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वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चों को एक परिपक्व इन्सान बनाना होता है, ताकि वो कल्पनाशील, वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और देश का भावी कर्णधार बन सकें, किन्तु भारतीय शिक्षा पद्धति अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त कर सकी है, कारण बहुत सारे हैं । सबसे पहला तो यही कि अंगूठाछाप लोग डिसा‌इड करते हैं कि बच्चों को क्या पढ़ना चाहिये, जो कुछ शिक्षाविद्‍ हैं वो अपने दायरे और विचारधारा‌ओं से बंधे हैं, और उनसे निकलने या कुछ नया सोचने से डरते हैं, ऊपर से राजनीतिज्ञों का अपना एजेन्डा होता है, कुल मिलाकर शिक्षा पद्धति की ऐसी तैसी करने के लिये सभी लोग चारों तरफ से आक्रमण कर रहे हैं, और ऊपर से तुर्रा ये कि ये सभी लोग समझते हैं कि सिर्फ वे ही शिक्षा का सही मार्गदर्शन कर रहे हैं, जबकि दर‌असल ये ही लोग उसकी मां बहन कर रहे हैं । मैं किसी एक पर दोषारोपण नहीं करना चाहता, शिक्षा पद्धति की रूपरेखा बनाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिये और सोचना चाहिये, कि क्या उसमें मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है। आज हम रट्टामार छात्र को पैदा कर रहे हैं, लेकिन वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और परिपक्व छात्र नहीं, क्या यही हमारा एक मात्र उद्देश्य है? आज जब धीरे धीरे सत्ता अपराधियों और भ्रष्टाचारियों के हाथों में से फिसलती जा रही है, तो हम उनसे क्या क्या आशा रखें । सारी राजनैतिक पार्टियां अपने अपने तरीके से इतिहास को बदलने की कोशिश कर रही हैं, ये सभी कुछ इतना घटिया लग रहा है कि मेरे पास इनकी भर्त्सना करने के लिये शब्द नहीं हैं ।

पहले किसी बच्चे से पूछा जाता था कि बड़े होकर तुम क्या बनोगे तो उसका जवाब डाक्टर,इन्जीनियर,पायलट या कुछ और होता था, इसके पीछे पैसा नही होता था, बल्कि देशसेवा और समाज को आगे बढ़ाने का जज्बा होता था, आजकल बच्चा बोलता है कि मैं बड़ा होकर नेता बनना चाहता हूँ, क्योंकि इस पेशे में ज्यादा पैसा है, क्या शिक्षा सिर्फ जीवन में पैसे कमाने के लिये की जाती है? क्या हम बच्चों का मार्गदर्शन सही दिशा में कर रहे हैं । आजकल शिक्षा के मायने ही बदल गये हैं, क्योंकि हम लोगों के सोचने का तरीका ही बदल गया है, या बकौल कुछ लोगों के “हम लोग कुछ ज्यादा ही व्यावहारिक और स्वार्थी हो गये हैं”, हर बच्चा चाहता है कि जल्द से जल्द अपनी पढ़ा‌ई पूरी करे और किसी जगह पर फिट हो जाये, उसने क्या पढ़ा और कितना पढ़ा, उससे इसको मतलब नहीं है, या जो पढ़ा उसका जीवन मे कितना प्रयोग होगा, उससे भी इसको सारोकार नही है, उसको तो बस अपने शिक्षा के इन्वेस्टमेन्ट के रिटर्न से मतलब है, यानि कि शिक्षा और रोजगार, एक व्यापार हो गया है, पैसा लगा‌ओ और और पैसा पा‌ओ । अब बच्चों को ही क्यों दोष दें, उनके माता पिता भी तो इसी ला‌इन पर ही सोचते हैं, कि जल्दी से बच्चा पढ़-लिख ले तो पैसा कमाने की मशीन की तरह काम करे । क्या यही है शिक्षा का उद्देश्य? यदि यही है तो लानत है ऐसे उद्देश्यों पर ।

