Skip to main content

आप भी जानिए राजनैतिक सच को

कभी-कभी राजनैतिक नेता अन्य दलों के बारे में जो वक्‍तव्य देते हैं उससे जनता को सच्चाई जानने का मौका हाथ लग जाता है । प्रथम वक्‍तव्य भारत के विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर का है । भारतीय राजनीति की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि एक तरफ संकीर्ण राजनीति करनेवाली भाजपा है । दूसरी ओर वामदल हैं जिन्होंने विदेशी विचारधारा को गले लगा रखा है । वामदल किसी भी बदलाव और विकास का विरोध करते हैं । वह गरीबों को गरीब रख राजनीति करना चाहते हैं । उन्होंने कहा कि बंगाल में न्यूनतम मजदूरी दर सबसे कम है । थरूर ने कहा कि आज देश की ७०% आबादी गरीबी का सामना कर रही है । यदि अंतर्राष्ट्रीय मानकों की कसौटी पर देखें तो भारत में गरीबों का आँकड़ा और बढ़ जाएगा । उन्होंने कहा कि भाजपा का एक खास एजेंडा है जो पूरे देश पर लागू नहीं हो सकता । भारत एक थाली के समान है जिसमें विभिन्‍न व्यंजन हैं और सबका अपना स्वाद है और किसी को यह जायका खराब करने का हक नहीं । समय दर्पण को दिए गए साक्षात्कार में बहुजन शक्‍ति पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री शरफुद्‌दीन अहमद का है जिन्होंने देश की चर्चित महिला दलित मुख्यमंत्री मायावती पर प्रश्नों के माध्यम से बसपा की पोल खोलकर रख दी है । उन्होंने प्रश्न उठाया है कि मायावती मनुवादी या अंबेडकरवादी ? उनके अनुसार बाबा साहब के हाथी को पौराणिक गणेश में परिवर्तित कर ब्राह्मणवादी व्यवस्था के समर्थन में लखनऊ में हुई एक रैली में मायावती ने खुद नारा लगाया- “ब्रह्मा, विष्णु, महेश है, ये हाथी नहीं गणेश है । ” एक ईमानदार तथा योग्य व्यक्‍ति श्री के. आर. नारायणन को दोबारा राष्ट्रपति न बनाए जाने की साजिश में भाजपा का साथ देकर मायावती एक दलित के विरूद्ध ब्राह्मणवादी साजिश में शामिल हुईं । भारतीय समाज में जातिद्वेष के जनक मनु की मूर्ति को राजस्थान हाईकोर्ट में लगवानेवाले भैरो सिंह शेखावत को उपराष्ट्रपति बनवाकर मनुवाद को भारत पर दोबारा प्रतिष्ठित करने के प्रयास में सहायता करना । बाबा साहब के संविधान को समाप्त करने की नीयत से संविधान की समीक्षा करनेवाली भाजपा नेतृत्व वाली सरकार को समर्थन देना । साम्प्रदायिक घृणा फैलानेवाली संस्था आरएसएस के लोगों भाऊ साहब देवरस तथा पं० दीनदयाल उपाध्याय के नामों पर अपने शासनकाल में सरकारी महाविद्यालय एवं विश्‍वविद्यालय का नामकरण किया है । अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (उत्पीड़न निवारक) अधिनियम १९८९ के प्रावधानों को शिथिल बनाने के लिए शासनादेश जारी करके दलितों पर अत्याचार को बढ़ावा दिया गया । मनुवादियों को खुश करने के लिए पेरियार की मूर्ति को लखनऊ में लगवाने की घोषणा को निरस्त कर दिया गया । बाबा साहब की शिक्षा को दरकिनार करके उ० प्र० में ब्राह्मणवाद को मजबूत करते हुए बसपा के बैनर पर सौ से अधिक ब्राह्मण सम्मेलन करवाए गए । उ०प्र० के विधासभा के लिए संभावित उम्मीदवारों की सूची में दो सौ लोगों में से लगभग सौ ब्राह्मणों को बसपा टिकट के लिए नामित किया गया । बसपा के मूल सिद्धांत “जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी भागीदारी” को समाप्त कर “जिसकी जितनी तैयारी (थैली भारी) उतनी उसकी भागीदारी का नया सिद्धांत प्रतिपादित करके बसपा के अस्तित्व की आवश्यकता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देना तथा दलितों व कमजोरों के लिए नेतृत्व के अवसर समाप्त कर देना । खुद कुर्सी पर बैठना तथा अन्य को नीचे बिठाना, जन-प्रतिनिधियों को बेइज्जत करना, कार्यकर्ताओं का जजबाती व आर्थिक शोषण करना तथा बिना किसी ठोस सूबूत तथा जवाब का मौका दिए बगैर ही तानाशाही पूर्ण रवैये से कार्यकर्ताओं को पार्टी से निकाल देना तथा असम्मानित करना । बहुजन समाज विरोधी कार्य करनेवाले दूसरे दलों के मनुवादी नेताओं को ससम्मान बसपा में शामिल करना तथा असदस्यों को टिकट देकर उनका नेतृत्व बहुजन समाज पर थोपकर बार-बार समाज को धोखा देना व दिलवाना । घोर मनुवादी दल भाजपा के साथ मिलकर बार-बार सरकार बनाकर धर्मनिरपेक्षता को नुकसान पहुँचाना तथा भविष्य में भी इन्हीं संभावनाओं के तहत राजनीति करना । ब्राह्मणवादी व्यवस्था का भाग बनते हुए घोर साम्प्रदायिकतावादी लालजी टंडन, कलराज मिश्र, डॉ. मुरलीमनोहर जोशी आदि के हाथों में राखी बाँधकर मनुवादी व्यवस्था में शामिल हो जाना जबकि कभी किसी दलित को राखी नहीं बाँधी और न ही अपनत्व का प्रदर्शन किया । बाबा साहब के नाम पर जीवन की हर सुख सुविधा तथा अकूत धन दौलत पा जाने के बाद भी बाबा साहब की छवि खराब करने वाले तथा उनके विरूद्ध किताब लिखनेवाले अरूण शौरी को राज्यसभा के लिए चुनवाना तथा केंद्रीय सरकार में उनके मंत्री बनाए जाने तथा कमजोर वर्गों के विरूद्ध सजिश करके औद्योगिक नीति के द्वारा कमजोर लोगों को बेपनाह हानि पहुँचाने की साजिश के विरोध में कभी कोई आवाज न उठाना । बहुजन शक्‍ति पार्टी ने खासकर दलित समाज से प्रश्न किया है कि “क्या आप मायावती के इन फैसलों का समर्थन कर सकेंगे ।" अगर नहीं तो आपको प्रजातांत्रिक विकल्प को पूर्ण समर्थन देना चाहिए ।

