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“सन्तानों को शालीन बनाती श्रुति-शाला"

शाला ही व्यक्‍ति को शालीन बनाती है । शाला वह स्थान या घर जहाँ मात्र एक दम्पति ही नहीं भरा पूरा परिवार रहता है । दादा-दादी, माता-पिता, पति-पत्‍नी, भाई-बहिन, पुत्र-पुत्री तथा शिशुओं से भरे पूरे आवास को ही शाला कहते हैं । आज याद आ रहा है कि अपने बाल्यकाल में मैं निज ग्राम के एक पण्डित जी के घर गाय का दूध लेने जाता था । घर-द्वार आंगन एक दम स्वच्छ गोमय से लिपा-पुता चमकता हुआ मिलता था । पण्डिता माता मुझे दूध तो बाद में देती थीं, पहले गोद में बैठाकर लाड़-दुलार करती थीं, और प्रौढ़ पण्डित जी भी सिर पर प्यार का हाथ फिराने लगते थे । तब मैं जो नहीं सोच सकता था, वह अब सोचता हूँ कि उनके कोई सन्तान न थी, और वे उसके लिए लालायित रहते होंगे, फलस्वरूप मुझे उन प्रौढ़ दम्पति का ललक भरा आशीर्वाद मिलता रहता था । प्रपितामह से प्रपौत्र तक की पीढ़ियों से परिपूर्ण प्रजाओं के परिवेश में बालकों को सहज स्वाभाविक ढंग से वे सब शिक्षायें प्राप्त होने लगीं थीं, जिनकी उन्हें आवश्यकता घर से बाहर के विस्तृत समाज में आगे पड़ेगी । शाला के दो अक्षर इसकी उपयोगिता को परिभाषित करते हैं शा+ला वह स्थान गृह या भवन जहाँ हमें मिले शा=शान्ति+ला=लाजा की चार दीवारी । व्यक्‍ति सांसारिक व्यवहारों से थकामादा जहाँ लौटे तो उसका मन शान्ति का अनुभव करे, और सारे वस्त्राभूषण निकाल कर हल्का-फुल्का होकर सुरक्षित हो जाये और कोई भी ढोंग-आडंबर न चाहते हुए सुख व अपनत्व के आनन्द सार में सराबोर हो सके । नैतिकता की सावधानी बरतने से ही कोई भी आवा शान्ति का स्रोत और लाज-प्रतिष्ठा से ओत-प्रोत बना रह सकता है । ऐसी शाला में रहने वाले व्यक्‍ति ही शालीन कहलाते हैं, जो शान्त, विनीत, सौम्य, लज्जालु व प्रतिष्ठित होते हैं । फिर तो शाला कैसी होनी चाहिए, क्या वैसी ही जैसी पूंजीपति, उच्च प्रशासक, राजनेता, अभिनेता व खिलाड़ी आजकल शानदार महलों के स्वामी बन रहे हैं । भारत वंशी स्पात सम्राट (स्टीलकिंग) लक्ष्मी मित्तल ने लन्दन के सबसे महंगे भाग केनसिंगटन में स्वयं व अपने बेटे के लिए कई विशाल बंगले का स्वामित्व प्राप्त किया है । रिलायंस उद्योग के मुखिया मुकेश अंबानी के मुम्बई में निर्मित हो रहे बंगला अंतिलिया की चर्चा से तो अखबार भरे पड़े हैं, तरणताल तो साधारण बात है, उसमें हैलीपैड भी होगा, जहाँ तीन-तीन हेलीकॉप्टर उतर सकें । यहाँ पर ऐसी विशाल शालाओं का विस्तार पूर्वक वर्णन अभिप्रेत नहीं है । अथर्ववेद के नवम्‌ काण्ड के तृतीय सूक्‍त के इकत्तीस मन्त्रों में शालाओं की विशिष्टियों का प्रचुर मात्रा में वर्णन किया गया है । महर्षि दयानन्द सरस्वती ने गृह-प्रवेश संस्कार में इस सूक्‍त के मन्त्रों का प्रयोग किया है । जहाँ मन्त्र सं० ७ में यज्ञस्थल, रसों, पत्‍नियों के कक्ष, बैठक, अतिथि देवों के कक्ष दिव्य शाला के प्रभाग बताये गये हैं, वहीं मन्त्र सं० २२ में द्विपक्षा से लेकर दशपक्षा शालाओं का चित्रण किया गया है । साथ ही घास फूस-बाँस व रस्सियों से सुदृढ़ शालाओं के निर्माण को भरपूर चर्चा की गयी है । अधिक नहीं एक ही मन्त्र प्रस्तुत करते हुए शाला की महती उपयोगिता का दिग्दर्शन करते हैं :मा नः पाशं प्रतिमुचो गुरुर्भारो लघुर्भव ।वधूमिव त्वा शाले यत्रकामं भरामसि ॥ अथर्व ९.३.२४ ॥अर्थात्‌ हे शिल्पी लोगों! हमारी शाला (अर्थात्‌ गृह) सुदृढ़ बनी रहे बन्धनों को कभी न छोड़े, जिसमें गुरुतम भारी भार लघुतम छोटा या हल्का हो जाये, ऐसी बनाओ उस शाला को वधू के समान तो हम स्वीकार करें ही, और जहाँ चाहें वहाँ इसे पहुँचा भी सकें । अनेक देशों पर अपनी परिस्थिति के अनुसार पहिये लगाकर आवास गृहों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने की व्यवस्था की जाती है । “गुरुर्भारो लघुर्भव" गुरुतम भारी भार को हल्का करने का उपाय यही है कि उसको गोल चक्रों (पहियों) पर चलाया जाये । अपने भारत में भवनों