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चेतो नहीं तो तरसोगे एक-एक बूँद पानी को

सावन में बारिश की जगह चिलचिलाती धूप की गर्मी ने हमें पर्यावरण संरक्षण को नजर‍अंदाज करने पर होने वाले दुष्परिणाम की दस्तक दे दी है । हरियाली को खत्मकर धरती के सीने में कंक्रीट भरने के कारण जंगलों में पानी का स्तर लगातार नीचे जा रहा है । औद्योगिक क्षेत्रों ने रही सही कमी भी पूरी कर दी है । पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण नियंत्रण के नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं । एक कड़वी सच्चाई है कि जितना पानी धरती के नीचे बचा है, अधिकांश क्षेत्रों के जल के नमूने की जाँच करवानी चाहिए । यह औद्योगिक क्षेत्रों में बसने वाले नागरिकों के स्वास्थ्य से संबंधित गंभीर पक्ष है । प्रदूषित जल का सेवन किसी भी हालत में सेहत के लिए ठीक नहीं है । महानगरों में अधिकांश जगह नगर निगम या जल विभाग द्वारा आपूर्ति किए गए जल में गंदे और बदबूदार पानी की शिकायतें अब तो आम बात बन चुकी है । दिल्ली एनसीआर इलाके के गाजियाबाद में पिछले दस वर्षों में भूजल स्तर २० फीट तक नीचे जा चुका है । कुछ इलाकोंमें भूगर्भ जल स्तर २७ मीटर तक नीचे पहुँच चुका है जबकि सामान्य जल स्तर की गहराई पाँच से दस मीटर के बीच होनी चाहिए । भूगर्भ जल विभाग की रिपोर्ट में चेताया गया है कि अगर पानी बचाने और रिचार्ज करने के उपाय नहीं किए तो अगले कुछ वर्षों में ही गाजियाबाद की जमीन का पानी पूरी तरह सूख जाएगा । भूगर्भ जल विभाग की रिपोर्ट के अनुसार गाजियाबाद के अधिकांश क्षेत्रों में भूगर्भ जल स्तर सामान्य से काफी नीचे जा चुका है । विभाग ने ३१ स्थानों पर पानी के स्तर की जाँच कराई जिसमें १६ स्थानों पर १५ मीटर से नीचे और सात स्थानों पर २० से २८ मीटर नीचे जल स्तर पाया गया । २००८ से मई २००९ तक ३० स्थानों के जल स्तर में ०.२० मीटर से ढाई मीटर तक की गिरावट आई है । पानी सूखने का सिलसिला अनवरत रूप से जारी है । भूगर्भ जल विभाग के अधिशासी अभियंता ए. के. अरोड़ा ने बताया कि गाजियाबाद में पानी के प्रति जागरूकता की कमी के कारण इसकी बर्बादी बहुत अधिक हो रही है । इसके अतिरिक्‍त यहाँ निर्माण कार्य और उद्योगों में पानी की बड़ी मात्रा में इस्तेमाल होने के कारण भी जलस्तर में गिरावट आ रही है । उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यहाँ रिसाइकिलिंग तालाबों की खुदाई, नए नलकूपों के निर्माण पर रोक, रेनवाटर हार्वेस्टिंग और दूसरी रिचार्ज पद्धतियों को न अपनाया गया तो कुछ वर्षों में पीने का पानी जमीन में ढूँढे नहीं मिलेगा । इस बार दिल्ली सहित कई महानगरों में पानी के लिए त्राहिमाम की स्थिति बनी हुई थी । सूखे का खतरा ःपर्यावरण असंतुलन के कारण मानसून की चाल लड़खड़ा गई है । मानसून के बारे में तमाम पूर्वानुमान लगभग गलत ही साबित हुए हैं । इसके बावजूद मौसम वैज्ञानिकों का मानना है कि उनके पूर्वानुमान ८० प्रतिशत सही साबित हुए हैं । बारिश अब भी लगातार रूप से अपना जलवा नहीं दिखा पा रही हैं जिससे उत्तर भारत में सूखे की आशंका बलवती हो रही है । बारिश नहीं होने की स्थिति में खाद्यान्‍न उत्पादन में कोई कमी आती है तो उसकी भरपाई स्टॉक में जमा अनाज से की जा सकती है । देश में सूखे की स्थिति आ जाने पर उसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ना लाजिमी है । इतना तय है कि किसानों पर भी मुसीबतें आएंगी परन्तु खाद्यान्‍न संकट की आशंका प्रायः नहीं है । सूखे की स्थिति के मद्देनजर कीमत बढ़ना स्वाभाविक है । खाद्यान्‍न बाजार की सट्‌टेबाजी के कारण ही मुख्यतः कीमतें बढ़ती हैं । सरकार को अगर इसकी चिंता है तो वायदा बाजार पर रोक लगाने चाहिए जिसका सालाना टर्नओवर ५० लाख करोड़ से भी ज्यादा है जो