Comments

Popular posts from this blog

वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चों को एक परिपक्व इन्सान बनाना होता है, ताकि वो कल्पनाशील, वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और देश का भावी कर्णधार बन सकें, किन्तु भारतीय शिक्षा पद्धति अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त कर सकी है, कारण बहुत सारे हैं । सबसे पहला तो यही कि अंगूठाछाप लोग डिसा‌इड करते हैं कि बच्चों को क्या पढ़ना चाहिये, जो कुछ शिक्षाविद्‍ हैं वो अपने दायरे और विचारधारा‌ओं से बंधे हैं, और उनसे निकलने या कुछ नया सोचने से डरते हैं, ऊपर से राजनीतिज्ञों का अपना एजेन्डा होता है, कुल मिलाकर शिक्षा पद्धति की ऐसी तैसी करने के लिये सभी लोग चारों तरफ से आक्रमण कर रहे हैं, और ऊपर से तुर्रा ये कि ये सभी लोग समझते हैं कि सिर्फ वे ही शिक्षा का सही मार्गदर्शन कर रहे हैं, जबकि दर‌असल ये ही लोग उसकी मां बहन कर रहे हैं । मैं किसी एक पर दोषारोपण नहीं करना चाहता, शिक्षा पद्धति की रूपरेखा बनाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिये और सोचना चाहिये, कि क्या उसमें मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है। आज हम रट्टामार छात्र को पैदा कर रहे हैं, लेकिन वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और परिपक्व छात्र नहीं, क्या यही हमा…

