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सरकारी जमीन पर बने प्राइवेट स्कूलों की मनमानी

सरकारी जमीन पर बने गैर सहायता प्राप्त कुल ३९४ स्कूलों में सिर्फ १८३ स्कूल ऐसे हैं, जिनमें शर्त के मुताबिक १५ फीसदी सीटों को आर्थिक रूप से कमजोर स्टूडेंट द्वारा भरा गया है । १८९ स्कूल ऐसे हैं जिन्होंने कोटा से संबंधित जानकारी दिल्ली सरकार को मुहैया नहीं कराई । ये बातें सरकार की ओर से हाई कोर्ट में दाखिल स्टेटस रिपोर्ट में कही गई हैं । पिछली सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सरकार से इस बाबत स्टेटस रिपोर्ट फाइल करने को कहा था । गौरतलब है कि इस बाबत २००२ में हारी कोर्ट में एक याचिका दायर कर कहा गया था कि राजधानी में सैकड़ों स्कूल ऐसे हैं जो सरकारी जमीन पर हैं और इसके शर्तों के मुताबिक उन स्कूलों में २५ फीसदी सीट आर्थिक रुप से कमजोर वर्ग के बच्चों से भरा जाना चाहिए । साथ ही उन्हें फीस में भी छूट का प्रावधान था । याचिकाकर्त्ता के वकील अशोक अग्रवाल ने बताया कि कुल ३९४ स्कूल ऐसे हैं जो गैर सरकारी सहायता प्राप्त हैं और इन्हें डीडीए और एलएनडी से जमीन मिली हुई थी । २० जनवरी २००४ को हाई कोर्ट ने सरकार से कहा कि वह उन स्कूलों को तलाशे जिन्हें सरकार ने जमीन दी हुई है और उनकी लिस्ट डीडीए और एलएनडी को मुहैया कराए, ताकि वह एक्शन ले सके । इसी बीच सरकार ने २५ जनवरी २००७ को एक नोटिफिकेशन जारी किया जिसके तहत यह तय किया गया कि जिन स्कूलोंको सरकार से जमीन मिली हुई है उनकी २० फीसदी सीट आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग के बच्चों से भरा जाएगा । इस ऑर्डर को कई स्कूलों ने हाई कोर्ट में चुनौती दी । हाई कोर्ट ने स्कूलों से कहा कि वे अदालत में हलफनामा दायर कर बताएं कि वह १५ फीसदी सीटें कमजोर वर्ग के लिए आरक्षित करने को तैयार हैं और १५ फीसदी सीटों पर कोटे के तहत दाखिला होगा । इसके बाद स्कूलों ने हाई कोर्ट के सामने इस बाबत अंडरटेकिंग दे दी । इसके बाद अशोक अग्रवाल ने हाई कोर्ट को बताया कि कई स्कूल ऐसे हैं जिनमें सीटें खाली रह जाती हैं और इसे भरने की कोई कोशिश सरकार नहीं करती ।

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