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देश का दुर्भाग्य (26/11)

शायद किसी ने यह उम्मीद न किया हो कि एक तरफ हमारा देश प्रगति कर रहा है, नई ऊँचाईयों को छू रहा हैं । वही दूसरी तरफ एक निहायत ही कमजोर एवं लाचार होता जा रहा है, और हम इसके रखवाले, दिन व दिन अपंग होते जा रहे है । अगर ऐसा नही होता तो हर साल, हर महीने हम ऐसी घटनाओं के शिकार नहीं होते आज २६/११ के वर्षगांठ पर पूरा देश भावमीनी श्रद्धांजली दे रहा है । तो कोई उन शहीदों को पुष्पमाल्यार्पण कर रहा है । मैं पूछता हूँ कि क्या यह भावभीनी श्रद्धांजली, और उनकी याद में २ मिनट का मौन काफी है । उनके लिये या इस देश के लिए जिसका हदय बार-बार विद्रोहियों के द्वारा ब्यथित हो रहा हो । यह देश का दुर्भाग्य नही तो क्या है, यहाँ के रहने वालों के लिए शर्म की बात नहीं तो क्या है? यह एक ऐसा कलंक है जो मिटाये नही मिटने वाला है ।
कुछ लोगों को श्रद्धांजली फिल्म बनाने से है, वो सोचते हैं कि हम फिल्मों के माध्यम से, रेडियों के माध्यम से यहाँ के लोगों को बदलेंगे, उनके सोच को बदलेंगे, लेकिन ऐसा होना, एक ऐसे स्वप्न की तरह है, जो शायद ही पूरा हो सके । क्योंकि बदलती तो वो चीजे हैं, जिसमें चेतना हो परन्तु दुर्भाग्यवश सारे चेत होते भी अचेत है । हम इसे ऐसे याद कर रहे, ऐसे प्रस्तुत कर रहे हैं, जैसे बहुत ही गर्व की बात हो । वो हमें बार-बार कभी २६/११ का तो कभी १९९३ बम-ब्लास्ट, तो कभी काशी संकटमोचन के रूप में चुनौती दे जाते है, और हम उसे राजनीतिक फायदे मे तब्दील करते जा रहे है । इसे हम क्या कहेंगे । कहावत है, कि अपने घर में कुत्ता भी शेर होता है, लेकिन हम अपने को कहते शेर है, और हालत कुत्ते से बदत्तर है । कोई भी घटना होती है, चाहे वह रेल दुघर्टना हो, बस दुर्घटना हो, या बहुत बड़ी शाजिश के तहत देश पर हमला ही क्यों न हो, हम उसे दूसरे देश के द्वारा साजिश का नाम दे, अपना पिछा छुड़ा लेते है । हम किसी व्यक्‍ति या देश के खिलाफ पुख्ता सबूत होने के बावजूद कार्यवाही क्यों नहीं करते । क्यों दूसरे देशों के भरोसे रह जाते हैं । शायद इसलिये की हमारे पास धन नहीं है, शायद इसलिए की हमारे पास सैन्य बल का अभाव, और शायद इसलिए कि हमारे पास तकनीकी की कमी है । .... नहीं है, तो है, सिर्फ और सिर्फ सत्ता लौलुपता की और आत्मविश्‍वास की - अगर ऐसा नहीं होता तो, संसद भवन हमले के बाद यह २६/११ नहीं होता, और कदापि नही होता- इन सारी घटनाओ से हम सिर्फ अपने-आप को निकम्मे, कमजोर और लालची, बेईमान, मतलबी, साबित कर सकते है । हमारे लिए ऐसी घटनाये कोई माइने नहीं रखती इसे सिद्ध करने की किसी को जरूरत नही है, क्योंकि वे खुद ही गवाह है, अपने गुनाहों की-
मैं पूछना चाहता हूँ, हर उस आदमी से जो थोड़ा भी अपने आप को वफादार या देश और समाज के प्रति जिम्मेदार समझता हो । अगर कोई आपके परिवार या आप पर जानलेवा हमला करता है, तो..
क्या वह दूसरे से या पड़ोसी से सहायता लेने के बाद अपनी रक्षा करेगा ?
क्या वह पहले पंचायत बुलायेगा और फिर वह निर्णय लेगा कि उसे क्या करना चाहिये?-
मेरा मानना है, कि नही कोई भी कानून कोई भी धर्म उसे अपनी रक्षा एवं परिवार की रक्षा करने की स्वीकृति अवश्य देगा-

