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कैसे होगी वैश्‍विक षड्‍यन्त्रों से भारत की रक्षा ?

विश्‍व के सबसे प्रमुख देश अमेरिका, जो किसी भी तरह अपने को नं १ के स्थान पर बनाये रखना चाहता है की कार्य पद्धति स्पष्टतः व्यापार के द्वारा गरीब देशों की जनता का शोषण करने की है । यूरोप ने सम्पूर्ण विश्‍व को एक बाजार के रूप में देखा है, बाजार का सीधा अर्थ है जहाँ-जहाँ पूजी एकत्र होती है, पूंजी का जमाव करने से यूरोपीय बाजार व्यवस्था की मालिक बहुराष्ट्रीय कम्पनी का लक्ष्य पूर्ण हो जाता है । चिकित्सा व्यवस्था के लिए पहिले ये कम्पनियां दवा बनाती हैं फिर किसी भयानक रोग का झूठा प्रचार करती हैं । थोड़े दिनों में जब आदमी डरने लगता है तो उसकी दवाओं की बेतहाशा बिक्री शुरू हो जाती है । डॉक्टर भी इस षड़यन्त्र का शिकार हो जाते हैं और वे हमारे भारत देश को अनजाने में कंगाल बनाने में विदेशियों के मददगार बन जाते हैं । जब तक एक रोग का जोर ठण्डा पड़ता है, तब तक दूसरी दवा और दूसरा रोग तैयार कर लिया जाता है । इस प्रकार इनका षड़यन्त्र चलता रहता है । यह षड़यन्त्र शिक्षा के क्षेत्र में शिक्षा को महंगा बनाकर किया जाता है । आज की शिक्षा का उद्देश्य जल्द से जल्द धन कुबेर बनने का मार्ग भी है । इसी प्रकार यह कंपनियाँ खाद्य पदार्थों में कीटनाशकों का प्रयोग करती हैं, जबकि कीटनाशकों से व्यक्‍ति बीमार हो जाता है, शरीर कमजोर होता है, उसकी रोग प्रतिरोधक शक्‍ति कम हो जाती है । पहिले फास्ट फूड का व्यवसाय फिर दवाओं का व्यवसाय, प्रत्येक दवा का साइड इफैक्ट भी होता है, इसलिए नई-नई जान लेवा बीमारियों का अंतहीन क्रम चलता ही रहता है । बाजार व्यवसायी यानी पहिले माल तैयार करना, फिर उसकी खपत के लिए बाजार खोजना, बाजार में ग्राहक चाहिए, माल की मांग चाहिए, भारत की जरूरत चाहिए, आवश्यकता की अनुभूति बढ़े । इसके लिए उत्तेजक, भड़काऊ विज्ञापन प्रकाशित व प्रचारित किये जाते हैं । विज्ञापनों में सुन्दरी चाहिए, नग्न अथवा अर्द्ध नग्न जैसी तस्वीरों की प्रस्तुति तथा उसके प्रति आकर्षण बढ़ने से उनके बाजार का उद्देश्य पूर्ण हो जाता है और यूरोपीय देश मालामाल हो जाते हैं । लोगों का ध्यान पूंजी बटोरने की उनकी साजिशों की ओर न जाये इसलिए भारत, पाकिस्तान हिन्दू-मुसलमान आरक्षण, वैमनस्य आदि लक्ष्यों के बीज बोये जाते हैं । तुम लड़ो-मरो हम माला माल हो जायें । उनके इसी हित साधने में हम भी जाने अनजाने में मदद कर रहे हैं । इस षड्‍यन्त्र को हम सभी को गंभीरता से समझना चाहिए । लार्ड मैकाले वाली शिक्षा नीति इस देश को लोग मात्र शरीर से भारतीय तथा वेषभूषा का चरण व मान्यताओं से यूरोपियन हैं । लार्ड मैकाले शिक्षा नीति के तहत पढ़ने वाले लोग ही शिक्षित माने गये बाकी को अनपढ़ घोषित कर डिग्रियाँ बाँटने वाली शिक्षा लागू कर कानून की शिक्षा के बहाने इसी देश के युवकों को अपने ही देशहित शासन करने के लिए तैयार किया गया । न्याय के नाम पर दी जाने वाली यह शिक्षा प्रथम बार एक ऐसी व्यवस्था को विकसित कर रही थी वास्तविकता व सत्य के आधारित नहीं थी, अपितु किताबों व दलीलों, बने बनाये कानून और गवाहों के आधार पर न्याय दिया जाने लगा । साथ ही यह धन और ताकत से खरीदा जा सकता हो । हमारे इस विशाल देश पर शासन करने के लिए पहिले देश को शिक्षा तंत्र को तोड़ा गया फिर न्याय तंत्र को ध्वस्त किया गया । हमारी भारतीय व्यवस्था न तो किसी कानून पर न किसी फीस पर निर्भर थी बल्कि सत्य प्रमाण पर आधारित थी । यहाँ शिक्षा और न्याय समान रूप से सहजता से उपलब्ध थे । राजा के बेटों को भी गुरुकुल जा कर ही शिक्षा प्राप्त करनी पड़ती थी । शिक्षक आज की तरह