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कफन की वैकुंठ-यात्रा

‘कफन’ प्रेमचंद की ही नहीं, हिंदी-उर्दू की ही नहीं- विश्‍व की श्रेष्ठ कहानियों में से है । यह कहानी इतनी विशिष्ट क्यों है? मानवीय संवेदना की अभिव्यक्‍ति की दृष्टि से ‘कफन’ अप्रतिम है । ‘कफन’ में इंसानी जिंदगी का जो चित्र अंकित किया गया है: वह क्रूर इंसानों का नहीं, निरीह-बेहद निरीह-इंसानों की विवशता का स्याह-बेहद्स्याह-चित्र है । समाज में घीसू और माधव जैसे इंसानों की उपस्थिति का कारण क्या है? जिंदगी जीकर, उन्होंने जिंदगी का अर्थ क्या जाना-समझा? इसके पीछे सामाजिक दुर्व्यवस्था, धोखाधड़ी का पर्याय अंधधार्मिक मान्यताएँ समाज का विषमतापूर्ण आर्थिक ढाँचा और राज्य के द्वारा मानवीय उपेक्षा है । कोई निठल्ला क्यों रहे, कोई आलसी क्यों बने, कोई भूखा क्यों रहे, इंसान के उपचार के प्रति समाज इतनी निर्मम तटस्थता क्यों बरते, जबकि मरते हुए पशुओं तक के प्रति मानवीय संवेदना जागती है? इंसानी दुनिया में शराब का खुलेआम इतने धड़ल्ले से व्यापार क्यों, जबकि सर्वविदित है कि शराब-सेवन सोचने-विचारने की शक्‍ति को निष्क्रिय कर देता है इत्यादि अनेक प्रश्न ‘कफन’ की मुत्यु-गाथा को पढ़ने से सहज ही उठते हैं ।
‘कफन’ के पात्र नाम-भर के चमार हैं । वे चर्म-कर्म नहीं करते । वस्तुतः ‘कफन’ के पात्र गरीब- अत्यधिक गरीब, सही अर्थों में सर्वहारा हैं( भले ही जागरूक न हों) गरीबी आदमी को कितना गिरा देती है, गरीबी आदमी को कितना निरीह-विवश बना देती है, यह ‘कफन’ के पात्र मरकर/जीकर बड़े प्रभावी ढंग से समाज को बताते हैं । घीसू और माधव की मनोवृत्ति जन्म से ही बननी शुरू होती है । अपने अतीत और वर्तमान में उन्हें जब कोई अंतर दिखाई नहीं देता, तो भविष्य के प्रति भी उनका दृष्टिकोण यथावत्‌ बना रहे तो आश्‍चर्य क्या ! वे न बदल सकते हैं, न सुधर सकते हैं ।
साठ-वर्षीय घीसू (घिसुआ) माधव का बाप है । विधुर है । कर्ज से लदा हुआ है । दीन है । आलसी है । लकड़ियाँ तोड़-बेचकर स्वयं को और अपने परिवार को बमुश्किल जिला पा रहा है । अन्यथा उसकी और उसके बेटे की प्रमुख वृत्ति आकाश-वृत्ति है- दूसरों के खेत से मटर, आलू, ऊख चुराकर पेट भरना । माधव भी अपने पिता के पदचिह्‌नों पर चलता है । पिछले साल ही उसका बुधिया से विवाह हुआ है । कामचोर है । विवाह के बाद और भी आरामतलब हो गया ।
जवान बुधिया प्रसव-वेदना से तड़पती-पछाड़ खाती बताई गई है । जाड़ों की रात है । घीसू के मत से वह ‘चुड़ैल के फिसाद’ का शिकार है । एक साल तक बुधिया ने ‘इन दोनों बे-गैरतों का दोजख’ भरा । ‘इस खानदान में व्यवस्था की नींव डाली । ’ सुबह बुधिया मर जाती है । उसके पेट का बच्चा भी मर गया था । बुधिया की मुत्यु के बाद समाज के आर्थिक-धार्मिक परिदृश्य सामने आते हैं । अवलोकन करें, -
(१) जिस समाज में रात-दिन मेहनत करनेवालों की हालत उनकी हालत से बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुकाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलता से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज्यादा संपन्‍न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी । उसे (घीसू को) यह तस्कीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है त कम-से-कम उसे किसानों की-सी-जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फायदा तो नहीं उठाते । ’
(२) घीसू बोला, - ‘कफन लगाने से क्या मिलता ? आखिर जल ही तो जाता । कुछ बहू के साथ तो न जाता । ’
माधव आसमान की तरफ देखकर बोला, मानो देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो,- ‘दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बाँभनों को हजारों रूपए क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं । ’
(३) ‘तू कैसे जानता है कि उसे कफन नहीं मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूँ? उसको कफन मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा । घीसू गरम होकर बोला, - मैं कहता हूँ उसे कफन मिलेगा, तू क्यों नहीं? वही देंगे, जिन्होंने अबकी दिया । हाँ, अबकी रूपए हमारे हाथ न आएँगे । ’
