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ब्लॉग लिखनेवालों की श्रेणी में अब हरियाणा के किसान भी

आज का किसान खेत और मीडियों तक ही सीमित नहीं रह गया है । अब उसने हल के हथिये तथा बैलों की लगाम के साथ-साथ कंप्यूटर के माउस पर क्लिक करना भी सीख लिया है । ये किसान बड़े-बड़े अभिनेता और राजनेताओं की तरह कृषि से संबंधित जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए ब्लॉग लिखने लगे हैं । किसान हर सप्ताह खेतों में शोध करके उसकी पूरी रिपोर्ट ब्लॉग पर फोटो सहित डालते हैं । जींद के इन किसानों ने अपनी किसान-खेत पाठशाला भी शुरू की है । इसका खर्च वे खुद उठाते हैं । जिले के पांच किसान हर सप्ताह ब्लॉग लिखते हैं । शुरूआती समय में इन किसानों को परेशानी जरूर आई । निडाना गांव के पूर्व सरपंच रतन सिंह, ईगराह गांव के किसान मनवीर रेढू भी काफी समय से ब्लॉगिंग कर रहे हैं । अब उससे प्रेरणा लेकर ललितखेड़ा गांव निवासी राजकुमार, निडाना के रणवीर सिंह, ईगराह के धर्मबीर भी ब्लॉग लिखने लगें हैं । इन किसानों ने नौगामा नाम से अपना ब्लॉग शुरू किया है । इसके अलावा कृषि चौपाल, इनसेट लिटरेसी, कीट साक्षरता के नाम से भी ब्लाग में ये किसान सह लेखक (को-राइटर) के रूप में काम करते हैं और समय-समय रिपोर्ट को लिखते हैं । इन ब्लॉगों को भारत के कृषि विश्‍वविद्यालयों तथा कृषि अनुसंधान केंद्रों के वैज्ञानिक भी पढ़ते हैं । यहां खास बात यह है कि किसानों द्वारा किए गए छोटे शोधों के आधार पर वैज्ञानिकों ने कई बड़े शोध कार्य भी किए हैं । किसानों ने सरकार की तर्ज पर खुद की किसान-खेत पाठशाला शुरू कर दी है । इसका खर्चा ये किसान ही उठाते हैं । इसके लिए प्रति किसान ५०० रूपये एकत्रित किए गए और इस राशि को कृषि शोध में लगाया जा रहा है । इस कार्य में कृषि विभाग द्वारा भी इन किसानों की सहायता किसी न किसी रूप में की जाती है । किसान रतन सिंह और मनवीर रेढू का कहना है कि शुरूआती समय में उन्हें कुछ हिचकिचाहट जरूर हुई । अपनी पढ़ी-लिखी संतान को देखकर और एडीओ डॉ. सुरेंद्र दलाल द्वारा प्रेरित करने से आज वह इस लायक हो चुके हैं कि कंप्यूटर पर काम कर सकते हैं और पूरी दुनिया के सामने अपनी बातें रख सकते हैं ।

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वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चों को एक परिपक्व इन्सान बनाना होता है, ताकि वो कल्पनाशील, वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और देश का भावी कर्णधार बन सकें, किन्तु भारतीय शिक्षा पद्धति अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त कर सकी है, कारण बहुत सारे हैं । सबसे पहला तो यही कि अंगूठाछाप लोग डिसा‌इड करते हैं कि बच्चों को क्या पढ़ना चाहिये, जो कुछ शिक्षाविद्‍ हैं वो अपने दायरे और विचारधारा‌ओं से बंधे हैं, और उनसे निकलने या कुछ नया सोचने से डरते हैं, ऊपर से राजनीतिज्ञों का अपना एजेन्डा होता है, कुल मिलाकर शिक्षा पद्धति की ऐसी तैसी करने के लिये सभी लोग चारों तरफ से आक्रमण कर रहे हैं, और ऊपर से तुर्रा ये कि ये सभी लोग समझते हैं कि सिर्फ वे ही शिक्षा का सही मार्गदर्शन कर रहे हैं, जबकि दर‌असल ये ही लोग उसकी मां बहन कर रहे हैं । मैं किसी एक पर दोषारोपण नहीं करना चाहता, शिक्षा पद्धति की रूपरेखा बनाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिये और सोचना चाहिये, कि क्या उसमें मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है। आज हम रट्टामार छात्र को पैदा कर रहे हैं, लेकिन वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और परिपक्व छात्र नहीं, क्या यही हमा…

राजनीति में भ्रष्टाचार

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एक आरटीआई एक्टिविस्ट के संघर्ष की कहानी, उसी की जुबानी

पिताजी गुरु भी थे। गरीबी, प्राइवेट ट्यूशन वगैरह करके आजीविका चलाते; परिवार चलाने के साथ-साथ सारे समाज, देश की चिंता उनका प्रमुख स्वभाव रहा। हमेशा दूसरों से कुछ अलग करने की चाह; सीमित संसाधनों में भी देश, समाज और मित्रों के लिए समय निकालना; शायद उनका यही स्वभाव मेरे मस्तिष्क में रच-बस गया, कार्यशैली का हिस्सा बन गया। छात्र जीवन बहुत फाकाकशी, गरीबी का रहा, लेकिन मेरे पिताजी ने अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया। हमारे मकान का धरन (कड़ी) लकड़ी का था, जो टूट गया था। उसी पर पूरे छत का लोड था। मकान कब गिर जाय, कुछ ठिकाना नहीं।प्लास्टिक के टेंट लगाकर रहते थे। कभी घर में चूल्हा भी नहीं जलता था। ऐसी ही परिस्थितियों में एक बार गुल्लक तोड़ा, तो पाँच रुपए निकले। उन्हीं से दो किलो चूड़ा लाया था। उसी को भिंगोकर, नमक-मिर्च लगाकर सपरिवार ग्रहण किया। अपनी शादी बिना तिलक-दहेज के की। दो बहनों की शादी आज से बीस साल पहले दिल्ली में मात्र सत्रह हजार की मामूली रकम में ही की। दोनों बहनों की शादी एक ही तिथि में किया। हमारे समाज (अखिल भारतीय खटिक समाज) के जो राष्ट्रीय पदाधिकारी थे, उन्होंने अपना मकान पंद्…