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अंतरराष्ट्रीय व्यापार विधि एवं सीमापार निवेश के विधिक पहलू’

अंतरराष्ट्रीय विधि एसोसिएशन एक ऐसा निकाय है जिसका गठन अंतरराष्ट्रीय विधि के अध्ययन, विकास, समझ और सम्मान के लिए किया गया है । भारत में सम्मेलन का आयोजन किया जाना अंतरराष्ट्रीय विधि एसोसिएशन की भारतीय शाखा के अंतरराष्ट्रीय विधिशास्त्र में दिए योगदान के महत्व को प्रदर्शित करता है ।
मैं आयोजकों को बधाई देती हूँ जिन्होंने सम्मेलन के विषय के रूप में अंतरराष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश से जुड़े विभिन्‍न पक्षों से संबंधित मुद्दे वर्तमान में काफी प्रासंगिक और रूचिकर हैं । सब-प्राइम संकट के कारण, पिछले वर्ष विकसित देशों की कई प्रतिष्ठित कंपनियाँ दिवालिया हो गई जिससे वैश्‍विक मंदी उत्पन्‍न हो गई । पिछले कुछ दशकों के दौरान वस्तुओं, सेवाओं और पूंजी के अत्यधिक सीमापार आवाजाही से विश्‍व में भारी बदलाव आया था प्रौद्योगिक प्रगति से सम्पर्क सहज और तेज गति से होना शुरू हुआ । इस तरह वैश्‍विक अर्थव्यवस्था ऐसी आर्थिक मंदी की चपेट में आई जो १९३०. के दशक के बाद पहली बार आई और इसका प्रभाव तुरंत हर तरफ फैल गया । वास्तव में, इस वैश्‍विक और लगातार एकीकृत हो रहे विश्‍व में कोई भी देश इस वित्तीय संकट के दुष्प्रभावों से सुरक्षित नहीं था ।
इस आर्थिक मंदी के साथ तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और खाद्य पदार्थों की ऊँची कीमतों का दौर शुरू हुआ । विकासशील देशों में विकास के कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा और बढ़ती गरीबी और भुखमरी की स्थिति और भी गंभीर हो गई । इससे खाद्य सुरक्षा सहित विकास के मुद्दों पर निरंतर ध्यान केंद्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय की आवश्यकता महसूस की गई ।
इन वित्तीय संकटों से आपात स्थिति से निपटने, मध्य, एवं दीर्घकालीन नीतिगत उपाय तैयार करने तथा विश्‍व अर्थव्यवस्था को अधिक स्थिर, अधिक समतापूर्ण और अधिक जिम्मेदार बनाने के लिए तुरंत मिलकर विश्‍व प्रयास करने की आवश्यकता पैदा हो गई । इस संकट से निपटने के लिए अनेक देशों ने वित्तीय व मौद्रिक उपाय किए । समूह-२० तंत्र ने राजनैतिक स्तर पर चर्चा के लिए एक मंच प्रदान किया । इन हस्तक्षेपों से एक संकट को फैलने से रोकने में मदद मिली और अर्थव्यवस्था में उत्थान के संकेत दिखाई दिए । लेकिन मध्यम एवं दीर्घकालिक ठोस वित्तीय प्रणाली के लिए विभिन्‍न क्षेत्रों, विशेष रूप से १. वैश्‍विक वित्तीय रूपरेखा तैयार करने, २. वित्तीय नियमन और निगरानी नियम, ३. व्यवस्थित जोखिम के मूल्यांकन के लिए बेहतर तरीका, ४ विकास के परिप्रेक्ष्य में व्यापार और निवेश पर विचार करने के लिए नई सोच और प्रयासों की जरूरत है । व्यापक स्तर पर यह मान्यता है कि वैश्‍विक प्रगति को कायम रखने के लिए विश्‍व व्यापार और निवेश को पुनः सशक्‍त बनाना जरूरी है ।