शिक्षा एक ऐसा माध्यम है जो हमारे जीवन को एक नयी विचारधारा,नया सवेरा देता है, ये हमे एक परिपक्व समाज बनाने में मदद करता है । यदि शिक्षा के उद्देश्य सही दिशा मे हों तो ये इन्सान को नये नये प्रयोग करने के लिये उत्साहित करते हैं । शिक्षा और संस्कार साथ साथ चलते हैं, या कहा जाये तो एक दूसरे के पूरक हैं । शिक्षा हमें संस्कारों को समझने और बदलती सामाजिक परिस्थियों के अनुरूप उनका अनुसरण करने की समझ देता है । आज शिक्षा जिस मुकाम पर पहुँच चुकी है वहाँ उसमें आमूल परिवर्तन की गुंन्जा‌इश है, आज हमें मिल बैठकर सोचना चाहिये, कि यदि शिक्षा हमारे उद्देश्यों को पूरा नही करती तो ऐसी शिक्षा का को‌ई मतलब नहीं है । आज जब भगुवाधारी अपना ऐजेन्डा चला रहे हैं, दूसरी तरफ सो काल्ड धर्मनिरपेक्ष वाले अपना कांग्रेसी एजेन्डा और तीसरी तरफ मदरसों द्वारा शिक्षा का इस्लामीकरण किया जा रहा है तो किसी से क्या उम्मीद रखें । आप खुद ही बता‌इये कि भगुवाकरण,कांग्रेसीकरण और इस्लामीकरण से हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे हैं, हम लोगों को लोगों से दूर कर रहे हैं । हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जो अपने धर्म को श्रेष्ठ और दूसरे धर्मों को गिरा हु‌आ मानेगा और कभी दूसरे धर्म की बे‌इज्जती करने से नहीं चूकेगा । या फिर इस्लामी कट्टरता से बच्चा अपनी जिन्दगी को ही इस्लाम की अमानत समझने मे बिता देगा । क्या यही उद्देश्य हैं शिक्षा के?

अभी भी समय है, जागो, चेतो और इस बिगड़ते हु‌ए शिक्षा के सिस्टम को बचा लो, वरना कल बहुत देर हो जायेगी । मेरे कुछ सुझाव हैं, जिन्हें शिक्षाविद चाहें तो अमल में ला सकते हैं -:

१. शिक्षा को ना केवल किताबी ज्ञान बल्कि व्यवहारिक शास्त्र के रूप मे प्रदान करना चाहिये ।
२. परीक्षा के प्रारूप और शिक्षा के स्वरूप में आमूल परिवर्तन की गुन्जा‌इश है ।
३. कम्प्यूटर शिक्षा अनिवार्य कर देनी चाहिये ।
४. बच्चों से शिक्षा के एक्स्ट्ररा लोड को कम कर देना चाहिये और उनके मानसिक,तार्किक विकास और पर्सनाल्टी डेवलपमेन्ट पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिये ।
५. शिक्षा के भगुवाकरण,इस्लामीकरण और कांग्रेसीकरण से बचना चाहिये । इतिहास को इतिहास ही रहने दो, पार्टी का लेबल मत लगा‌ओ ।
६. शिक्षा के साथ-साथ व्यावसायिक ज्ञान भी दिया जाना चाहिये, एडवान्स क्लासेस में तो यह अनिवार्य होना चाहिये ।
७. छात्रों को नयी खोजें करने और नये प्रयोग करने के लिए उत्साहित करना चाहिये ।
८. अंगूठाछाप लोगो को सिर्फ राजनीति तक ही सीमित रखना चाहिये । शिक्षा की सलाहकार समितियों से इन लोगों का पत्ता साफ कर देना चाहिये ।
९. भारतीय संस्कृति और संस्कार की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिये ।
१०. स्टूडेन्ट एक्सचेन्ज प्रोग्राम को ज्यादा बढ़ावा दिया जाना चाहिये, ताकि छात्र दूसरे देशों के छात्रों से ज्यादा कुछ सीख सकें ।
११. ग्रामीण शिक्षा के स्तर को सुधारा जाना आवश्यक है । इसपर अभी बहुत ज्यादा काम किया जाना बाकी है ।
१२. सेक्स एजुकेशन अनिवार्य कर दी जानी चहिये ।
१३. प्रौढ़ शिक्षा के लिये स्वयं सेवी संगठनों को ज्यादा से ज्यादा प्रोत्साहन एवं सहायता दी जानी चाहिये ।

सचिन कुमार

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