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जलवायु पर भारत का नया नजरिया

पर्यावरण पर संयुक्‍त राष्ट्र की नई संधि पर दिसंबर में कोपेनहेगन में दस्तखत होने हैं । ग्लोबल वार्मिंग का कारण बनी ग्रीन हाउस गैसों को किस तरह कम किया जाए, इस पर विकसित विश्‍व और विकासशील देशों को सहमति बनानी है । अमेरिका चाहता है कि भारत और चीन जैसे देश लक्ष्य बनाकर इन गैसों का उत्सर्जन कम करें । तेजी से बढ़ रही दोनों देशों की अर्थव्यवस्था में इस उत्सर्जन की मात्रा भी बढ़ रही है । भारत का तर्क है कि इसका उसके आर्थिक विकास पर असर पड़ेगा, वह चाहता है कि विकसित विश्‍व इन्हें नियंत्रित करें, साथ ही उत्सर्जन कम करने की नई तकनीक में निवेश करें । भारत ने साफ कर दिया है कि वह कार्बन उत्सर्जन पर किसी भी तरह की कानूनी अनिवार्यता स्वीकार्य करने को तैयार नहीं है । इस समय कार्बन उत्सर्जन की ८० फीसदी वृद्धि भारत और चीन जैसे देशों में ही हो रही है । भारत का तर्क है कि अगर उसकी अर्थवयवस्था इसी दर से तरक्‍की करती रही, तब भी अगले एक या दो दशक में उसका प्रति व्यक्‍ति कार्बन उत्सर्जन विकसित देशों के मुकाबले काफी कम होगा । हाल में ही अमेरिका के प्रतिनिधि सदन में एक बिल पास किया गया है, जिसमें यह प्रावधान है कि जो देश उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्य को पूरा नहीं करेंगे, उनके उत्पादों पर खास टैक्स लगाया जाएगा । इसे एक तरह का संरक्षणवादी कदम माना जा रहा है, जिसका मकसद अपने देश के व्यापार को बचाना है । पर्यावरण पर अंतरराष्ट्रीय वार्ता में एक बड़ी बाधा यह है कि विकसित देश इसके लिए समुचित तकनीक न तो विकासशील देशों को देना चाहते हैं और न ही उसमें पर्याप्त निवेश करना चाहते हैं । वे चाहते हैं कि विकासशील देश खुद ही उत्सर्जन में कटौती करें और खुद ही उसकी लागत का भार भी उठाएं । भारत इस मामले में अमेरिका से द्विपक्षीय समझौता करने की कोशिश कर रहा है । अगर इस पर कोई सहमति बनती है तो वह कोपनहेगन सम्मेलन में विकसित और विकासशील देशों के समझौता मॉडल के रूप में रखी जा सकेगी ।
लेकिन इस सम्मेलन से पहले कई बाधाओं को पार करना होगा । अमेरिका के वर्तमान प्रशासन ने १९९० के मुकाबले २०५० तक ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में ८० फीसदी कटौती करने का वादा किया है । जापान के नए प्रधानमंत्री यूकियो हतोयामा ने भी २५ फीसदी कटौती की बात कही है । इसके चलते विकासशील देशों पर भी दबाव बन रहा है कि वे अपने यहां गरीबी उन्मूलन की कोशिशों को चलाते हुए भी पर्यावरण बदलाव के लिए कुछ करें । यही वजह है कि पिछले हफ्ते पर्यावरण बदलाव पर न्यूयॉर्क में हुए संयुक्‍त राष्ट्र सम्मेलन में चीन और भारत ने इस सिलसिले में सकारात्मक संकेत दिए ।
जुलाई में जब अमेरिकी विदेशमंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत आई थीं तो लग रहा था कि इस मामले में भारत का स्वर अवज्ञापूर्ण है । पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने तब सार्वजनिक तौर पर कहा था, ‘उत्सर्जन कटौती पर हम कानूनी बाध्यता नहीं स्वीकार करेंगे । ’ भारत और चीन पर विकसित देश लगातार यह दबाव डाल रहे हैं कि वे उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य को स्वीकार करें । भारत का तर्क यह है कि ऐसे दबाव के आगे झुकने का सवाल ही नहीं है, क्योंकि भारत में प्रति व्यक्‍ति उत्सर्जन सबसे कम है । भारत ने पश्‍चिम के देशों में कार्बन टैक्स लगाए जाने का भी खासा विरोध किया है, क्योंकि इसका उसे निर्यात पर पड़ेगा ।