संकट के बाद की विश्‍व वित्तीय स्वरूप की विशेषताएं दूसरे विश्‍व युद्ध के बाद जैसी नहीं होंगी । आपस में जुड़े हुए विश्‍व में, वित्तीय नियंत्रण, बैंकिंग कार्यों, क्रेडिट एजेंसियों का श्रेणी निर्धारण और निगरानी के वैश्‍विक नियम और मापदण्ड अधिक स्पष्ट और बड़े सख्त होने चाहिए । इन मुद्दों से संबंधित राष्ट्रीय नीतियों के सामंजस्य तथा अधिक संगतता के लिए जहां तक आवश्यक और संभव हो, देशों के बीच और ज्यादा व्यवस्थित सहयोग और सूचना के आदान-प्रदान की जरूरत पड़ेगी । नए वित्तीय स्थिरता बोर्ड को सभी व्यवस्थित महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थाओं, माध्यमों और बाजार पर नियंत्रण व निगरानी बढ़ाने का निर्देश दिया गया है । लेकिन इसके साथ-साथ बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार किया जाना चाहिए जिससे वे अलग-अलग हितों का ज्यादा प्रतिनिधित्व कर सकें और सामयिक सच्चाईयों को प्रतिबिम्बित कर सकें ताकि ये संस्थाएं अधिक प्रभावी बन सकें । मेरा मानना है कि सुधरे हुए विश्‍व वित्तीय स्थिति की जटिलताओं पर ध्यान देने के साथ-साथ गरीबी और भूख में कमी और सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों की प्राप्ति विश्‍व का प्रमुख उद्देश्य बना रहना चाहिए ।
विश्‍व व्यापार कम होने से सामाजिक और आर्थिक आशय पैदा हुए हैं और अमीर व गरीब राष्ट्र अलग-अलग तरह प्रभावित हुए हैं । इस परिदृश्य में, ‘विकास आयाम’ पर केन्द्रित दोहा व्यापार बातचीत के दौरे को आगे बढ़ाना जरूरी है । कुछ देशों की संरक्षवाद की बढ़ती प्रवृत्ति से स्थिरता प्रक्रिया धीमी हो जाएगी । यह याद रखना चाहिए कि जिस प्रकार के वातारण में विकसित देशों ने प्रगति की है वह विकासशील देशों के लिए मुश्किल है और उनसे अपने लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए । विकासशील देशों को व्यापार और विकास नीति सांचे में बहुत सारी प्रतिबद्धताओं को संभालना और संतुलित करना होता है । इसलिए विश्‍व कार्यसूची में विकासशील देशों की अपने लोगों के कल्याण के बारे में चिंताओं को शामिल करना चाहिए ।
मंदी का प्रकोप कम होता प्रतीत हो रहा है । कंपनियां नए व्यापार अवसरों की तलाश कर रही हैं इसके अलावा, हमारे लिए खुशी की बात यह है कि भारत में औद्योगिक उत्पादन बढ़ रहा है । विश्‍व की चौथी विशाल और मुश्किल समय में विकास कायम रखने वाली अर्थव्यवस्था के रूप में भारत, विश्‍व अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण उत्प्रेरक है । भारत निवेश स्थान के मामले में मजबूत आधार-स्तंभों पर टिका हुआ है । इसके पास विशाल बाजार है, कुशल जनशक्‍ति, स्वतंत्र न्यायपालिका तथा एक व्यापक कानूनी और आर्थिक मूलभूत ढांचा है । इसी प्रकार, भारतीय कंपनियां या तो विलय और अधिग्रहण या सीधे निवेश के जरिए विदेशों में निवेश कर रही हैं । इसलिए, यह स्वाभाविक है कि एक देश जो निवेश प्राप्त कर रहा है और विदेशों में निवेश कर रहा है, उसकी वित्तीय नियंत्रण, विभिन्‍न प्रकार के जोखिमों का आकलन और पूंजी मात्रा की व्यवस्थित निगरानी मे मुद्दों में गहरी दिलचस्पी है । हमारा जिन देशों के साथ व्यापार और निवेश संबंध है, उनके यहां मौजूद विधिक ढांचों में भी हमे
ं रूचि है ।
