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बाल अधिकार एवं बाल साहित्य

अगर राष्ट्र को सशक्‍त बनाना चाहते हैं तो बच्चों को शिक्षित एवं चरित्रवान्‌ बनायें । शिक्षा एवं स्वास्थ्य बच्चों का मौलिक अधिकार एवं राष्ट्रीय दायित्व हो । शिक्षा एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में शिथिलता एवं भ्रष्टाचार राष्ट्रीय अपराध घोषित हों । बच्चे राष्ट्र निर्माण में नींव का पत्थर तथा माँ व शिक्षक दोनों शिल्पकार होते हैं जो बच्चों को शिक्षित एवं उनके चरित्र निर्माण में सहायक होते हैं । भारतीय संस्कृति में सदैव ही इस तथ्य के महत्व को स्वीकारा गया । हमारे पौराणिक ग्रन्थ इस बात के साक्षी हैं कि सदैव ही बाल शिक्षा एवं स्वास्थ्य पर राज कृपा रही और ऋषि, मुनियों, व गुरूजनों ने सबको शिक्षा देने का कार्य किया । कालान्तर में, समय विशेष के दौरान भारतीय संस्कृति के संरक्षण एवं विकास में न केवल रूकावटें आयीं अपितु उसका क्षरण भी हुआ । परिणामतः हमारी सोच गुलामी की ओर अग्रसर हुई और शिक्षा एक गौण विषय बन गयी । यद्यपि समय-समय पर बाल शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने पर आवाजें उठती रहीं, तथापि आजादी के ५० वर्ष बाद तक भी इसमें पूर्ण सफलता नहीं मिल सकी थी । सन्‌ १९९० में थाईलैन्ड के नगर जोमेनियन में विश्‍व शिक्षा सम्मेलन का आयोजन किया गया और ६ से १४ वर्ष तक थी आयु के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा पर जोर दिया गया । इसके दस वर्ष पश्‍चात सन २००० में सेनेगल के शहर डकार में पुनः विश्‍व शिक्षा सम्मेलन आयोजित हुआ और २०१५ तक सम्पूर्ण विश्‍व के बच्चों को शिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया । भारत के सन्दर्भ में इसका लक्ष्य सन २०१० निर्धारित किया गया और लक्ष्य पूर्ति के लिये सम्पूर्ण देश में सर्वशिक्षा अभियान चलाया गया । इसके अन्तर्गत ६ से १४ वर्ष की आयु के बच्चों को बाधारहित (अर्थात फीस, किताबें, ड्रेस, खाना सब राज्य दायित्व) शिक्षा दिलाना राज्य का कर्तव्य तथा बच्चों का मौलिक अधिकार घोषित किया गया । इस सम्मेलन में बच्चों के स्वतंत्र व्यक्‍तित्व को स्वीकारते हुये २१ वीं सदी को बच्चों की सदी घोषित किया गया ।
बच्चों के समग्र विकास में बाल साहित्य की सदैव प्रमुख भूमिका रही है । बाल साहित्य बच्चों से सीधे संवाद करने की प्रक्रिया है चाहे वह वाचक शैली में हो, लिखित हो, चित्रों द्वारा व्यक्‍त हो अथवा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से हो । इसकी विषय वस्तु स्वयं बालक भी हो सकता है, उसका परिवेश हो सकता है जिसमें बाल जीवन विकसित होता है अथवा काल्पनिक हो सकता है । बाल साहित्य में मनोरंजन, बाल मनोविज्ञान, सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराओं, संस्कारों, जीवन-मूल्यों, आचार-विचार और व्यवहार का समायोजन होना आवश्यक है । बाल साहित्य की भाषा सरल, रोचक, मनोरंजक, एवं उत्सुकता पूर्ण होनी चाहिये । और यह तभी संभव है जब बाल साहित्यकार स्वयं को बालमन के अनुसार ढालने में सक्षम हो । यह सत्य है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के आगमन से बच्चों की सोच में व्यापक परिवर्तन हुये हैं परन्तु वाचक और लिखित परम्परा के प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता । हेरी पॉटर पात्र को केन्द्र में रख लिखी गई पुस्तक ने रिकार्ड बिक्री की, जो बच्चों में पुस्तकों की वर्तमान लोकप्रियता का सूचक है । आज आवश्यकता यह जानने और समझने की है बच्चों को कल साहित्य से कैसे जोड़ा जाये? इस विषय की गहराई तक जाने के लिये हमारे नीति-निर्धारकों एवं शिक्षा शास्त्रियों को पश्‍चिम जगत की शिक्षा-नीति का अन्धानुकरण बन्द करना होगा । अपने कार्यालयों के वातानुकुलित कमरों से बाहर आकर भारतीय परिवेश में आधुनिकता का समायोजन कर नीति बनानी होगी । पश्‍चिम जगत की खोखली, दूषित शिक्षा प्रणाली के कारण असमय ही बच्चे तनाव ग्रस्त एवं प्रौढ़ लगने लगते हैं । कुंठा, हिंसा एवं उन्मुक्‍त यौन जीवन पश्‍चिम की दूषित तथा बच्चों पर मात्र बोझ बनने वाली शिक्षा प्रणाली से बचाना होगा । बाल साहित्य में पारम्पारिक गीत, कहानी, हितोपदेश, जातक कथायें, रामायण, महाभारत जैसे ग्रन्थों के बालोपयोगी प्रसंग, देशभक्‍ति, विज्ञान, हास्य, चुटकले, पहेली, बच्चों की स्वयं की कवितायें, पशु, पक्षी, जानवर, पेड़-पौधे, धरती, आसमान आदि सभी विषयों को शामिल करना होगा ।
दादा-दादी, नाना-नानी, माँ-बुआ द्वारा जारी वाचक परम्परा को पुनः जीवित करना होगा । यात्रा के रोचक प्रसंगों द्वारा बच्चों को शब्दों में विश्‍व भ्रमण पर ध्यान देना होगा । यदि हम ऐसा कर पाये तो निश्‍चित रूप से आने वाली सदी भारतीय बच्चों की होगी और सम्पूर्ण विश्‍व पर भारतीय संस्कृति का विजय ध्वज फहरायेगा ।
- डॉ ए. कीर्तिवर्द्धन

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