को स्थल-स्थल पर स्थानान्तरण की आवश्यकता नहीं पड़ती है, फिर भी वे चलते हैं दूर-दूर तक कीर्ति चक्रों पर सवार होकर पहुँच जाते हैं । बात राजा-महाराजाओं के महलों की ही नहीं उन सामान्य जनों के आवासों की भी है, जहाँ सामने से निकलने वाले सद्‍यात्रियों को दो क्षण विश्राम व जलपान करने की सुविधा मिल जाती है । उन घरों व घरों के कारण ग्राम का नाम दूर-दूर तक पहुँच जाता है । जिस शाला या आवास के वासी वेदमन्त्र के जिन चार चक्रों पर अपनी शाला को चलाना सीख जाते हैं वे “श्रमेण तपसा सृष्टा ब्रह्मणा वित्त ऋते श्रिताः" (अथर्व० १२.५,१) अर्थात्‌ परिश्रम, प्रतिकूलताओं का सामना करते हुए संकल्पारूढ़ रहना, वेदादि सत्शास्त्रों का ज्ञान और सात्विक कमाई ही वे पहिये हैं जो परिवार के भारी भार को हल्का-फुल्का बना देते हैं और नीतिकार का कथन सार्थक हो उठता है । “गुणो भूषयते रूपं शीलं भूषयते कुलम्‌ । सिद्धिर्भूषयते विद्यां, भोगो भूषयते धनम्‌ ॥" अर्थात्‌ गुण से ही रूप की शोभा है, शील होने पर ही कुल का अलंकरण है, सिद्धि प्राप्त होने पर ही विद्या की शोभा है और सदुपयोग होने पर ही धन की शोभा है । ऊपर हमने उन सुख्यात व्यक्‍तियों का नामोल्लेख किया है, जिनके पास ऐसे बहुमूल्य कोटि के बंगले पहले नहीं थे, जो उन्होंने अब प्राप्तकर लिये हैं । आजकल आपने नेपाल नरेश ज्ञानेन्द्र महाराज के समाचार भी पढ़े सुने होंगे, जिन्हें अपने पैतृक राज महल को छोड़ना पड़ा है । क्या आपको नहीं लगता कि इसका बीजारोपण तो कुछ वर्ष पूर्व उसी दिन हो गया था, जब अग्रज राजा वीरेन्द्र को सपरिवार मृत्यु की गोद में सुला दिया गया था । वर्तमान राजनीतिक कारण तब नहीं थे । ‘शाला’ शब्द जिन शा+ला की सन्धि से निर्मित बताया गया है- शा=‘शान्ता’, ला= ‘लाजा’ । व्यक्‍तियों के अवांछित आचरण ही इन शब्दों के अक्षरों को उलट-पुलट कर देते हैं, तो यही ‘शान्ता’ हो जाता है ‘तान्शा’ और ‘लाजा’ हो जाता है ‘जाला’ । घर के कण-कण में तान+शा [तनाव-टेंशन] का जाला छा जाता है । घर-आंगन से अधिक, ये दोनों व्यक्‍तियों के मन-मानस को अपनी जकड़ में ले लेते हैं, और व्यक्‍ति अपनी अकड़ में आकर सर्वनाश के कुपथ पर बढ़ जाता है । सम्पन्‍न सज्जन गौमय से लिपे पुते यज्ञ सुरभि से सुवासित पुष्पों से सज्जित कुटिया में पहुंचे । वहाँ बिछाई गई चटाई को छोड़कर बैठने के लिए आरामदायक कुर्सियों की खोज करने लगे । बोले ये कठोर तख्त नहीं मुझे तो गुदगुदे गद्देदार कुर्सी ही भाती है । कुटिया के महात्मा ने कहा, तब तो आप अपने साथ ले आते, ले कैसे आता! मैं तो यात्रा पर हूं । अरे भई यात्रा पर तो मैं भी हूं । सोने की लंका के राजा रावण के यहाँ एक ऋषिवर भ्रमण करते हुए पहुंच गये । रावण ने स्वागतोपरान्त अपने वैभव का दृश्यावलोकन ऋषि को कराया । अग्नि, पृथ्वी, जल, वायु, आकाश आदि की वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं व ऐश्‍वर्य का दिग्दर्शन कराके, रावण ने ऋषि की प्रतिक्रिया जानने की अभिलाषा प्रकट की । ऋषि बोले-रावण ! मुझे तुम्हारी यह स्वर्णमयी लङ्का भयंकर आग से जलती दिखाई दे रही है; क्योंकि इसमें भोग-विलास की तो बहुत सारी प्रयोगशालायें हैं, परन्तु चरित्र निर्माण की कोई प्रयोगशाला नहीं है । वैदिक संस्कृति में जन्म लेने वाले शिशु को कमोत्तर एक शाला से दूसरी शाला गोद लेती चली जाती है । गृहशाला में उसका जन्म हुआ, गोशाला के दुग्ध से पोषण हुआ, यज्ञ शाला से संस्कारित हुआ, पाठशाला में उसने विद्या ग्रहण की, दीक्षान्त के बाद नववधू के साथ उसने अपनी परिवार शाला में एक से दो होकर प्रवेश किया, परिवार की प्रयोगशाला के पूर्वाभ्यास को उसने पूर्ण प्रयास के साथ संसार शाला में अभिनीत कर दिया । श्रुतिमां की शाला का उजियाला, उसने जीवन में ऐसा ढाला कि वह उत्पन्‍न अभिनव सन्तान आज है मानव महान ।
- देव नारायण भारद्वाज ,‘वरेण्यम्‌’ अवन्तिका-१ रामघाट मार्ग, अलीगढ़ (उ.प्र.)

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