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बौद्ध धर्म के १२४० वर्ष बाद वर्त्तमान हिन्दू धर्म की उत्पत्ति

तथागत बुद्ध ने अपनी वाणी से उसी सनातन श्रमण धर्म का परिमार्जन के बाद प्रचार किया जो वैदिक आर्यों के आने से पूर्व इस देश- “जम्बोद्वीप” और उसके आस-पास चारो तरफ प्रचलित था । महामना बुद्ध ने अतेको बार अपने प्रवचन के समाप्त होने पर कहा है, “एस घम्मो सनातन” अर्थात्‌ ये है सनातन (चिरकात्‍नों से) चला आमा “श्रमर्ण धर्म” । पुरातत्व विभाग की खोज में आजकल उस प्रचीन श्रमण धर्म के चिन्ह धरती के अन्दर निकल रहे हैं जिसके नाम “सिंघु घाटी की सभ्यता” आदि हैं । इसके अतिरिक्‍त देश के साथ-साथ आस-पास के देशों में जहाँ कही भी धरती की खुदाई हुयी, बुद्ध काल के अवशेष मिलते रहे हैं तथा आगे भी मिलेंगे जो ये दर्शाता है कि प्राचीन भारत में अगर कोई सभ्यता देखने सुनने लायक है तो वह श्रमण धर्म मानने वाले वाले शासकों की । यह जानना बहुत आवश्यक है कि मूल भारतीयों का धर्म त्याग एवं वैराग्यपूर्ण रहा है । जबकि आक्रमणकारी आर्यों का धर्म भोगेश्‍वरर्यपूर्ण । मूल निवासियों के धर्म का उद्‌देश्य दुःखमय संसार से निवेत होकर जीते जी निर्वाण प्राप्त करना है यानी राग मोह द्वेष से छुटकारा जीते जी पाना नकि मरने के बाद जबकि आर्यों के धर्म का ध्येय सांसरिक सुख में लिप्त रहना तथा मरने के बाद स्वर्ग का सुख की प्राप्ति है । बौद्ध धर्म एनं जैन धर्म दोनों ब्राह्यणोत्तर प्रधान धर्म हैं क्योंकि इनके प्रणेता ब्राह्यण नहीं थे । इन दोनों धर्मों का मुकाबला करने के लिये तथा जनता को आतंकित कर अपनी तरह खींचने के लिये इनके मुकाबले में ब्राह्यणों ने अपना भूलभुलैया ज्ञान यानी ‘ब्रह्या ज्ञान” रूपी दर्शन कुछ दूसरे ब्राह्योत्तर राजाओं के नाम से फैलाया तथा इन ब्राह्यणोत्तर राजाओं को ईश्‍वर अवता कहकर एक ओर उन राजाओं का मान सम्मान बढ़ाया दूसरी ओर उन्हीं से अपनी पूजा अर्चना करबायी तथा ब्राह्यण विरोधियों का उन अज्ञानी शराबी-कबाबी, मर्यादाहीन, लम्पट राजाओं द्वारा नाश भी करवाया । लेकिन ब्राह्यणों का यह ब्रह्यज्ञान वेदमंत्रों द्वारा सिद्ध नहीं हो पा रहा था यही कारण था कि उन्हें उपनिषदों की सहायता लेनी पड़ी । वेद किसी एक व्यक्‍ति ने नहीं लिखा जिसके मन में आया वहीं दो चार श्लोक । ऋचायें जड़ दी । इन्हें भी वेदों के अन्त में जोड़ दिया गया तथा इसका अलग से उपनिषद नाम दे दिया गया । इनको वेदान्त कहा गया क्योंकि वेदों के अन्त में जोड़े गए थे । ज्ञातव्य हो कि सभी उपनिषद महामना बुद्ध एवं महावीर के बाद लिखे गए । यही नही भगवतगीता, ब्राह्यण ग्रंथ आदि सभी ग्रन्थ भी बाद में लिखे गयें । जो ब्राह्यणेतर राजाओं के राजविद्या एवं राजगुह्य योग पर आधारित थे । इसमें प्रेक्षपण व मिश्रण करके इसका नाम वेदान्त रखा । इसी वेदान्त पर ब्रह्यासूत्र नामक दर्शन बना तथा भगवत्‌गीता उसकी प्रचारिका बनी । पुराण तो बीसवी सदी तक लिखे जाते है तथा नाम रखा पुरान । अधिकतर वेदों के