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भ्रष्टाचार का कठिन इलाज

पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने कहा था कि विकास के लिए जो धन केंद्र से राज्यों को भेजा जाता है, उसका एक रूपये में केवल १५ पैसा ही आम जनता तक पहुंच पाता है । शेष धन बिचौलिये उड़ा ले जाते हैं । एक प्रामाणिक सर्वे के अनुसार यह कहा जा रहा है कि अब स्थिति और बुरी हो गई है और अब एक रूपये में केवल १० पैसा ही आम जनता तक पहुंच रहा है । बिहार जैसे पिछड़े राज्य में पिछले अनेक वर्षों से एक कहावत मशहूर है कि विकास का धन एक तरह से ‘लूट’ का धन है, जिसे सभी भ्रष्ट लोग ईमानदारी से आपस में बांट खाते हैं । यह सच है कि भ्रष्टाचार की गंगोत्री राजनेताओं से ही शुरू होती है । अर्थशास्त्र का एक सर्वमान्य सिद्धान्त है कि खोटा सिक्‍का बहुत शीघ्र बाजार से असली सिक्‍के को निकाल बाहर करता है । उसी तरह भ्रष्ट राजनेता ईमानदार राजनेताओं को राजनीति से बाहर कर देते हैं । राजनेताओं के भ्रष्टाचार के बारे में आए दिन तरह-तरह की कहानियां सुनने में आती हैं । अक्सर राजनेता कानून की पकड़ से बाहर निकल जाते हैं । यह सच है कि राजनेता खासकर जो मंत्री होते हैं वे अफसरों के मार्फत ही भ्रष्ट तरीके से विकास के पैसे हजम कर जाते हैं । कहा तो यह जाता है कि घुटे हुए अफसर इन राजनेताओं, खासकर नए मंत्रियों को यह गुर सिखाते हैं कि कैसे विकास का धन लूटा जाए ।
माना जाता है कि सार्वजनिक धन के लूट का सबसे अच्छा जरिया ट्रांसफर और पोस्टिंग है । जाहिर है कि यह सारा पैसा विकास के फंड से आता था । हाल तक कई राज्यों के मंत्री अपने जिलाधीश को बुलाकर कहते थे कि उन्हें पार्टी फंड के लिए एक महीने के अंदर इतने लाख रुपये चाहिए । यदि वे नहीं दे सकेंगे तो उनकी जगह किसी और अफसर की वहां पोस्टिंग हो जाएगी । चोरी के मामले में एक कहावत सर्वविदित है कि चोर यदि अपने मुखिया को चोरी करके रुपये में पचास पैसा देगा तो पचास पैसा वह अपने लिए भी रख लेता है । मुखिया को वह यही कहता है कि वह केवल पचास पैसे ही उड़ा पाया । भविष्य में जैसे ही मौका मिलेगा, वह और धन बटोर कर मुखिया को दे जाएगा । ठीक यही बात राजनेताओं, अफसरों और इंजीनियरों के बीच होती है । यदि भ्रष्ट अफसर और इंजीनियर ढेर सारा धन कमाकर मंत्रियों को देंगे तो जाहिर है उसमें से एक बड़ी राशि वे अपने लिए भी रख लेंगे । इसलिए अफसरों और इंजीनियरों की बड़ी-बड़ी कोठियां देश के बड़े शहरों में खड़ी हो जाती हैं । राजनेताओं की तरह भ्रष्ट अफसर भी अपना धन विदेशों के बैकों में जमा करते हैं । बेईमानी से कमाया हुआ काला धन स्विस बैंक के साथ-साथ संसार के कई देशों में जमा हो जाता है । थाईलैंड और मलेशिया में तो इस तरह के धन को जमा करने और निकालने में कोई कठिनाई नहीं है । आस्ट्रेलिया भी भारत से बहुत दूर नहीं है और वहां काला धन आसानी से जमा हो जाता है ।
इस सिलसिले में एक बात ध्यान देने योग्य है कि भारत में नौकरशाही उसी तरह मजबूत है जैसी जापान और आस्ट्रेलिया में । इन दोनों देशों में प्रशासन पर शिकंजा नौकशाहों ने ही कसा हुआ है । राजनेता लाचार होकर उनकी हां में हां मिलाते हैं । भारत में तो स्थिति इससे भी अधिक बुरी है । यदि किसी राजनेता ने नौकरशाहों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाया तो ये भ्रष्ट सरकारी अफसर या इंजीनियर कोई न कोई दलाल खोजकर मंत्रियों तक पहुँच जाएंगे और प्रयास करके अगले चुनाव में उस उस राजनेता का पत्ता साफ करा देंगे । ऐसा एक उदाहरण बिहार के मिथिलांचल में देखा गया था जहां एक ईमानदार सांसद ने जी तोड़ परिश्रम करके केंन्द्र से १९८७ में बाढ़ पीड़ितों को भरपूर मदद भिजवाई थी । इस सांसद के पास उन ब्लाकों की लिस्ट थी जहां राहत सामग्री या बाढ़ पीड़ितों को राहत के लिए पैसे भेजे गए थे । जब इस सांसद को यह पता चला कि भ्रष्ट राजनेताओं से मिलकर बीडीओ और सीओ ने सारा पैसा और राहत का सारा सामान हड़प लिया है तब उन्होंने उस लिस्ट को छपवाकर हजारों प्रतियां अपने निर्वाचन क्षेत्र में बंटवा दिया जिसमें लिखा था कि किस ब्लाक में राहत का कितना पैसा और कितना सामान केंद्र से आया है ।
इस पर्चे के बंटते ही आम जनता ने बीडीओ सीओ और राजनेताओं को पकड़ा और उन्हें बाध्य किया कि राहत का पैसा और सामान जनता में बांटा जाए । उस समय उस ईमानदार सांसद की वाहवाही जरूर हुई, लेकिन बाद में चुनाव के समय उस क्षेत्र के सभी भ्रष्ट राजनेता और अफसरों ने मिलकर उन्हें हरवा दिया । यह एक ऐसा उदाहरण है जिससे यह साबित होता है कि भ्रष्टाचार की गंगा की सफाई उतनी आसान नहीं है जितना हम सोचते हैं, परंतु यदि मुट्‌ठीभर भी युवा वर्ग के लोग भ्रष्टाचारियों के चेहरे से नकाब उतारने का संकल्प ले लें तो देर-सबेर देश से भ्रष्टाचार अवश्य समाप्त हो जाएगा । किसी न किसी को तो इस दिशा में पहल करनी ही होगी । सारा देश नई पीढ़ी के लोगों पर आस लगाए बैठा है ।
- डॉ. गौरी शंकर राजहंस

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