राजनीति में भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार और राजनीति का एक गहरा संबंध है । जहां हम विकास की एक नई गाथा को रचने का सपना संजोए हुए हैं वहीं दुनिया के सामने हमारी गरीबी की सच्चाई को स्लमडॉग मिलेनियर जैसी फिल्मों के सहारे परोसा जा रहा है । आज हम भ्रष्टाचार के मामले में बंग्लादेश, श्रीलंका से भी आगे हैं ।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री सह सांसद मधुकोड़ा का मामला भ्रष्टाचार के मामले में सामने आया है । जिसमें ४ हजार करोड़ के घपले का पता चला है । कोड़ा का नाम भी उन राजनेताओं में जुड़ गया है जो भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाये गए हैं या घिरे हुए हैं । भ्रष्टाचार को फैलाने वाले राक्षस सत्ता में आसीन राजनीति के शीर्ष नेता हैं इसकी शुरूआत भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय से ही हो गई थी । १९५६ में खाद्यान्‍न मंत्रालय में करोड़ों रूपये की गड़बड़ी पकड़ी गई । जिसे सिराजुद्दीन काँड के नाम से जाना जाता है । उस समय केशवदेव मालवीय खाद्यान्‍न मंत्री थे उन्हें दोषी पाया गया । १९५८ में भारतीय जीवन बीमा में मुंधरा काँड हुआ जिसकी फिरोज गाँधी ने पोल खोली थी । १९६४ में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए “संथानम कमिटी” का गठन किया गया ।…

काले धन एवं नकली नोटों से छुटकारा - भ्रष्टाचार पूर्णत: खत्म

प्राय: सभी देशों की सरकारों का एक रोना साझा है और वो भी अति भयंकर रोना! देश की अर्थ व्यवस्था में काला धन । यह काला धन बहुत से देशों को, बहुत सी सरकारों को बहुत रुलाता है और बुद्धिजीवी वर्ग को अत्यंत चिंतित करता है । अर्थशास्त्रियों की नाक में दम करके रखता है । रोज न‌ए-न‌ए सुझाव दि‌ए जाते हैं, विचार कि‌ए जाते हैं कि किस तरह इस काले धन पर रोक लगा‌ई जा‌ए. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट तो छापों में विश्वास रखता है, जहाँ कहीं सुंघनी मिली नहीं कि पहुँच ग‌ए दस्ता लेकर । अजी! काले धन की बात तो छोड़ि‌ए! नोटों को लेकर इससे भी बड़ी समस्या का सामना क‌ई देशों को करना पड़ता है, और वो है नकली नोटों की समस्या । दूसरे देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करना हो या बेहाल करना हो, प्रिंटिंग प्रेस में दूसरे देश के नोट हूबहू छापि‌ए और पार्सल कर दीजि‌ए उस देश में, बस फ़िर क्या है - बिना पैसों के तमाशा देखि‌ए उस देश का । अब तो उस देश की पुलिस भी परेशान, गुप्तचर संस्था‌एं भी परेशान और सरकार भी परेशान! नकली नोट कहां-कहाँ से ढ़ूंढ़े और किस जतन से? बड़ी मुश्किल में सरकार ।
बचपन से छलाँग लगाकर जब हमने भी होश सँभाला तो आ‌ए दिन काले धन …