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भारतीय भाषाओं के संरक्षण की चुनौती और साहित्यिक पत्रिकाएँ

प्रसिद्ध साहित्यकार रामविलास शर्मा के आलेख जाति, जनपद, राष्ट्र और साहित्य के अनुसार नागार्जुन ने मैथिली में कविताएँ लिखी हैं, केदार और त्रिलोचन ने अवधी में । जनपदीय भाषा के माध्यम से ये कवि अपने क्षेत्र के किसानों तक, कुछ पढ़े-लिखे लोगों तक पहुँचते हैं । हिंदी उर्दू दो जातियों की अलग-अलग भाषाएँ नहीं हैं वे एक ही जाति के भाषा के दो रूप हैं । इन दो रूपों में जो समानता है, वह बुनियादी है, जो भिन्‍नता है, वह गैर बुनियादी है । उर्दू जितना ही जनपदीय भाषाओं के नजदीक आएगी, उतना ही हिंदी से उसका अलगाव कम होगा । जिन देशों में पूँजीवाद का भरपूर विकास हुआ है, उनमें भी जनपदीय भाषाएँ पूरी तरह अंतर्धान नहीं हुई । भारत में वे बहुत दिनों तक रहेंगी और निरंतर जातीय भाषाओं को प्रभावित करेंगी । जिस प्रान्त में ८५ प्रतिशत किसान हों, वहाँ नागरिक भाषाएँ उससे प्रभावित हुए बिना कैसे रह सकती हैं? उल्टा सुबोध होने के लिए उसे अपना रूप बदलना होगा । अपने विकास के लिए उसे गाँवों में जाना होगा, जहां जीवन का स्त्रोत है और प्रकृति के संसर्ग में जहाँ भाषा की जातीयता गढ़ी जाती है । प्रेमचंद की हिंदी जनपदीय भाषाओं के नजदीक होने के कारण ही लोकप्रिय हुआ । भाषा की समस्या सुलझाने के लिए हमने अपने गाँवों की भाषाओं में व्याप्त एक जातीयता और नैसर्गिक संस्कृति की ओर अभी तक उचित ध्यान नहीं दिया पचास अथवा सौ वर्ष आगे चलकर जो खड़ी बोली देश के कोने-कोने में गूँजेँगी उसका आज की खड़ी बोली से कितना विभिन्‍न रूप होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है । लोग अनुभव कर रहे हैं कि हिंदी-उर्दू का झगड़ा मिटाने के लिए हमें अपनी भाषा को देहाती उपभाषाओं की सहज विकसित जातीयता के अनुरूप गढ़ना होगा । तुलसीदास और सूरदास जैसे कवियों की भाषा की शक्‍ति का बहुत बड़ा कारण उनका जनपदीय स्वभाव है । सूरदास की भाषा ब्रज के बाहर हिन्दी के अन्य जनपदों में तो लोकप्रिय है ही, वह हिंदी के प्रदेश के बाहर अन्य प्रदेशों में भी लोकप्रिय है । भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, प्रताप नारायण मिश्र, बालमुकुन्द गुप्त, प्रेमचन्द्र का गद्य हमारी जातीय भाषा का बहुत अच्छा नमूना है । जातीय भाषा का नमूना उनका हिंदी गद्य है उर्दू गद्य या पद्य नहीं । इसका कारण यह है कि हिंदी तो संस्कृत शब्दों को तद्‌भव रूप में ले लेती है, उर्दू अरबी-फारसी शब्दों को तद्‌भव रूप में नहीं लेती, लेकिन जनपदीय भाषाएँ अरबी-फारसी शब्दों का चोला बदलने में थोड़ा भी हिचकती नहीं है । यही नीति मराठी और बांग्ला जैसी भाषाओं की भी है । संगीत की पुरानी बंदिशें आज भी अत्यधिक लोकप्रिय हैं । हमारी संगीत परंपरा एक है, उसी तरह हमारी भाषायी परंपरा एक है । हिंदी उर्दू का अलगाव अस्थायी है । मान लीजिए हिंदी प्रदेश में हिंदी-उर्दू जैसा भेद ना होता, तो सांप्रदायिक भेदभाव को खत्म करने में कितनी सहायता