मेरे लिखने का मकसद किसी को श्रद्धांसुमन अर्पित करना नहीं है, किसी देशभक्‍त को जो हमारी रक्षा के लिए अपने आप को नष्ट कर दिया उसके लिये उसकी श्रद्धांजली में उसे याद करना और फिर उसको राजनीतिक हवा देना नही है ।
“हमारा मकसद है, कि आप, हम सभी दृढ़ प्रतिज्ञ हो उनके बलिदानों की कीमत की वापसी की - जिस दिन हम,आप दृढ़ प्रतिज्ञ हो जायेंगे, फिर न कोई २६/११ होगा ओर ना ही ऐसी वर्षगांठ आयेंगी - ”
किसी भी देश का भाग्य एवं दुर्भाग्य बनाते बिगाड़ते है, वहां के लोग । इतनी जनसंख्या के बावजूद हम इसे दुर्भाग्य के अलावा कुछ नहीं दे पा रहे है । क्योंकि हम अपना आकलन करने में असमर्थ है ! हमारे वर्त्तमान प्रधानमंत्री श्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अपने आप के बारे में बताया कि वह एक कमजोर प्रधानमंत्री नही है बल्कि वह एक शक्‍तिशाली और बहुत ही प्रभावशाली व्यक्‍तित्व वाले प्रधानमंत्री है । जिसका आकलन पूरे भारतवासी तो क्या वो हमलावरी भी कर चुके है । उन्होंने अपने आप को शक्‍तिशाली इसलिये बताया क्योंकि वे दोबारा सत्ता में वापस आये । उन्होंने यह नही कहा कि मैं एकमात्र ऐसा प्रधानमंत्री हूँ, जिसके समय में हजारों औरते विधवा हुई, जिनके कार्यकाल में हजारों बच्चे यतीम हुये, आखिरकार अफजल गुरू ने जिसे कमजोर और लाचार सरकार बताया ।

हमारे बीच ऐसे हजारों सवाल जेहन में समय-समय पर अवश्य कोसेंगे जिसका दर्द हम शायद सहन कर सके ।
मैं इतना अवश्य कहुंगा अपने नौजवान दोस्तों से कि हम बदलेंगे इसकी तख्दीर क्योंकि हर व्यक्‍ति बदलना चाहता है, और एक बार हम अपनी ताकत का आकलन कर ले तो हर चीज बदल सकती है, क्योंकि -
सारी शक्‍तियाँ हम मे ही समाहित है,
और हम कुछ भी कर सकते है, कुछ भी
अगर हम अपनी कमजोरियों को भूलाकर
एक नई चेतना के साथ एक नये जोश
के साथ शुरूआत करे तो-
अगर वास्तव में हम इसे रोकना चाहते है, तो हमें अपनी सोच को बदलना होगा। हमें खुद को बदलना होगा, और सच्चे मन से अपने-आप के प्रति वफादार होना पड़ेगा ।

लगे इस देश की ही अर्थ मेरे धर्म विधा धन,
करू मैं प्राण तक अर्पण यही प्रण सत्य है, ठाना ।
नहीं कुछ गैर मुमकिन है, जो चाहो दिल से तुम,
उठा लो देश हाथों पर न समझो अपना बेगाना ॥
-मुकेश कुमार पाण्डेय

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