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“पुरवाईयाँ”

मेरे आंगन में वो पुरवाईयां नहीं chalatii
jo अदब से झुकी वो डालियां नही phalatii
jab से आई है मेरे शहर मे निश्‍चय की havaa
phool कवियों में वो खुशबू ही नहीं मिलती ।
बेहयायी को लोग मान रहे आजादी
दे रहे बच्चों को जन्म कई तो बिन शादी
अपनी करनी की सजा दे रहे है ये इनको
जुर्म की टहनियां देखी हैं क्या कभी फलती....
..देखकर चाल जमाने की मन सुलगता hai
har तरफ शोर है फिर भी ये तन्हा लगता hai
kisii के दर्द का अहसास अब नहीं hotaa
log जिन्दा हैं मगर जिन्दगी नही मिलती...
सूने मंदिर हैं सूने दीप सूना शिवाला
आज मयखाने मे अधनग्न नाचती बाला
तंग कपड़ों से झांकती है आज बेशर्मी
हो गई शर्मो हया बात अब कल की ...
कुल वधू, सुर्ख लवों पर धुँआ उड़ाती hai
usakii तन्हाईयों में जाय उसका साथी hai
aaj कपड़ों की तरह अस्मिता बदलती hai jaane
क्यों आत्मा की दिल पर अब नही चलती.....
आज ममतामई माँ मोम हुई जाती है
प्यार बच्चों पे नहीं स्वानों पर लुटाती है
आज दीदी मेरी डॉ. बनके मुस्कुराती है
पिता के सामने कांटा लगा सुनाती है..
..मेरे बच्चे मुझे जिन्दे को डैड कहते hai
mujhe बाबू जी नहीं घर का हैड़ कहते hain
merii बीबी ने जिन्दगी गुजार दी saarii
aake इस मोड़ पर कहती है अब नही बनती मेरे आंगन में......
गली के कुत्ते को कुत्ता कहा था गुर्राया
कहा जो प्यार से डोगी तो मैने पास आया
अकड़ के बोला मुझे रोज डांटते क्यों हों
तुम्हारे घर खुद तुम्हारी जब नहीं चलती ।
- इन्द्रजीत सुकुमार

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