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पुरूष भी कम पीड़ित नहीं

जहां कहीं पीड़ा की बात आती है, वहां एक महिला छवि सामने उभर आती है । मानो पीड़ा का पर्याय है महिला । यह भी अतिशयोक्‍ति ही है । जहां तक सुख-दुख का सवाल है, स्त्री-पुरूष दोनों में इनकी अनुभूति होती है । यह भी गलत धारणा है कि स्त्री की तुलना में पुरूष अधिक कठोर होता है । यह भी कि समान दुख से पीड़ित महिला और पुरूष महिला अधिक विचलित होती है । दर‍असल दुखी या सुखी होना मनुष्य की जातिगत (लिंग भेद) विशेषता नहीं है । यह तो व्यक्‍तिगत है । किसी में दुख सहने की शक्‍ति अधिक होती है । कोई अति सुख में भी संयमित रहता है, परंतु यह भी सही है कि महिलाएं अपनी समस्याओं को अधिक बांटती हैं । वे छोटी-छोटी बातों से भी पीड़ित होती हैं । जैसे पति या संतान द्वारा उपेक्षित होकर महिला रोती-चिल्लाती है । दूसरों को बताती है । दूसरों से सुझाव और सांत्वना पाती है, वहीं पुरूष चुप रहता है । वह अपना दुख बांटना भी अपनी मान-हानि मानता है । यह स्त्री-पुरूष का समाज अर्जित व्यवहार है । यह सत्य है कि भावनात्मक रूप से पुरूष स्त्री से अधिक कमजोर है । वह मां, बहन, पत्‍नी, या अपनी महिला मित्र पर अधिक निर्भर रहता है । दुखद और कठिन परिस्थिति आने पर महिला ही पुरूष को संभालती( भावनात्मक रूप से) है । ढांढस बंधाती है । वह अधिक व्यावहारिक होती है । जीवन में प्राकृतिक और सामाजिक कठिनाइयां झेलती हुई महिला पुरूष की तुलना में अधिक सख्त हो जाती है । ग्रामीण महिलाओं को मैंने कहते सुना है- ‘हम ही औरते हैं जो चार-पांच बच्चे पैदा कर लेती हैं । मर्द तो बच्चा पैदा कर ही नहीं सकता । पुरूषों के बारे में यह धारणा अनपढ़ महिलाओं की भी बनी है । उनके संग-साथ रहकर उन्होंने पुरूषों को ऐसा ही पाया है । उन्हें पक्‍काविश्‍वास है कि पुरूष प्रसव पीड़ा बर्दाश्त नहीं कर सकता । उनकी धारणा के पीछे यह तथ्य है कि भावनात्मक रूप से निर्भर उनका पिता, पति, पुत्र या भाई थोड़े से शारीरिक कष्ट में कराहने लगता है । महिलाएं तो उससे कहीं अधिक शारीरिक-मानसिक कष्ट सहती हुई घर के कठिन काम करती रहती है । कष्टपूर्ण जीवन की एक और स्थिति बनती है । घर में पति-पत्‍नी के बीच परस्पर एक-दूसरे के व्यवहार से दुखी होना । यह सत्य है कि महिलाएं अत्याचार, प्रताड़ना और अवहेलना की शिकार होती हैं, परन्तु यह भी सत्य है कई बार पुरूष भी पत्‍नी के अत्याचार और अवहेलना का शिकार होता है । घर उसके लिए भी अनिवार्य है । इसलिए प्रताड़ना सहकर भी घर में रहता है । पीड़ित रहता है, पर अपनी व्यथा किससे कहे । और पुरूषों की यह स्थिति कोई आधुनिक जीवन की देन नहीं है । हमारे यहां एक कहावत है- ‘अपन हारल, घरवाली के मारल, कोई कहता नहीं । ’ भावार्थ है कि रणभूमि या वाद-विवाद में अपनी हार होने पर और घर में अपनी पत्‍नी की प्रताड़ना और पिटाई मर्द दूसरों से नहीं कि वह पीड़ित नहीं हुआ । तात्पर्य यह नहीं कि वह पीड़ित नहीं हुआ । तात्पर्य यह कि दोनों स्थितियों में उसकी उसकी मान-हानि होती है । उसकी इज्जत जाती है, पर दुखी तो वह होता ही है । पीड़ित होकर अंदर ही अंदर घुटता है । इन दिनों हमारे समाज में विवाह-विच्छेद की संख्या बढ़ रही है । हमारी धारणा है कि विच्छेद की स्थिति पत्‍नी के लिए दुखदायी है । धारणा गलत है । जब दाम्पत्य दोनों के लिए आवश्यक है और इसमें दोनों की बराबर की भागीदारी है, तो विच्छेद दोनों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण ही होगा । विवाह दुखी होते हैं । इसलिए भी कि वे अपनी व्यक्‍तिगत जरूरतों के लिए भी पत्‍नी पर आश्रित रहते हैं । अकेला जीवन बिताना उनके वश की बात नहीं । पति की मुत्यु पर पत्‍नी रोती-चिल्लाती है । अकेली हो जाती है, परन्तु अपने बच्चों की जिम्मेदारी संभाल लेती है । विधुर अपनी जिम्मेदारी नहीं संभाल पाता । इसलिए पीड़ा मात्र महिलाओं के हिस्से का भाव नहीं । स्त्री-पुरूष बराबर मात्रा में पीड़ित होते हैं या पुरूष अधिक पीड़ा होता है । अपनी पीड़ा बांटता नही । इस ओर ध्यान खींचने का एक आशय यह भी है कि इन दोनों पति-पत्‍नी के विवाद को सुलझाने वाले लोगों और संस्थाओं को समस्याओं पर एकतरफा विचार नहीं करना चाहिए । दोनों की सुविधा-असुविधा पर तटस्थता से विचार हो ।
- मृदुला सिन्हा

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