(४) घीसू ने कहा, - ‘ले जा खूब खा और आशीर्वाद दे ! जिसकी कमाई है, वह तो मर गई । मगर तेरा आशीर्वाद उसे जरूर पहुँचेगा । रोयें-रोयें से आशीर्वाद दो, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं’ ।
माधव ने फिर आसमान की तरफ देखकर कहा,- ‘वह बैकुंठ में जाएगी दादा, बैकुंठ की रानी बनेगी । ’
घीसू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला,- ‘हाँ, बेटा बैकुंठ में जाएगी । किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं । मरते-मरते हमारी जिंदगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गई । वह न बैकुंठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो गरीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, औत अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं । ’
घीसू और माधव दोनों पात्र प्रेमचंद की सृष्टि हैं, लेकिन इन दोनों पात्रों का चयन प्रेमचंद ने समाज से ही किया है । प्रेमचंद घीसू और माधव की मानसिकता जीकर ही न पात्रों के कार्य और वार्तालाप निश्‍चित करते हैं । वास्तव में, घीसू और माधव के मुख से प्रेमचंद ही बोलते हैं अन्यथा घीसू और माधव-जैसे शराबी और अज्ञानी इतने सटीक और सार्थक संवाद कभी बोल ही नहीं सकते । माना कि उनकी भावना को ही लेखक-प्रेमचंद-ने वाणी दी है । सिद्धहस्त लेखक ही अपने पात्रों को जीवत्‌ बनाने के लिए सुविचारित संवादों की रचना करते हैं । इसी प्रकार, घीसू और माधव के गरम-गरम आलू छीलकर खाते समय के चित्र में, दोनों की मानसिकता विनोदपूर्ण इतनी नहीं, जितनी कि हदय-विदारक है । आलू खाते रहने का लोभ दोनों को है । पृष्ठभूमि में दम तोड़ती हुई बुधिया है । इस परिप्रेक्ष्य में घीसू और माधव के बहाने और उनके कथन हास्य की सृष्टि नहीं करते . वातावरण को करूण बना देते हैं । दोनों की चालाकियाँ उनकी तीव्र भूख को जाहिर करती हैं । दोनों एक-दूसरे के लिए थोड़ा भी आलू-त्याग करने को तैयार नहीं । दोनों के लिए आलुओं का खाद्‌अय इस समय भगवान्‌ है, बहू/पत्‍नी की असह्‌य पीड़ा उपेक्षणीय और नगण्य । यह सब तभी संभव हुआ जब लेखक-प्रेमचंद-स्वयं घीसू और माधव बने ।
धार्मिक भावनाओं को लेकर भी ‘कफन’ में चुभते हुए व्यंग्य हैं । फटे चीथड़े पहननेवालों को मरण के पश्‍चात्‌ नए कपड़े का कफन ओढ़ाना, नंगोभूखों के लिए बैकुंठ की कल्पना करना, मृतक का माया-जाल से, जंजाल से मुक्‍त होना आदि पक्ष कितने खोखले नजर आते हैं, यह ‘कफन’ की कलात्मक बुनावट के फलस्वरूप ही है । प्रेमचंद ने प्रसंग के गांभीर्य को पूरा-पूरा महत्व दिया है । कोई भी अनावश्यक और असंबद्ध टिप्पणी नहीं की है ।
‘कफन’ कोई शराबबंदी पर लिखी हुई कहानी नहीं है, यद्‌यपि उसका माहौल प्रमुख रूप से शराब से सराबोर है । पाठक यह अनुभव करते हैं कि यदि घीसू-माधव क्रिया-कर्म के लिए एकत्र किए गए पाँच रूपए शराब में बर्बाद नहीं करते तो स्थिति इतनी खराब नहीं होती । काश, घीसू-माधव पियक्‍कड़ न होते ! शराबी शराब की गंध सूँघते ही अपना ईमान खो देता है । यह उसकी मजबूरी है । माना ऐसा सोचना अपनी जगह सही है, किंतु यह भी सही है कि घीसू-माधव को शराबी चित्रित करना युक्‍तियुक्‍त है । इसमें भी दो मत नहीं, शराब के नशे में अभिव्यक्‍त घीसू-माधव के उद्‌गारों को जो प्रभविष्णुता मिली है, वह सामान्य सचेत कथन में मिलना संभव नहीं थी ।
निस्संदेह, प्रेमचंद का अनुभव-संसार बड़ा व्यापक था । अपने पात्रों की मानसिकता वे बखूबी जानते थे । ‘कफन’ कहानी का परिवेश, जीवन और चिंतन विशुद्ध भारतीय है । भले ही प्रेमचंद ने ‘कफन-जैसी और कहानियाँ नहीं लिखी, किंतु उसपर विश्‍व की किसी भी कहानी की छाप नहीं है । वह स्वतःस्फूर्त और पूर्णतया मौलिक है । उसके एक-एक शब्द में प्रेमचंद का व्यक्‍तित्व समाहित है । पद्दलित, तिरस्कृत-उपेक्षित एवं बुभुक्षित मानवता के प्रति प्रेमचंद की सहानुभूति ने बुधिया की मुत्यु को और भी अधिक जीवत्‌ बना दिया है । ‘कफन’ अपने कथ्य और शिल्प में अद्वितीय है ।

- डॉक्टर महेंद्र भटनागर ,110 बलवंतनगर, गाँधी रोड ,ग्वालियर(मध्य-प्रदेश)







































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