भाष्प-कर्त्ता दक्षिण भारत के ही लोग रहे हैं । जैसे सायन, महीघर आदि तथा शंकराचार्य भी जिन्हें बौद्ध धर्म का नाश करने वाला माना जाता है । जो अद्वैतवाद के प्रचारक तथा वर्त्तमान हिन्दू धर्म के जनक थे जो आठवी शताब्दी मे पैदा हुये थे एवं केरल के रहने वाले थे । ज्ञातव्य हो कि शंकराचार्य को शिक्षा दीक्षा देने वाले कुमारिल भट्‌त एक कट्‌टर ब्राह्यण थे । जो छल-कपट करके बौद्धाचार्य धर्मपाल जी के चेले बनकर बौद्ध दर्शन का गहरा अध्ययन किये । पुराने जमाने में शास्त्रार्थ के माध्यम से अपने-अपने दर्शन का प्रचार-प्रसार होता था । इसी क्रम में एक दिन बौद्धाचार्य धर्मपाल जी एवं वेदान्तियों में शास्त्रार्थ शुरू हुआ । लेकिन कुछ समय बाद व्दान्ती, बौद्धाचार्य, धर्मपाल जी का जबाब देने में असमर्थ हो गये । आर्गनाइजर्स पराजय पत्र लिखने ही वाले थे कि बौधाचार्य धर्मपाल जी का चेला कट्‌टर ब्राह्यण कुमारिक भट्‌ट वेदान्तियों क हारता देख बौद्ध मंच से कूदकर वेदांतियों के मंच पर चले गये तथा वहाँ जाकर बौद्धाचार्य जी (जो उनके गुरू थे) का जबाब देने लगे । अपने शिष्य का छलपूर्ण व्यवहार देखकर धर्मपाल जी ने केवल इतना ही कहा कि कुमारिल तुमने विरोधियों का साथ देने के बौद्ध दर्शन पढ़ा था । त्था गुस्से को शांत करने के लिये मौन हो गये । इसका फायदा उठाकर वेदान्तियों ने हुल्लड़ मचा दिया “हार गये, हार गये” । इस छल से दुखी होकर बौद्धाचार्य जी शान्तभाव से वहाँ से चले गये । बाद में अपने गुरू बौद्धाचार्य जी के साथ किये गये छलपूर्ण व्यवहार को सोचकर कुमारिल भट्‍ट को इतनी आत्मग्लानि हुयी कि वो अपने पाप का प्रायश्‍चित करने के लिये खुद तुषानल (धान के भूषी की आग) में कूदकर आत्म हत्या कर लो (जल मरे) । तुषानल में जलकर मरने की परंपरा हिन्दुओं में अभी तक चली आ रही थी जिसको अंग्रेजों ने कानून बनाकर समाप्त किया । कुमारिल भट्‌ट एक बौद्ध विद्धान थे और वो बौद्ध दर्शन की वारीकियो को गहराई से जानते थे । उनहोंने अपने चेले शंकर का आत्महत्या से पहले ही बौद्ध दर्शन के गूढ़ रहस्य को पूर्णरूपेण समझा दिया था अतः उनके तुषानल में कूदकर मरने के बाद शंकर अपनी विद्वता का लेप लगाकर, बौद्ध दर्शन में उलट फेर करके, एवं कई छलक[अट पूर्ण युक्‍तियाँ लगाकर बौद्ध दर्शन को तोड़-मरोड़ कर आठवीं शताब्दी में जनता के सामने पेश किया तथा अपने को आदि शंकराचार्य घोषित किया । जो निम्नवत‌ है -१ * ब्राह्यण धर्म में कोई धर्म ग्रन्थ नहीं था- अतः बौद्ध धर्म के धर्मग्रन्थ त्रिपिटक- की तर्जपर अपने धर्मग्रन्थ का नाम- “प्रस्थान गयी” रखा । २ * बौद्ध धर्म के शून्य वाद- यानी हर चीज प्रतिकषण बदल रही है या परिवर्तन प्रकृति का नियम है - के स्थान पर कहा “दुनिया मायाजाल है या संसार नश्‍वर है केवल ब्रह्य सत्य है । जो सिद्धान्त “ब्रह्य सत्यम्‌ जगत्‌ मिथ्या” के नाम से जाना जाता है । ३ * बौद्ध धर्म के सिद्धान्त, “अत्ताहि अत्तनो नाथो कोहि नाथो परोसिया” यानी अपने स्वामी आप खुदहो की जगह पर, “अहम्‌ ब्रह्यास्मि,” मै ब्रह्या हूँ । “तत्‌ त्वम अस्मि” कहकर “अद्वैतवाद” का हिन्दू सिद्वान्त चलाया । ४ * विमक्खुओं की जगह पर ब्राह्यणों, स्थविर एवं महास्थविरों की जगह पर ऋषियों एवं महर्षियों को प्रतिष्ठित किया । सम्पूर्ण फेर बदल का कार्य शंकराचार्य ने ८ वीं शताब्दी में किया तथा अपने इस नये हिन्दू धर्म के सिद्धान्त को तलवार की नोंक पर पूरे देश में कुछ हिन्दू राजाओं की मदद से मारकाट मचाकर फैलाया । हिन्दू राजा सुघन्वा की एकलाख सेना कन्याकुमारी से कश्मीर तक आदि शंकराचार्य के पीछे-पीछे मारकाट करती हुयी पैदल चलती रही । यह सेना शंकराचार्य के आदेश पर ६०००० बौद्ध भिक्खुओं का कत्लेआम किया तथा ३६००० बुद्ध विहारों को धराशायी (जमीनदोज) किया । इसका नतीजा ये हुआ कि मैदानी इलाके से, संपूर्ण भारत मे, बौद्ध धर्म की जड़ मिटा दी गयी । कुछ वहीं भिक्खु अपनी जान पाऐ जो देश के पहाड़ों या जंगलों में छुप गये या अगल-बगल के द्वीपों मे भाग गये यही कारण है कि बाबा साहब के १९५६ में धर्मान्तरण से पहले मैदानी भारत में एक भी भिक्खू नहीं दिखायी देता था केवल ऊँचे पहाड़ पर लद्‌दाख में लामों, नेपाल मे तमंग बौद्ध, भूटान में भूटिया बौद्ध, तथा चिटगाँव की पहाड़ियों में चकमा बौद्ध, तथा असम के जंगलों में बरूआ बौद्ध बच गये थे । जिनको ट्रेडीशनल बौद्ध कहा जाता है । पूरा बौद्ध समाज बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर का ऋणी है कि उन्होंने इस देश में दुबारा बौद्ध बनने की लहर पैदा की परिणाम स्वरूप आज इस देश में बी.आर.सी. (एक एन.जी.) के सर्वे के अनुसार १८ करोड़ बौद्ध हैं । जबकि सरकारी आँकड़े ऊँट के मुँह में जीरा के बराबर है । जन गणना में बौद्धों को कम दिखाये जाने का कारण ये है कि अगर सभी शूद्रों को बौद्ध दिखा दिया जायेगा तो हिन्दू केवल आठ करोड़ रह जायेगा तथा Micro-Minority या अति अल्पसंख्यक मे तब्दील ह जायेगा । इसीलिये जनगणना के समय धर्म जाति का कॉलम ज्यादेतर खाली छोड़ दिया जाता है तथा अपनी सुविधा के अनुसार हिन्दू धर्म को ज्यादा दिखाने के लिये भर लिया जाता है । हिन्दू शब्द भारतीय नहीं है बल्कि ७१२ ई में एक विदेशे मुहम्मद बिन कासिम जो अरब का रहने वाला था- सिन्ध के राजा दाहिर को हराकर अपना राज्य कायम किया । वह कुछ समय बाद अपने काटकूनों (सी.आई.डी) के माध्यम से ये पता लगाने का आदेश दिया कि वे ये पता करें क अरब देशों एवं दक्षिण पूर्व एशिया के देशों से विशेष रूप से जम्बो द्वीप (आज का भारत) से जो व्यापारी खैबर दर्रे आदि मार्गों से आ जा कर व्यापार करते हैं उनको बार-बार कौन लोग लूट लेते हैं सी. आई. डी ने पता लगाकर राजा को बताया कि सिन्धु नदी के आस-पास कुछ बाहर से आये हुये कबीजे रहते हैं जो दूध के लिये गाय पालते हैं तथा घोड़े पालते हैं घुरसवारी के लिये । ये लोग कोई काम धन्धा नहीं करते है । यानी निकम्मे लोग हैं लेकिन अपनी जीविका चलाने के लिये आने-जाने वाले व्यापारियों को कूट लेते हैं । तथा जब कूट का माल खत्म हो जाता है तो फिर