मिलती, सारे देश की श्रमिक जनता को संगठित करना कितना ज्यादा आसान होता । अपने लिए और देश के लिए हमें हिंदी-उर्दू का अलगाव सचेत प्रयास द्वारा खत्म करना चाहिए । वर्तमान व्यवस्था को बदलने के लिए हिंदी प्रदेश के किसान मजदूर जहाँ एक बार गतिशील हुए, वहाँ का भाषाई मानचित्र बदले बिना न रहेगा और उसका प्रभाव संपूर्ण देश की सामाजिक सांस्कृतिक स्थिति पर पड़ेगा । इसके लिए हिंदी जाति के विकास, उसकी भाषा और साहित्य की परंपराओं जनपद और जाति के संबंध, जाति और राष्ट्र के संबंध भारतीय चिंतन और मार्क्सवाद के संबंध को समझना जरूरी है । अंग्रेजों ने यहाँ अपना राज कायम करके समाज का पुराना ढ़ाँचा तोड़ा, देश का उद्योगीकरण किया, ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा दी, साहित्य और संस्कृति में आधुनिक युग का सूत्रपात किया । अंग्रेजी राज की इस प्रगतिशील परंपरा को ‘मार्क्सवाद’ बढ़ा रहा है । हिंदी जाति संख्या में भारत की सबसे बड़ी जाति है । यहाँ जो कुछ भला बुरा होता है, उसका प्रभाव हिंदी प्रदेश तक सीमित नहीं रहता, सारे देश पर पड़ता है । यहाँ की जनता के संगठित अभियान के बिना देश की वर्तमान व्यवस्था को बदलना असंभव है । आज सही दिशा में साहित्य के विकास को प्रेरित किए जाने की आवश्यकता है । यह स्पष्ट हो चला है कि राजनीति में पूँजीवादी नेतृत्व का देश को वर्तमान संकट से उबार नहीं सकता । वैचारिक दृष्टि से सुदृढ़ता और व्यवस्था को बदलने के लिए अटूट मनोबल का परिचय जब तक नहीं देंगे तब तक अनुकूल परिस्थितियाँ होने पर भी व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होगा । राजनीति और साहित्य दोनों के लिए भाषा महत्वपूर्ण है । अष्टम अनुसूची में शामिल भारतीय भाषाओं की सूची में प्रमुख भाषा मैथिली अन्य भारतीय भाषाओं के अनुवाद एवं विलुप्तप्राय संस्कृति के संरक्षण, संवर्द्धन में तेजी के साथ आगे कदम बढा रही है । साहित्य अकादमी द्वारा अनेक पुस्तकें (संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्द्धन पर) प्रकाशित की गई हैं । भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर द्वारा भारतीय भाषाओं के संरक्षण हेतु साहित्यिक पत्रिकाओं को प्रोत्साहित किया जा रहा है । आज आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी के मूल स्वरूप के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओं की छौंक भी लगाई जाए जिससे भाषा का सम्मान के साथ-साथ साहित्य का अलग-जायका प्रस्तुत हो सके । दिल्ली पुस्तक मेला में लेखिका आशारानी लाल की लोकगीत पुस्तक “आ लौट चलें” में हिंदी के साथ-साथ भोजपुरी शब्दों का प्रयोग एक नया आयाम प्रदान करता है । राष्ट्रभाषा के साथ मातृभाषा के प्रयोग से मातृभाषा का ही नहीं राष्ट्रभाषा का सम्मान भी बढ़ेगा । इस मूल तथ्य को चुनौती के रूप में स्वीकार करने की जरूरत है । देखना यह है कि आने वाले समय में साहित्यिक पत्रिकाएँ इस चुनौती को कितना स्वीकार कर पाने में सक्षम हैं ।

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