बिकाऊ नहीं थे, उन्हें खरीद कर घर बुलाने का प्रचलन नहीं था । शिक्षकों व आचार्यों को जीवन त्याग पूर्ण होने के कारण जन समर्थन उनके साथ होता था । इस देश की जनता ने सदा त्यागपूर्ण जीवन जीने वाले व्यक्‍तियों का अनुसरण किया है । राज्य सत्ता इस देश में कभी भी सर्वोपरि महत्व की नहीं रही । योजनाकारों ने विचार मंथन के पश्‍चात यह निष्कर्ष निकाला कि अन्य देशों की तरह भारत पर शासन नहीं किया जा सकता क्योंकि यहाँ का समाज शिक्षित, स्वावलम्बी एवं धन सम्पन्‍न है । भारत में यदि शासन करना है तो पहिले इसकी सम्पन्‍नता के आधार स्तम्भों को ध्वस्त करना होगा ।भारतीय समाज में व्यवसाय स्वावलम्बी रहे हैं । श्रमिक वर्ग का कोई स्थान नहीं था सभी मालिक थे । व्यवसाय में लकड़ी में बढ़ई, स्पात में लुहार, बर्तन में ठठेरा, मिट्टी बर्तन में कुम्हार, तेल के लिए तेली ही नहीं बल्कि दर्जी, नाई, धीमर, सब्जी वाले सभी अपने-अपने व्यवसाय में खुश थे । इनके व्यवसाय में राजा भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता था । इस व्यवसाय के ध्वस्त करने की स्थितियाँ सामाजिक अवमानना के रूप में उसे सजा भी भुगतनी पड़ती थी । जीविका के लिए सभी व्यक्‍ति स्वावलम्बी थे और आर्थिक रूप से अपने भविष्य के प्रति आस्वस्त भी रहते थे । भारत कृषि प्रधान देश है इस कारण कृषि व्यवस्था भी स्वावलम्बी थी । जल संरक्षण का कार्य कुआं, बावली, तालाब, पोखरे आदि बनाकर किया जाता था किसी समाज को गुलाम बनाने के लिए उसका असहाय या निर्धन होना साथ ही उसका शासन पर निर्भर होना आवश्यक होता था । यह विचार लेकर अंग्रेजों ने योजना बनाई, सन्‌ १४९२ में गोरों ने लूट प्रारम्भ कर दी । वास्कोडिगामा पूर्व में और कोलम्बस ने अमेरिका पहुँच कर ११ करोड़ भारतीय मूल निवासियों को मौत के घाट उतार दिया । इस प्रकार अमेरिका का जन्म हुआ । इस प्रकार चाहे जैसे हो सके असुरत्व को मिटा देना, वर्तमान एकमेव लक्ष्य रहे । मैकाले पुत्र इस बार उनके शस्त्र हैं । इस षड्‍यन्त्र को समझते हुए सन्‌ १९५७ की क्रान्ति की रणनीति का अनुसरण करते हुए एक विराट जन आन्दोलन जागा । भारतीय प्रकृति की शासन व्यवस्था को लाते हुए एक अखण्ड भारत का जन्म हो । अक्षय ध्येय निष्ठा का कसौटी की यह सही समय है । समय आ गया है चेतने का । अब आवश्यकता है कूटनीति योजना द्वारा भारत को सफलता प्राप्त करने की । १६ वीं शताब्दी से विश्‍व के संसाधनों को लूटने गोरी जाति ने पिछली पाँच सदियों में देश, धर्म, मानवता, प्रकृति, पर्यावरण सभी के साथ बलात्कार किया है । समय आया है इस आसुरी शक्‍ति को उखाड़ फेंका जाय । धर्म दण्ड जिनके हाथ में होगा उसकी विजय सुनिश्‍चित है । हमारा भारत देश एक बार पुनः आसुरी शक्‍तियों के चंगुल में फँस चुका है । जनता चारों ओर त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही है, नेताओं से भी विश्‍वास उठ चुका है । ऐसे में देश की ऋषि संत शक्‍ति सज्जनों का दायित्व बन जाता है कि वे भारत की प्राचीन परम्परा का निर्वाह करते हुए आज की दानवी शक्‍ति का संहार करते हुए, श्री स्वामी रामकृष्ण और चाणक्य की तरह अल्पज्ञों के देखने को नजरंदाज करते हुए धर्म संस्थापनार्थ समस्त स्वार्थों एवं वैमनस्यों को भुलाकर एक प्रचण्ड शक्‍ति के साथ इन दुराचारियों को परास्त करने में सामने आवें । देश बचेगा तो ही मठ, मंदिर, समाज, सब कुछ बचेगा । हमें अब जुझारूपन से जागना होगा । बहुत ताण्डव हो चुका, प्रत्येक देश को अखण्ड भारत का लोहा मानना ही होगा ।
- वैद्य आर. के. वार्ष्णेय , आयुर्वेदाचार्य ,गायत्री निदान चिकित्सा समिति, पैरारा, मथुरा-२८१२०५

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