लेकिन न्यूयॉर्क के सम्मेलन में जयराम रमेश की टिप्पणियों से ऐसा लगा कि भारत इस मसले पर अपना रवैया लगातार बदल रहा है । जहां उन्होंने कहा कि भारत कोई बहानेबाजी नहीं कर रहा वह स्वैच्छिक रूप से कटौती के लिए तैयार है । हलांकि अभी अंतरराष्ट्रीय कटौती स्वीकार करने का सवाल ही नहीं है, लेकिन भारत अब अपनी वैश्‍विक साख के लिये यह भी कह रहा है कि वह राष्ट्रीय लक्ष्य बनाकर उसे हासिल करने की कोशिश करेगा ।
रवैये में इस बदलाव के दो कारण हैं । एक तो पर्यावरण बदलाव पर चीन का नजरिया । चीन ने घोषणा की है कि वह राष्ट्रीय पर्यावरण परिवर्तन प्रोग्राम बनाकर उत्सर्जन कम करने और जंगलों को बढ़ाने के अपने लक्ष्य को हासिल करेगा । भारत को पता ही नहीं था कि चीन संयुक्‍त राष्ट्र महासभा में इस तरह की घोषणा करने वाला है, और अब वह इसी राह पर चलना चाहता है । भारत इस पर चीन से बातचीत की योजना भी बना रहा है ।
दूसरा कारण यह है कि देश के सामरिक विशेषज्ञों की यह धारणा बन रही हैकि बढ़ती ताकत के कारण भारत को अपनी ही शर्तों पर वैश्‍विक मसलों में दखल देनी चाहिए । दो महीने पहले इटली में हुए मेजर इकॉनमी फोरम के सम्मेलन में भारत इस बात पर सहमत हो गया था कि सभी देशों को उत्सर्जन घटाना चाहिए, ताकि विश्‍व तापमान को दो डिग्री से ज्यादा न बढ़ने दिया जाए । आलोचकों का कहना है कि इसने कोपहेगन सम्मेलन में भारत की राजनयिक संभावनाओं को कम कर दिया है । लेकिन भारत को उम्मीद है कि इससे उसकी रंग में भंग डालने वाली छवि खत्म होगी । इसी के चलते भारत ने ईधन और ऊर्जा के कई लक्ष्य स्वीकार भी किए हैं । भारत एक जिम्मेदार विश्‍व ताकत की छवि बनाना चाहते है, जो दुनिया की समस्याओं के हल के लिए हर बात पर न कहने के बजाए सकारात्मक मदद देना चाहता है ।
लेकिन इन सबके बावजूद यह अभी स्पष्ट नहीं है कि अगर पर्यावरण बदलाव की बातचीत सफल होती है तो अमीर औद्योगिक देश विकासशील देशों को तकनीक और वित्तीय मदद देने का काम करेंगे या नहीं । ऐसा कोई वायदा अभी नजर नहीं आ रहा है । वित्तीय और तकनीकी मदद के बगैर भारत जो देश ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को रोकने की कोशिश की अंतरराष्ट्रीय जांच नहीं होने देंगे । पर्यावरण बदलाव की बातचीत से सिर्फ परस्पर विरोधी आर्थिक हित सामने आ गए हैं विकसित और विकासशील देशों के आपसी रिश्तों के सैद्धान्तिक मुद्दे भी खड़े हो गए हैं । अतीत में भारत हमेशा ही विकासशील देशों की अगुवाई में खड़ा होता रहा है, उन समझौतों को वीटो करता रहा है, जो भेदभावपूर्ण थे । पर्यावरण प्रदूषण को रोकने की पश्‍चिम की ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी ऐसा ही मसला है, जिसमें सहमति बनाना भारत के लिए आसान नहीं होगा । लेकिन दुनिया के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती है, भारत ने धीरे-धीरे उसके प्रति अपना रवैया बदल दिया है ।
हर्ष वी. पंत

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