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हिन्दुस्तान में मानव का अधिकार

सृष्टि का सबसे उन्‍नत जीव मानव है, जिसने प्राकृतिक संसाधनों को अपने श्रम, से नये रूप में ढालकर नई दुनिया की रचना कर डाली । आज उसी मानव के अधिकार की बात हो रही है । विकास के साधन के साथ-साथ मानव ने प्राकृतिक संसाधनों का दुरूपयोग किया, प्रकृति की सीमा रेखा का उल्लंघन भी किया । पृथ्वी की हरियाली का विनाश किया जो सभ्यता को स्थायित्व प्रदान करती है । पशुओं से उनका घर, आश्रम पर मानव कब्जा जमाते जा रहा है । यहां तक कि मानव अपने स्वार्थ में अनेकों पशुओं, जलचरों का शिकार कर रहा है, जिससे अनेक प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर हैं । यहाँ तक कि मानव ने ही मानव पर अपने स्वार्थ के लिए उनका दमन शुरू कर दिया है ।
मानवाधिकार की परिभाषा क्या है? प्रकृति ने हर मानव को उसके परिवेश, स्थान के अनुसार इस पृथ्वी के नैसर्गिक अधिकार प्रदान किये हैं । किसी भी सामाजिक या राजनीतिक कारण से उनका ये अधिकार कोई मानव संगठन या सरकार हनन नहीं कर सकती । मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और स्वस्थ समाज अपने बनाये हुए आदर्श आचारसंहिता के आधार पर ही चलता है, चूंकि हम मानव हैं । पशुओं के साथ में प्रकृति प्रदत्त आचारसंहिता है जिसका उल्लंघन पशु समाज भी नहीं कर सकता है ।
ईश्‍वर की सबसे उत्तम रचना मानव है, परन्तु इस कलयुग में किसी तरह दूसरे के अधिकार कर्म के प्रतिफल पर अपना कब्जा जमाना ही सामाजिक असमानता पैदा कर रहा है, जिसमें पूरा विश्‍व त्रस्त है । यहाँ तक कि मानव के कुकर्म से पूरा विश्‍व खतरे के ढर्रे पर खड़ा है । मानवजाति में दो प्रवृत्ति के लोग होते हैं । जैसे सदाचारी, दुराचारी, देवता-राक्षस । प्रकृति के नियम अनुसार किसी एक में मानवजाति की राक्षसी वृत्ति का उत्थान का है । उत्थान है तो पतन भी निश्‍चित है । आज हम मानवाधिकार की बातें उठाते हैं । वह सामाजिक विकास, समानता, प्रेम के लिए जरूरी है ।
अब सभ्यता की पुकार है कि मानव मानव पर अत्याचार बन्द करो । हमारे देश में आम आदमी के मानवाधिकार की रक्षा के लिए पुलिस है, परन्तु पुलिस तो स्वयं ही मानवभक्षी जीव के रूप में बैठी है । भारत के हर हफ्ते थाने में दिन रात नागरिक अधिकार और नागरिक सम्मान के अधिकार का बलात्कार होता है । इस विभाग में सामाजिक प्राणी, सामाजिक आचार भी सिखाया जाना चाहिए । आज हमारे देश में मानवाधिकार की बात होती है, परन्तु हमारे कानून आज भी वही हैं जो अंग्रेजों ने गुलाम भारत की जनता के लिए बनाये थे । मानवाधिकार की दुहाई देने वालों पहले मानवाधिकार के शत्रु पुलिस तंत्र को, कानून को ठीक करो । आजादी के ६२ साल बाद भी वही स्थिति है । हमारे देश के सत्ताधारियों, आलसियों, निकम्मों देश के नागरिकों को उनका अधिकार देने में इतने साल क्यों लग रहे हैं? शायद हमारी सरकार, ईश्‍वर अवतरण का इंतजार कर रही है । कपटी लोगों, नाटक बन्द करो । सत्ताधारियों देश के नागरिक के अधिकार की रक्षा करो मानवाधिकार स्वयं प्राप्त हो जायेगा । मानवाधिकार के लुटेरों पर अंकुश लगाओ । अंग्रेजों के काले कानून को बन्द करो । मानव रूप पुलिसवालों के दानवी मानवाधिकार हनन कानून ठीक करो । ९० दिनों के अन्दर नया कानून बनाओ । आजादी का कानून, स्वतन्त्रता का कानून, मानव के अधिकार का कानून ।
शिक्षा व्यवस्था आज भी हमारे देश में वही चल रही है जो अंग्रेजों ने बनाया यानि हम गुलामों वाली शिक्षा पद्धति पर चल रहे हैं । मानवाधिकार की बात और शिक्षानीति वही, जो मैकाले ने गुलाम भारत के नागरिकों के लिए बनायी थी । अभी तक सत्ताधारियों ने स्वतन्त्र भारत की शिक्षा नीति का निर्धारण करने की जहमत नहीं उठायी है । जब शिक्षा का आधार ही गुलाम भारत है तो मानवाधिकार का ज्ञान हमारे समाज में कहाँ से आयेगा?
- रवि के. पटवा (मुंबई)

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