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मीडिया की निगरानी

पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि स्वतंत्रता के दुरूपयोग के तमाम खतरों के बावजूद मैं दमित और नियंत्रित प्रेस के बजाय एक स्वतंत्र प्रेस का पक्षधर हूं । भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के इस विनम्र रुख के विपरीत कांग्रेसनीत केंद्रीय सरकार इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को नियंत्रित करने के लिए कदम उठाने जा रही है । विभिन्‍न पक्षों से सलाह-मशविरा जारी है, जिनमें नागरिक संगठनों के अलावा उद्योग जगत भी शामिल है । सरकार इस कदम का औचित्य सिद्ध करते हुए दलील देती है कि प्रसारण सेवा के नियामक के गठन और आचार संहिता लागू करने का कारण पिछले कुछ वर्षों के दौरान विभिन्‍न संसदीय समितियों की रपटों, अदालत के फैसलों, राज्य सरकारों के अनुरोध और नागरिक संगठनों की राय है । उदारवादी लोकतांत्रिक व्यवहार से विमुख दिखाई देने से बचने के लिए सरकार ने प्रसारण सेवा के नियमन संबंधी विधेयक के मसौदे में प्रसारण नियमन प्राधिकरण (बीआरएआई) के गठन का प्रस्ताव किया है । प्रस्तावित विधेयक के अनुसार प्राधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों का चुनाव एक समिति की अनुशंसा के आधार पर केंद्र सरकार करेगी । इस समिति में राज्यसभा के अध्यक्ष, लोकसभा के स्पीकर और विपक्ष के नेता शामिल होंगे । अब सवाल उठता है कि बीआरएआई पर किसका नियंत्रण होगा? इसके अध्यक्ष और सदस्य सरकार द्वारा चुने हुए होंगे ।
जाहिर है, ये सभी राजनीतिक वर्ग से होंगे । यह एक ऐसा वर्ग है, जिसकी जनता के बीच साख मीडिया से बेहतर नहीं है । विधेयक के अनुसार केंद्र सरकार ऐसे किसी भी सदस्य या अध्यक्ष को पद से हटा सकती है या बर्खास्त कर सकती है जो जनहित के खिलाफ अपने पद का दुरूपयोग करता हो । पूरे मसौदे से यह आभास होता है कि देश में केवल सरकार ही जनहित की चिंतक है और राजनेता इसके मूल्यों के प्रति समर्पित हैं । एक स्वतंत्र नियामक के प्रावधानों के तहत नौकरशाही को यह सुनिश्‍चित करने का दायित्व सौंपा गया है कि वह भटके हुए और दोषी ब्राडकास्टिंग मीडिया को दंडित करे । प्रस्तावित विधेयक के अनुच्छेद २५ के तहत जिलों में पुलिस अधीक्षकों और उप जिलाधिकारियों को यह अधिकार दिया गया है कि वे निगरानी, तलाशी कर सकें, उपकरण जब्त कर सकें और संबंधित लाइसेंसिंग प्राधिकरण की लिखित शिकायत पर मीडियाकर्मियों पर मुकदमा चला सकें ।
विधेयक की प्रस्तावना में लिखा है- “एयरवेव सार्वजनिक संपत्ति होती है और राष्ट्रीय व जनहित में इन्हें नियंत्रित रखना जरूरी है, खासतौर से उपयुक्‍त विषयवस्तु के प्रसार को सुनिश्‍चित करने के लिए । ” नीयत साफ है । सरकार तय करेगी कि देशहित और जनहित में क्या है? स्वतंत्र लोकतंत्र में यह अस्वीकार्य समीकरण है । अति उत्साहित सरकार मीडिया के पैरों में विचारों और मूल्यों की बेड़ी बांधकर उसे अपने अधीन करना चाहती है और इस प्रकार संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करना चाहती है । संविधान के अनुसार अभिव्यक्‍ति का अधिकार मौलिक अधिकार है, बशर्ते इससे एकता और अखंडता खतरे में न पड़ती हो तथा देश की सुरक्षा, अन्य देशों से संबंध, अदालत की अवमानना, नैतिकता व शालीनता पर आंच न आए । विडंबना यह है कि जनहित या राष्ट्रहित इसके दायरे में ही नहीं आते और इस प्रकार सरकार अभिव्यक्‍ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं कर सकती ।
संवैधानिक प्रावधानों में यह बारीक अंतर सरकार को समझना चाहिए । विधेयक के मसौदे के अनुसार, प्राधिकरण को चैनल के पंजीकरण से इनकार करने का अधिकार है, यदि वह इस निषकर्ष पर पहुंचता है कि चैनल की विषयवस्तु देश की एकता-अखंडता, सुरक्षा और शांति व सद्‌भाव के लिए खतरा बन सकती है तथा अन्य राष्ट्रों के साथ संबंध खराब कर सकती है । यह विचित्र है कि मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाले करीब एक दर्जन कानूनों के बावजूद सरकार खबरों पर नियंत्रण रखने के लिए नियामक बनाना चाहती है । १७८६ में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति थाम जेफरसन ने कहा था कि प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा किए बिना हमारी स्वतंत्रता कायम नहीं रह पाएगी, न ही प्रेस की स्वतंत्रता को गंवाने के खतरे के बिना इसे सीमित किया जा सकता है ।
- एनके सिंह

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