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भारतीय संस्कृति में अध्यात्म

अध्यात्म भारतीय संस्कृति का प्राण तत्व है । यह एक ऐसा तत्व है जो भारतीय ऋषियों एवं मनीषियों को साधना के क्षणों में उपलब्ध हुआ और जिसे उन्होंने जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता बतायी । अध्यात्म पर ही इस राष्ट्र ने अपना समस्त जीवन-दर्शन स्थापित किया । भारतीय जीवन के प्रायः प्रत्येक क्षेत्र में इस भावना के दर्शन होते हैं। इस भौतिक शरीर और संसार से परे क्या है? इस संसार की रचना किस प्रकार हुई ? मुत्यु क्या है? मुत्यु के पश्‍चात्‌ क्या होता है? उपनिषदों और भारतीय दर्शन के ग्रंथों में इन विषयों पर विस्तृत एवं गंभीर विचार मिलते हैं । आध्यात्मिक दृष्टि से इस देश में अनेक वाद प्रचलित हुए । इनमें अद्वैतवाद, द्वैतवाद और त्रैतवाद प्रमुख है । अद्वैतवाद ने एक मार ब्रह्य की सत्ता प्रतिपादित के है । द्वैतवाद के अनुसार प्रकृति और पुरूष इन दो तत्वों से संसार का चक्र प्रवर्तित होता है । त्रैयवाद तीन तत्वों-ईश्‍वर, जीव और प्रकृति की सत्ता का प्रतिपादन करता है । इस वाद के अनुसार, जीव और प्रकृति का संयोग संसार-चक्र का प्रवर्तक है और ईश्‍वर इस चक्र का नियामक है । भारतीय दार्शनिक चिन्तन में इन तीनों ही वादों का समावेश है । सभी भारतीय दर्शन वेदों को प्रमाण मानते हैं । भारतीय संस्कृति के अनुसार भौतिक सुखों का अंतहीन भोग एवं सुख ही मानव जीवन का लक्ष्य नहीं है । मानव अपनी बौद्धिक और आध्यात्मिक श्रेष्ठता के कारण ही प्रकृति के अन्य प्राणियों से अलग और श्रेष्ठ समझा जाता है । मनुष्य इंद्रिय सुख में जितनी संतुष्टि का अनुभव करता है उससे कहीं अधिक सुख की अनुभूति वह अपनी बौद्धिक और आध्यात्मिक शक्‍ति के परिचालन में कर लेता है । इस प्रकार भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक पक्ष की श्रेष्ठता स्थापित करती है । भारतीय संतों और मनीषियों ने मानव जीवन में चार प्रकार की सम्पदाएँ विवेचित की हैं । पहली सम्पदा जन्म के समय कुल के माध्यम से और वयस्क जीवन में उद्यम के माध्यम से प्राप्त होती है, जिसे हम ‘भौतिक सम्पदा’ कह सकते हैं । दूसरी सम्पदा गुरू के चरणों में बैठकर अथवा अध्ययन और प्रयोग के द्वारा प्राप्त की जाती है जिसे ‘ज्ञान सम्पदा’ कहा जा सकता है । तीसरी सम्पदा देश या समाज के व्यवस्थित, सामूहिक और नीतिगत विकास के द्वारा उसके सदस्यों को प्राप्त होती है जिसे ‘राष्ट्रीय सम्पदा’ कहते हैं । इन सबके अतिरिक्‍त एक सम्पदा और है और वह है ‘आध्यात्मिक सम्पदा’ जो अन्दर के वैभव को पहचानने, ढूंढ़कर अपनाने की सम्पदा है । इसको पहचानने का मार्ग सरल भी है और कठिन भी । इसको पहचानने के लिए व्यक्‍ति में कुछ दर्शन कुछ ज्योति कुछ सुचेतना आनी चाहिए । यह ईश्‍वर ध्यान, पूरे मानव जगत के प्रति भक्‍ति-भय सेवाभाव, चिंतन-मनन, स्वाध्याय और अनुभव मंथन से ही संभव है । घर, विद्यालय, समाज और सत्संग में ही आध्यात्मिक सम्पदा का अर्जन किया जा सकता है । बालक और युवाओं की दृष्टि से जहाँ विद्यालय ज्ञान-सम्पदा के प्रमुख स्रोत हैं वहीं वे आध्यात्मिक सम्पदा के भी सर्वोच्च और महत्वपूर्ण केन्द्र हैं और होने भी चाहिए । बालक विद्यालय में जो कुछ भी सीखता या अर्जित करता है वह उसके जीवन में सर्वाधिक प्रभावी होता है । ज्ञान के साथ संस्कार और अनुभव के साथ आचरण की शिक्षा बालक परिवार के बाद विद्यालय से ही अर्जित करता है । अतः विद्यालय के पाठ्‌यक्रम और कार्यकलापों में बालक के आध्यात्मिक विकास के लिए पर्याप्त अवसर होने आवश्यक हैं । विद्यालय अपने अध्यापकों के अनुकरणीय आचरण और व्यवहार तथा विविध प्रकार की संस्कारोमुन्खी क्रियाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से छात्रों के आध्यात्मिक विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं । वस्तुतः अध्यात्म का तत्व भारतीय संस्कृति की अपनी विशिष्टता है जो इसे विश्‍व की अन्य संस्कृतियों से अलग कर श्रेष्ठता प्रदान करती है । आज यह बात सभी स्वीकार करने लगे हैं कि आज के तनावग्रस्त जीवन में भारतीय संस्कृति का आध्यात्मिक पक्ष उचित दिशा प्रदान कर सकता है । हम अपने जीवन में अध्यात्म का पालन कर जीवन को स्वस्थ, सुखी एवं तनावमुक्‍त बना सकते हैं ।
- डॉ. राजीव कुमार ,१३, श्री वार्ष्णेय महाविद्यालय क्वार्टर्स, जी. टी. रोड, अलीगढ़

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