Skip to main content

एटमी युद्ध छिड़ा तो जीतेगा भारत, पाक होगा नेस्तनाबूद

भारत-पाकिस्तान के बीच अगर परमाणु युद्ध छिड़ा तो आखिरकार जीत भारत की ही होगी और पाकिस्तान का सफाया हो जाएगा । लेकिन इसकी उसे भारी कीमत चुकानी पड़ जाएगी । पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के कार्यकाल पर आधारित एक पुस्तक में दावा किया गया है कि भारत को इसके लिए अपने ५० करोड़ लोगों की जान गंवानी पड़ जाएगी । पुलित्जर पुरस्कार विजेता लेखक और इतिहासकार टेलर ब्रांच ने दावा किया है कि वर्ष १९९९ में करगिल युद्ध के दौरान भारतीय नेताओं ने तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को दोनों के बीच परमाणु युद्ध के हालात के बाद के परिदृश्य बताए थे ।
इस पुस्तक में ‘ऐट मिसाइल्स इन बगदाद’ अध्याय नाम से परमाणु युद्ध के बारे में बताया गया है जिसमें लेखक ने दावा किया है कि क्लिंटन ने उन्हें बताया था कि पाकिस्तान में यदि भारत पर परमाणु बम दागे गए तो भारत पूरे देश को तबाह कर देगा । व्हाइट हाउस में क्लिंटन से हुई बातचीत और उसके रिकॉर्ड किए अंशों का हवाला देते हुए ब्रांच ने ७०० पन्‍ने की पुस्तक ‘द क्लिंटन टेप्स : रेसलिंग हिस्ट्री विद द प्रेसिडेंट’ लिखी है । पुस्तक में उन्होंने लिखा है ‘राष्ट्रपति ने एक संक्षिप्त नोट में सबसे पहले लिखा था कि स्ट्रॉब टालबॉट ने उनकी हाल की दक्षिण एशिया यात्रा पर एक रिपोर्ट सौंपी है । वर्ष १९९१-२००१ के दौरान क्लिंटन प्रशासन में कार्यरत टालबॉट फिलहाल बुकिंग्स इंस्टीट्‌यूट के अध्यक्ष हैं । इन दिनों बाजार में धूम मचा रही इस पुस्तक में क्लिंटन के आठ साल के कार्यकाल की ऐसी गहन अंतदृष्टि पेश करने का दावा किया गया है, जिसे पहले कभी नहीं सुना गया ।
ब्रांच लिखते हैं, ‘उन्होंने विश्‍व को दो देशों भारत और पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध के गंभीर खतरे का सामना करने को लेकर बातचीत भी की थी । उनकी आपसी दुश्मनी ऐतिहासिक रूप से स्थायी है और इसे कम करने की जरूरत है । व्यक्‍तिगत तौर पर क्लिंटन ने खुलासा किया कि भारतीय अधिकारियों ने उन्हें पाकिस्तान के पास परमाणु बमों की संख्या के बारे में मोटे तौर पर जानकारी दी थी जिससे अनुमान लगाया गया था कि दोनों के बीच परमाणु बमों की बौछार से ३० से ५० करोड़ भारतीयों की मौत हो सकती है जबकि पाकिस्तान के सभी १२ करोड़ लोग मौत के घाट उतारे जा सकते हैं । भारत इसके बाद अपने कुछ लाख लोगों के बचने के बाद जीत का दावा कर सकता है । दूसरी तरफ पाकिस्तान के पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले उनके लोग भारत के मैदानी इलाकों में रहने वालों की अपेक्षा ज्यादा बचेंगे । ’ क्लिंटन ने खेद जताते हुए कहा कि वे सचमुच इसी तरीके से बात करते हैं और हमारे दोनों देशों के साथ अच्छे संबंध नहीं रहे ।
राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान क्लिंटन के साथ अपनी बातचीत की श्रृंखला पर आधारित लेख में ब्रांच कहते हैं, ‘उनके बीच हथियारों की होड़ में भारत इस बात से क्षुब्ध था कि अमेरिका पाकिस्तान को एफ-१६ लड़ाकू विमान बेचने पर सहमत हो गया है और पाकिस्तान भी कम नाराज नहीं हुआ जब अमेरिका ने राशि पाने के बाद विमानों की आपूर्त्ति करने से इंकार कर दिया । ’ प्रेसलर विधेयक में संशोधन के तहत वर्ष १९९० के बाद इस तरह का हस्तांतरण रोक दिया गया था । इस विधेयक के मुताबिक किसी भी देश को परमाणु अप्रसार संधि के उल्लंघन के कारण परमाणु हथियार विकसित करने के लिए सैन्य सामग्री की बिक्री पर रोक लगा दी गई थी । ब्रांच ने कहा, ‘क्लिंटन ने बताया कि पाकिस्तान के लिए और ज्यादा नाराजगी इस बात से रही कि अमेरिकी कानून ने अपने एफ-१६ के भंडारण के लिए प्रशासन को तो पाकिस्तान से भुगतान पाने की अनुमति दे दी लेकिन ये विमान अमेरिकी कब्जे में सड़ते रहे । ’