किसी दूसरे व्यापारी को लूटते हैं ये सिलसिला जारी रहता है । इस पर मु० बिन कासिम ने कहा कि “अच्छा ये सिन्धु नदी के आसपास रहनेवाले “सिन्धु” लोग हैं । तथा उनको दण्डित करने के लिये उनकी धर पकड़ शुरू की । जैसा कि आज सभी जानते हैं कि किसी-किसी भाषा में कोई-कोई अक्षर या शब्द ठीक ढंग से उच्चारित नहीं किया जा सकता है जैसे अगर कोई बंगाली जानने चाले से कहिये “वोट ” बू तो वो “भोट” बोलेगा । किसी बिहारी से कहिये कि “सड़क” बोलो तो वो “सरक” बोलेगा, तथा किसी केरल के आदमी से कहिये क “सीजर्ज” (कैची) बोलो तो वो “सीसर्स” बोलेगा इसी प्रकार फारसी भाषा में “स” को उच्चारित करते समय वह “ह” उच्चारित हो जाता है । और जब मु० बिन कासिम से ये कहा गया कि तो उसने “सिन्धु” शब्द को बोलते समय “हिन्दू उच्चारित” किया । तथा उन लोगों का नाम “हिन्दू” रखा । तभी से हिन्दू शब्द ब्राह्यणवादियों ने बड़े गर्व से अपना लिया तथा गर्व से कहते है कि वे हिन्दू हैं । उसने हिन्दू शब्द का अर्थ भी बताया कि हिन्दू मायने चोर, डकैत, गुलाम आदि । अब कुछ लोग अपने को हिन्दू कहना चाहते है तो गर्व से कहें, हमें कोई ऐतराज नहीं है लेकिन कम से कम इस देश का ९०% मूल निवासी (यानी लगभग ९० करोड़ दलित पिछड़े आदिवासी अल्पसंख्यक) चोर, डकैत नहीं हैं । अतः हिन्दू कहलाना पासन्द नहीं करेगा । उपरोक्‍त बातों के आधार पर यह बिल्कुल स्पष्ट है कि वर्त्तमान हिन्दू धर्म की उत्पत्ति “बौद्ध धर्म” के १२४० वर्ष बाद हुयी । लेकिन आज हिन्दू अपने धर्म को “सनातन धर्म” कह प्रचारित कर रहा है जो सरासर झूठ पर आधारित है । आपका ९९.९९% हिन्दू भी अपने धर्मग्रन्थ-प्रस्थान गयी का नाम तक नहीं जानता है और न ही द्वैतवाद- अद्वैतवाद का अन्तर ही जानता है । इसी लिये बाबा साहब ने कहा था कि हिन्दू धर्म कोई धर्म नहीं हैं बल्कि कर्मकाण्डों आ संकलन मात्र है । हिन्दू धर्म खत्म होकर अन्त में उसको बौद्ध धर्म की शरण ग्रहण करनी पड़ेगी ।
- आर. बी. कौल

Comments

  1. क्या मूर्खतापूर्ण कथा है---हिन्दुस्तानी भाषा तो पहले सीखले मूर्ख .... जगह जगह पर पर चोर उचक्कों वाली भाषा है....ग्यान भी वही होगा....

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  2. boddh dharm ko samajhna ho to pahle ved psdo jsb unhe samajh jaao to geeta padho fir tumhe pata chalega ki 590 bc paida hue boddh ne vahi se prerna li thi jhuth mat failaao.

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  3. एक हारे हुवे मानव

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  4. अतिसुन्दर लेख

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  5. Hmmm aaAccha lika aapne. Vastav Mai kudai Mai Bodh sahity ka itihas to milta hai Jo world wide mana jata hai..... Or prachinta janne ke liye aap dekh sakte ho ye dharm Bharat ke alava other countries Mai bhi fela hai..

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