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समाज, सत्ता और स्कूल

स्कूलों का काम समाज में सुशासन की बुनियाद डालना है । पर दिल्ली स्कूलों को ‘राज’ रोग लग गया है । स्कूल ‘राज रोग’ समाज के लिए क्षय रोग बनकर समाज की बुनियाद खोखली कर रहे हैं । एक नए किस्म की असमानता और शोषण की बुनियाद रख रहे हैं । ब्लूलाइन की तरह ही अधिकतर स्कूल भी नेताओं की बेनामी संपत्ति हैं । इसलिए राजनीतिक समीकरण के हिसाब से स्कूल प्रबंधन का गठन भी बदलता रहता है । निजी स्कूल सस्ती दरों पर सरकारी जमीन लेने और डोनेशन की मोटी रकम वसूलने के लिए हर जुगाड़ इस्तेमाल करते हैं । सस्ती जमीन देने के पीछे कुछ कारण भी होते हैं । उसके लिए इन्हें कुछ सामाजिक सरोकार भी निभाने होते हैं, इस बात से इन लोगों को कुछ लेना-देना नहीं । स्कूलों का आर्थिक साम्राज्य बेरोकटोक चलता रहे इसके लिए वे सत्‍ता से नजदीकी बनाए रखते हैं । ‘कोटा’ व कैश के जरिए नेता अधिकारी और विघ्नकारी सबको प्रसन्‍न रखा जाता है । चुनावी मौसम में भी स्कूल का हौसला इतना बुलंद है कि वे अभिभावकों को डरा धमका कर पिछले साल से ही एरियर वसूल कर रहे हैं । बकाया वसूली के लिए वे छात्रों का प्रवेश पत्र रोकने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं । चुनाव आयोग द्वारा पार्टियों को चंदा देने वालों की सूची स्कूलोंका मुखौटा उतारकर उनका राजनीतिक चेहरा दिखलाती है । स्कूल प्रबंधन राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने वालों में शामिल हैं । इसलिए दिल्ली में अब ऐसे मंजर देखने में आ रहे र्हैं जब स्कूल प्रबंधन ने अभिभावकों को पिटवाने तक में कोई संकोच नहीं दिखाया ।

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वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चों को एक परिपक्व इन्सान बनाना होता है, ताकि वो कल्पनाशील, वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और देश का भावी कर्णधार बन सकें, किन्तु भारतीय शिक्षा पद्धति अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त कर सकी है, कारण बहुत सारे हैं । सबसे पहला तो यही कि अंगूठाछाप लोग डिसा‌इड करते हैं कि बच्चों को क्या पढ़ना चाहिये, जो कुछ शिक्षाविद्‍ हैं वो अपने दायरे और विचारधारा‌ओं से बंधे हैं, और उनसे निकलने या कुछ नया सोचने से डरते हैं, ऊपर से राजनीतिज्ञों का अपना एजेन्डा होता है, कुल मिलाकर शिक्षा पद्धति की ऐसी तैसी करने के लिये सभी लोग चारों तरफ से आक्रमण कर रहे हैं, और ऊपर से तुर्रा ये कि ये सभी लोग समझते हैं कि सिर्फ वे ही शिक्षा का सही मार्गदर्शन कर रहे हैं, जबकि दर‌असल ये ही लोग उसकी मां बहन कर रहे हैं । मैं किसी एक पर दोषारोपण नहीं करना चाहता, शिक्षा पद्धति की रूपरेखा बनाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिये और सोचना चाहिये, कि क्या उसमें मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है। आज हम रट्टामार छात्र को पैदा कर रहे हैं, लेकिन वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और परिपक्व छात्र नहीं, क्या यही हमा…

राजनीति में भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार और राजनीति का एक गहरा संबंध है । जहां हम विकास की एक नई गाथा को रचने का सपना संजोए हुए हैं वहीं दुनिया के सामने हमारी गरीबी की सच्चाई को स्लमडॉग मिलेनियर जैसी फिल्मों के सहारे परोसा जा रहा है । आज हम भ्रष्टाचार के मामले में बंग्लादेश, श्रीलंका से भी आगे हैं ।
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एक आरटीआई एक्टिविस्ट के संघर्ष की कहानी, उसी की जुबानी

पिताजी गुरु भी थे। गरीबी, प्राइवेट ट्यूशन वगैरह करके आजीविका चलाते; परिवार चलाने के साथ-साथ सारे समाज, देश की चिंता उनका प्रमुख स्वभाव रहा। हमेशा दूसरों से कुछ अलग करने की चाह; सीमित संसाधनों में भी देश, समाज और मित्रों के लिए समय निकालना; शायद उनका यही स्वभाव मेरे मस्तिष्क में रच-बस गया, कार्यशैली का हिस्सा बन गया। छात्र जीवन बहुत फाकाकशी, गरीबी का रहा, लेकिन मेरे पिताजी ने अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया। हमारे मकान का धरन (कड़ी) लकड़ी का था, जो टूट गया था। उसी पर पूरे छत का लोड था। मकान कब गिर जाय, कुछ ठिकाना नहीं।प्लास्टिक के टेंट लगाकर रहते थे। कभी घर में चूल्हा भी नहीं जलता था। ऐसी ही परिस्थितियों में एक बार गुल्लक तोड़ा, तो पाँच रुपए निकले। उन्हीं से दो किलो चूड़ा लाया था। उसी को भिंगोकर, नमक-मिर्च लगाकर सपरिवार ग्रहण किया। अपनी शादी बिना तिलक-दहेज के की। दो बहनों की शादी आज से बीस साल पहले दिल्ली में मात्र सत्रह हजार की मामूली रकम में ही की। दोनों बहनों की शादी एक ही तिथि में किया। हमारे समाज (अखिल भारतीय खटिक समाज) के जो राष्ट्रीय पदाधिकारी थे, उन्होंने अपना मकान पंद्…