हमारे कुल बजट से भी बड़ा है । इस पर अंकुश लगाए बिना कीमतों को काबू नहीं किया जा सकताहै । देश में आजादी के बाद सन्‌ १९८७ में सबसे भयंकर सूखा पड़ा था, तब भी भूख से निपट लिया गया था । उस वक्‍त देश में अनाज का मात्र २ करोड़ टन स्टॉक था । कृषि विशेषज्ञ देनेन्द्र शर्मा के अनुसार उत्पादन गिरने या सूखे की स्थिति में अर्थव्यवस्था पर तो असर पड़ेगा ही मगर असली चिंता किसानों की है । सरप्लस अनाज के वजह से भूख से तो निपटा जा सकेगा मगर औसतन २०१५ रूपए महीने कमाने वाले किसान परिवारों की आजीविका का क्या होगा? सरकार को इसकी ज्यादा चिंता करनी चाहिए । कहीं ऐसा न हो कि अनाज पैदा कर स्टॉक बढ़ाने वाले किसान दूसरों का पेट तो भर दें और खुद उनकी स्थिति दयनीय हो जाय । अभी अर्थव्यवस्था की चिंता करने से ज्यादा जरूरी इस बात पर सोचना है । संभावित हालात में किसानों की मदद करने के लिए अभी से इस दिशा में सोचना जरूरी है । पिछले दिनों आलू की अत्यधिक फसल होने की स्थिति में कई जगह किसानों को आलू फेंकने पड़े थे, क्योंकि सरकारी स्तर पर उसके रखरखाव की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी । बाढ़ आ जाने पर सरकारी मालगोदामों में खाद्यान्‍न बरबाद होने की घटना आम है । बाढ़ प्रभावित इलाकों को खाद्य विभाग के गोदामों को ऊँचे पर बनाने चाहिए । जिसकी आवश्यकता समझी ही नहीं जाती है । भारत जिसमें पश्‍चिमी उत्तरप्रदेश, पंजाब, हरियाणा आदि राज्य शामिल हैं, में ४४ प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई । हालात इसलिए खराब हुई क्योंकि इन इलाकों में पूर्व मानसून बारिश नहीं के बराबर हुई । प्राप्त जानकारी के अनुसार बारिश न होने से परेशान उत्तरप्रदेश सरकार ने तो केन्द्र से मदद माँगने का मन बनाया है । जुलाई के अंत में लगभग औसत से आधा पानी ही बरसा है । आने वाले संकट से निपटने के लिए राज्य सरकार ने इस सिलसिले में एक प्रस्ताव तैयार कर रही है जिसे जल्द ही केन्द्र सरकार को भेजा जाएगा । सरकारी आँकड़ों के अनुसार उत्तरप्रदेश के १३ जिलों में अब तक एक बूँद भी पानी नहीं बरसा है और इन जिलों में धान की रोपाई बिल्कुल भी नहीं हो पा रही है । प्रदेश के बाकी ६७ जिलों में भी औसत से कम बारिश होने के कारण धान की फसल चौपट हो गई है । मौसम विभाग का कहना है कि मध्य और पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश में अभी भी बारिश की गारंटी नहीं है । ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि उत्तरप्रदेश में मानसून इस साल तय समय १२ जून से एक पखवाड़े की विलंब से आया । उसके बाद भी मानसून की स्थिति सामान्य नहीं हो सकी है । मानसून देर से आने के कारण प्रदेश के ज्यादातर जिलों में ध्यान की नर्सरी लगाने का काम बुरी तरह पिछड़ चुका है । कृषि विशेषज्ञ प्रदेश के किसानों को ध्यान की पछैती किस्म के बीजों को अपनाने की सलाह दे चुके हैं । अब बारिश के और पिछड़ने के चलते कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि ध्यान की पैदावार में इस साल कम से कम ४० प्रतिशत की कमी हो सकती है । कृषि वैज्ञानिक सुशील कुमार सिंह के अनुसार उत्तरप्रदेश में दलहन को रकबा लगातार घट रहा है और इस वर्ष वर्षा कम होने के कारण दालों की फसल पर सबसे बुरा असर पड़ा है । गेहूँ की कटाई के बाद कोई जानेवाली उड़द की फसल तो पूरी तरह बर्बाद हो चुकी है । उत्तरप्रदेश के बुंदेलखंड संभाग के ७ जिलों में २० प्रतिशत ही कम वर्षा हुई है । सरकारी अधिकारियों की मानें तो अभी वर्षा की स्थिति सुधरने की इंतजार किया जा रहा है जिसके कारण किसी भी जिले को सूखाग्रस्त नहीं घोषित किया गया है । भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक धान की खेती के लिहाज से देश के तीन प्रमुख राज्य भयंकर सूखे की चपेट में