व्यावसायिक उद्यमों के कानूनी ढ़ांचे अनुमानित होने चाहिए और ये इस प्रकार बनाए जाने चाहिए कि ये सुचारू रूप से कार्य कर सकें । निवेश आकर्षित करने, उत्पादन को बढ़ावा देने और प्रौद्योगिक संवर्धन को सहयोग देने के लिए विधान और नीतियों को प्रगतिशील व पारदर्शी होना चाहिए । इसी प्रकार कार्पोरेट प्रतिष्ठानों, चाहे वे राष्ट्र में या राष्ट्र के बाहर और महाद्वीपों में काम करते हों, की जिम्मेदारी और जवाबदेही पर बल भी उतना ही जरूरी है । निजी क्षेत्र की यह जिम्मेदारी है कि वह संचालन मुद्दों पर ध्यान देकर और जोखिम प्रबंधन सुधार कर एक विश्‍वास का माहौल तैयार करें । लापरवाह व्यवहार तथा अत्यधिक जोखिम का मतलब होगा कि संकट से कोई सबक नहीं सीखा गया है । ऐसे नजरिए अब स्वीकार्य नहीं हो सकते । इसलिए, व्यवसायियों द्वारा नियमों का पालन करना चाहिए तथा सामाजिक-आर्थिक लक्ष्यों को बढ़ावा देने के प्रति अपना निष्ठाभाव दर्शाना चाहिए ।
-GOPAL PRASAD
विश्‍व व्यापार संगठन नियमों, बौद्धिक सम्पत्ति अधिकारों, क्षेत्रीय व्यापार समझौतें और अधिमान प्राप्त व्यापार समझौतों विवाद समाधान और विवाचन तंत्रों जैसे जटिल मुद्दों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय व्यापार निवेश के कानूनी पहलू चुनौतीपूर्ण हैं । घरेलू कानून बनाने, नियम तैयार करने और उनके कार्यान्वयन में सभी भागीदारों का योगदान आवश्यक है । अंतरराष्ट्रीय दायित्वों को ध्यान में रखा जाना चाहिए । राष्ट्रीय स्तर पर, सरकार, व्यवसायिकों, वकीलों, अर्थशास्त्रियों के बीच संवाद प्रक्रिया नीति निर्माण और कार्यान्वयन के लिए बहुत उपयोगी है । मुझे खुशी है कि इस सम्मेलन में भारत की कार्यपालिका, विधानपालिका और न्यायपालिका के प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं ।
विधि समुदाय प्रारम्भिक विचार-विमर्श से लेकर विवाद समाधान की कारोबार प्रकिया के प्रत्येक स्तर का हिस्सा है । इस प्रयास में ज्ञान पूंजी एक प्रमुख चुनौती है । भारत को ऐसे वकीलों, अर्द्ध विधिकों और पेशेवरों की क्षमता बढ़ानी चाहिए जो अंतरराष्ट्रीय व्यापार व निवेश कानूनों के जानकार हों और जो उनकी जटिलताओं को सुलझा सकें । इसी प्रकार, हमारे अकादमिकों और विधि शौक्षिक संस्थानों को विश्‍व व्यापार माहौल के साथ गति बनाकर चलना चाहिए और उन्हें इसे संवारने में भी मदद करनी चाहिए । सम्मेलन में विभिन्‍न पसंद और विकल्पों पर विचार-विमर्श किया जाएगा । इसलिए यह भली-भांति याद रखना चाहिए कि इसका प्रमुख उद्देश्य समतामूलक विश्‍व को बढ़ावा देना, अधिक नियंत्रित आर्थिक कार्य करना तथा बेहतर निगरानी के लिए प्रणालियों की स्थापना करना है ताकि भविष्य में दुनिया को अस्थिर करने वाला कोई भी संकट पैदा न हो सके ।
इस सम्मेलन में विश्‍व व्यापार संगठन वार्ताओं, क्षेत्रीय और द्विपक्षीय व्यापार समझौतों, निवेश सुरक्षा संधियों, एशिया प्रशांत सहयोग, विवाद समाधान तथा वर्तमान आर्थिक व विधिक परिस्थितियों से संबंधित दूसरे मुद्दों पर ध्यान दिया जाएगा तथा विश्‍व व्यापार व निवेश व्यवस्था को चुनौती देने वाले कानूनी मुद्दों पर नई रोशनी डाली जाएगी और नए विचार पेश किए जाएंगे ।

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