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कैसी यह समरसता है

प्रजा तंत्र से अलग थलग है कैसी अजब विवशता है ।
कथनी करनी का अन्तर है कैसी ये समरसता है ।
सिद्वान्तों के लिए लड़े वो सिद्वान्तों से भटक गये
मूल्यों के आदर्श बने वो मूल्यों से ही भटक गये ।
सचिव, वैद गुरू सभी रहे जो धर्म कर्म उद्‌घोषक थे
सत्‍ता का संरक्षण पाकर धर्म कर्म से भटक गए ।
राम राज से अलग थलग है कैसी अजब विवशता है ।
कथनी करनी का अन्तर है कैसी ये समरसता है ।
मनसा वाचा और कर्मणा पतित बने जो पावन
the phutapaathon पर भटक गए जो कभी बने घर आंगन थे ।
संवेदन निष्पन्द हो गया स्वार्थमयी मनसा पाकरभूल गए
अपना स्वभाव जो कभी बने मनभावन थे।
प्रेम प्रीति से अलग थलग है कैसी अजब विवशता है ।
कथनी करनी का अन्तर है कैसी ये समरसता है ।
चन्दन व्याकुल हुआ क्षणों में विषधर की फुसकारों se
padii अहिंसा कही सिसकती आतंकी मनुहारों से ।
कैसा विषमय बीज वो दिया मधुवन के रखवालों ne
chadii उलूकों पर तरूणाई छलनामय अधिकारों से ।
राज नीति से अलग थलग है कैसी अजब विवशता है ।
कथनी करनी का अन्तर है कैसी ये समरसता है ।
- डॉ० वी. डी. गुप्ता , पूर्व अध्यक्ष, समाजशात्र विभाग , मोती बाजार, हाथरस

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