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जहरीली हो चुकी है दिल्ली की जलवायु

दिल्ली में जहां-जहां लैंडफिल हैं, वहां के आसपास का भू जल जहरीला हो चुका है । पीना तो दूर यह अन्य कार्यों के लिए भी उपयोगी नहीं रह गया है । इनसे उठती गंध और गंदगी की वजह से आसपास लोगों का सांस लेना भी दूभर है । वायु पदूषण का स्तर खतरे को पार कर चुका है । इस सब के बावजूद लैंडफिल की समस्या से स्थाई रूप से निजात पाने के लिए न तो दिल्ली सरकार के पास कोई योजना है और न ही दिल्ली नगर निगम के पास । दिल्ली के ओखला और गाजीपुर लैंडफिल साइट के आसपास रह रहे लोगों का जीवन नारकीय हो चुका है । भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) की भारत में अपशिष्ट प्रबंधन’ नामक रिपोर्ट में दिल्ली के भलस्वां और ओखला लैंडफिल के आसपास भूजल का टीडीएस (टोटल डिजॉल्वड सॉलिड) अपेक्षित सीमा से ८०० फीसदी अधिक है । इसकी वजह से भूजल का भारीपन निर्धारित सीमा से ६३३ प्रतिशत अधिक हो चुका है । इस लैंडफिल के कीचड़ का विश्लेषण दर्शाता है कि पानी का डीडीएस उचित सीमा से २००० प्रतिशत अधिक है और उसका खारापन ५३३ फीसदी अधिक । पानी में क्लोराइड्‌स की अपेक्षित सीमा २५० मिग्रा प्रतिलीटर की तुलना में ४१०० मिग्रा प्रतिलीटर है ।ओखला लैंडफिल साइट का टीडीएस अपेक्षित सीमा से २४४ प्रतिशत अधिक है । भूजल जहरीला हो चुका है । इन लैंडफिलों के आसपास की वायु की गुणवत्ता भी नष्ट हो चुकी है । इसके आसपास के इलाके का वायु प्रदूषण खतरे के स्तर को कभी का पार कर चुका है । रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में कूड़ा निबटान के लिए निजी कंपनियों का सहयोग लिया गया है । कूड़े को कार्बनिक और अकार्बनिक में बांटकर निपटाने की प्रक्रिया भी अपनाई गई है, लेकिन इसकी प्रतिशतता काफी कम है । राज्य के स्तर पर इन योजनाओं के संबंध में न तो सही सूचना है और न ही इससे उत्पन्न दुष्प्रभाव के विश्लेषण के लिए आंकड़े । इस कारण इनकी वजह से पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में राज्य स्तर पर कोई भी जानकारी हासिल करना मुश्किल है । अब जब दुष्प्रभाव के बारे में ही सही जानकारी नहीं है तो उससे निपटने की योजना कैसे बनेगी? रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि सरकारी विभागों द्वारा कूड़े के अनुचित निपटान के कारण पर्यावरण पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की नियमित मॉनटरिंग की जाए, अन्यथा सबकुछ अंधेरे में ही चलता रहेगा और एक दिन ऐसा आएगा जब दिल्ली की जलवायु में रहना बेहद मुश्किल हो जाएगा ।

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