आ चुके हैं । सामान्य सूखे के शिकार तो कई राज्य हो चुके हैं । ऐसी परिस्थितियों में धान की फसल पिछले वर्ष की तुलना में कम हो जाय तो कोई आश्‍चर्य नहीं कहा जा सकता है । उत्तरप्रदेश में गन्‍ने की उपज में २० प्रतिशत तक की गिरावट के आसार हैं । मौसम विभाग के अनुसार सामान्य से ५० फीसदी भी बारिश न हो, तो भयंकर सूखा माना जाता है । सामान्य से २३-५० फीसदी तक कम बारिश को सामान्य सूखे की श्रेणी में रखा जाएगा और सामान्य से २५ फीसदी तक कम बारिश को हल्का सूखा माना जाएगा । पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पश्‍चिमी उत्तरप्रदेश व दिल्ली भयंकर सूखे वाले इलाकों में शामिल हो चुके हैं क्योंकि इन इलाकों में सामान्य से ५० फीसदी से भी कम बारिश दर्ज की गई है । सामान्य सूखे की चपेट में तो संपूर्ण राजस्थान, बिहार, पश्‍चिमी मध्यप्रदेश, जम्मू कश्मीर, तेलंगाना, सौराष्ट्र, कच्छ आदि हैं । ३-४ घंटे की बिजली के भरोसे कृषि कार्य नहीं किए जा सकते । पंजाब में ९७ फीसदी से अधिक खेती योग्य जमीन के लिए सिंचाई की सुविधा है लेकिन धान बुवाई के बाद कम से कम १५-२० दिनों तक खेतों में पानी की सख्त जरूरत होती है । वहीं बारिश के बगैर मात्र सिंचाई के भरोसे वहाँ किसानों की दूसरी समस्या नरेगा के कारण दिहाड़ी पर काम करनेवाले मजदूरों की संख्या में कमी की भी है । उपरोक्‍त संदर्भ में “समय दर्पण” के प्रधान संपादक एवं प्रख्यात ज्योतिषी पं० कृष्णगोपाल मिश्रा के ज्योतिषीय विश्लेषण के अनुसार इस साल बारिश न होने का मुख्य कारण आग्नेय प्रकृति के ग्रहों की मजबूत स्थिति में पाया जाना है । मुख्य तौर पर प्रकृति अग्नि, जल और वायु के संतुलित शक्‍ति के तहत समान रूप से संचालित होती है । इन तीनों शक्‍तियों के वाहक मुख्य रूप से हमारे सौरमंडल के नवग्रह अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार उपरोक्‍त सत्ताओं को संतुलित करते हैं जिसमें सूर्य, मंगल और वृहस्पति अग्नि प्रकृति के वाहक हैं । शनि, बुध और शुक्र वायु प्रकृति के वाहक हैं । चंद्रमा, राहु-केतु जल प्रकृति के वाहक हैं । मुख्यतः बरसात का जो समय होताहै वह २० जून के आसपास प्रारंभ होता है । क्योंकि इस समय में सूर्य बुध की राशि मिथुन में प्रवेश कर तारीख के आसपास राहु के नक्षत्र में प्रवेश कर जाता है । जहाँ सूर्य का समीकरण वायु और जल प्रकृति के ग्रहों से बनता है और मानसून की शुरूआत हो जाती है लेकिन इस वर्ष जब सूर्य राहु के नक्षत्र में प्रवेश किया तो उस समय राहु सूर्य से षडाष्टक योग बनाते हुए राहु स्वयं ही सूर्य के नक्षत्र में था । साथ ही साथ सूर्य पर वृहस्पति की दृष्टि होना और वृहस्पति का मंगल के नक्षत्र में पाया जाना और मंगल का स्वयं स्वगृही होना आदि आग्नेय सत्ता के ग्रहों की मजबूत स्थिति दर्शाते हैं तथा वायु प्रकृति के ग्रहों में शनि का सिंह राशि में पाया जाना यह दोनों ग्रह आग्नेय प्रकृति के राशियों में पाए जा रहे हैं । ऐसी स्थिति में बारिश का कम होना स्वाभाविक सी बात है । इसमें मुख्य तौर पर वृहस्पति और मंगल की मजबूत भूमिका होना दिखाई दे रहा है । इस वर्ष में बारिश होगी तो जरूर लेकिन विलंब से होगी । मुख्य तौर पर ४ अगस्त के बाद जब सूर्य बुध के नक्षत्र में प्रवेश कर जाएगा तथा बुध शनि की युति सिंह राशि में होगी और सूर्य के साथ केतु का पाया जाना और सूर्य के साथ तात्कालिक मैत्री बनाते हुए शुक्र का मिथुन राशि में मजबूत पाया जाना आदि अच्छे बारिश के संकेतक है । ४ अगस्त से लेकर १३ अगस्त तक अच्छे बारिश के योग हैं क्योंकि इस समय शनि, बुध, शुक्र, तीनों की स्थिति मजबूत दिखाई दे रही है जिससे आग्नेय ग्रहों की सत्ता संतुलित कर बरसात कराने में सक्षम होंगे ।
-गोपाल प्रसाद

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