहती है । घोटाले होते हैं कभी और मुजरिम को सजा मिलती है १०-१२ साल के बाद । अगर हालात इसी तरह बदतर होते रहे तो एक दिन देश के हर आदमी के हाथ में एक कटोरा होगा और वह अपना पेट पालने के लिए भीख मांगता दिखेगा ।
- धनु कुमार मिश्रा

Comments

Popular posts from this blog

वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चों को एक परिपक्व इन्सान बनाना होता है, ताकि वो कल्पनाशील, वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और देश का भावी कर्णधार बन सकें, किन्तु भारतीय शिक्षा पद्धति अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त कर सकी है, कारण बहुत सारे हैं । सबसे पहला तो यही कि अंगूठाछाप लोग डिसा‌इड करते हैं कि बच्चों को क्या पढ़ना चाहिये, जो कुछ शिक्षाविद्‍ हैं वो अपने दायरे और विचारधारा‌ओं से बंधे हैं, और उनसे निकलने या कुछ नया सोचने से डरते हैं, ऊपर से राजनीतिज्ञों का अपना एजेन्डा होता है, कुल मिलाकर शिक्षा पद्धति की ऐसी तैसी करने के लिये सभी लोग चारों तरफ से आक्रमण कर रहे हैं, और ऊपर से तुर्रा ये कि ये सभी लोग समझते हैं कि सिर्फ वे ही शिक्षा का सही मार्गदर्शन कर रहे हैं, जबकि दर‌असल ये ही लोग उसकी मां बहन कर रहे हैं । मैं किसी एक पर दोषारोपण नहीं करना चाहता, शिक्षा पद्धति की रूपरेखा बनाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिये और सोचना चाहिये, कि क्या उसमें मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है। आज हम रट्टामार छात्र को पैदा कर रहे हैं, लेकिन वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और परिपक्व छात्र नहीं, क्या यही हमा…

राजनीति में भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार और राजनीति का एक गहरा संबंध है । जहां हम विकास की एक नई गाथा को रचने का सपना संजोए हुए हैं वहीं दुनिया के सामने हमारी गरीबी की सच्चाई को स्लमडॉग मिलेनियर जैसी फिल्मों के सहारे परोसा जा रहा है । आज हम भ्रष्टाचार के मामले में बंग्लादेश, श्रीलंका से भी आगे हैं ।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री सह सांसद मधुकोड़ा का मामला भ्रष्टाचार के मामले में सामने आया है । जिसमें ४ हजार करोड़ के घपले का पता चला है । कोड़ा का नाम भी उन राजनेताओं में जुड़ गया है जो भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाये गए हैं या घिरे हुए हैं । भ्रष्टाचार को फैलाने वाले राक्षस सत्ता में आसीन राजनीति के शीर्ष नेता हैं इसकी शुरूआत भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय से ही हो गई थी । १९५६ में खाद्यान्‍न मंत्रालय में करोड़ों रूपये की गड़बड़ी पकड़ी गई । जिसे सिराजुद्दीन काँड के नाम से जाना जाता है । उस समय केशवदेव मालवीय खाद्यान्‍न मंत्री थे उन्हें दोषी पाया गया । १९५८ में भारतीय जीवन बीमा में मुंधरा काँड हुआ जिसकी फिरोज गाँधी ने पोल खोली थी । १९६४ में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए “संथानम कमिटी” का गठन किया गया ।…

एक आरटीआई एक्टिविस्ट के संघर्ष की कहानी, उसी की जुबानी

पिताजी गुरु भी थे। गरीबी, प्राइवेट ट्यूशन वगैरह करके आजीविका चलाते; परिवार चलाने के साथ-साथ सारे समाज, देश की चिंता उनका प्रमुख स्वभाव रहा। हमेशा दूसरों से कुछ अलग करने की चाह; सीमित संसाधनों में भी देश, समाज और मित्रों के लिए समय निकालना; शायद उनका यही स्वभाव मेरे मस्तिष्क में रच-बस गया, कार्यशैली का हिस्सा बन गया। छात्र जीवन बहुत फाकाकशी, गरीबी का रहा, लेकिन मेरे पिताजी ने अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया। हमारे मकान का धरन (कड़ी) लकड़ी का था, जो टूट गया था। उसी पर पूरे छत का लोड था। मकान कब गिर जाय, कुछ ठिकाना नहीं।प्लास्टिक के टेंट लगाकर रहते थे। कभी घर में चूल्हा भी नहीं जलता था। ऐसी ही परिस्थितियों में एक बार गुल्लक तोड़ा, तो पाँच रुपए निकले। उन्हीं से दो किलो चूड़ा लाया था। उसी को भिंगोकर, नमक-मिर्च लगाकर सपरिवार ग्रहण किया। अपनी शादी बिना तिलक-दहेज के की। दो बहनों की शादी आज से बीस साल पहले दिल्ली में मात्र सत्रह हजार की मामूली रकम में ही की। दोनों बहनों की शादी एक ही तिथि में किया। हमारे समाज (अखिल भारतीय खटिक समाज) के जो राष्ट्रीय पदाधिकारी थे, उन्होंने अपना मकान पंद्…