Comments

Popular posts from this blog

वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चों को एक परिपक्व इन्सान बनाना होता है, ताकि वो कल्पनाशील, वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और देश का भावी कर्णधार बन सकें, किन्तु भारतीय शिक्षा पद्धति अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त कर सकी है, कारण बहुत सारे हैं । सबसे पहला तो यही कि अंगूठाछाप लोग डिसा‌इड करते हैं कि बच्चों को क्या पढ़ना चाहिये, जो कुछ शिक्षाविद्‍ हैं वो अपने दायरे और विचारधारा‌ओं से बंधे हैं, और उनसे निकलने या कुछ नया सोचने से डरते हैं, ऊपर से राजनीतिज्ञों का अपना एजेन्डा होता है, कुल मिलाकर शिक्षा पद्धति की ऐसी तैसी करने के लिये सभी लोग चारों तरफ से आक्रमण कर रहे हैं, और ऊपर से तुर्रा ये कि ये सभी लोग समझते हैं कि सिर्फ वे ही शिक्षा का सही मार्गदर्शन कर रहे हैं, जबकि दर‌असल ये ही लोग उसकी मां बहन कर रहे हैं । मैं किसी एक पर दोषारोपण नहीं करना चाहता, शिक्षा पद्धति की रूपरेखा बनाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिये और सोचना चाहिये, कि क्या उसमें मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है। आज हम रट्टामार छात्र को पैदा कर रहे हैं, लेकिन वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और परिपक्व छात्र नहीं, क्या यही हमा…

राजनीति में भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार और राजनीति का एक गहरा संबंध है । जहां हम विकास की एक नई गाथा को रचने का सपना संजोए हुए हैं वहीं दुनिया के सामने हमारी गरीबी की सच्चाई को स्लमडॉग मिलेनियर जैसी फिल्मों के सहारे परोसा जा रहा है । आज हम भ्रष्टाचार के मामले में बंग्लादेश, श्रीलंका से भी आगे हैं ।
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री सह सांसद मधुकोड़ा का मामला भ्रष्टाचार के मामले में सामने आया है । जिसमें ४ हजार करोड़ के घपले का पता चला है । कोड़ा का नाम भी उन राजनेताओं में जुड़ गया है जो भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाये गए हैं या घिरे हुए हैं । भ्रष्टाचार को फैलाने वाले राक्षस सत्ता में आसीन राजनीति के शीर्ष नेता हैं इसकी शुरूआत भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के समय से ही हो गई थी । १९५६ में खाद्यान्‍न मंत्रालय में करोड़ों रूपये की गड़बड़ी पकड़ी गई । जिसे सिराजुद्दीन काँड के नाम से जाना जाता है । उस समय केशवदेव मालवीय खाद्यान्‍न मंत्री थे उन्हें दोषी पाया गया । १९५८ में भारतीय जीवन बीमा में मुंधरा काँड हुआ जिसकी फिरोज गाँधी ने पोल खोली थी । १९६४ में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए “संथानम कमिटी” का गठन किया गया ।…

काले धन एवं नकली नोटों से छुटकारा - भ्रष्टाचार पूर्णत: खत्म

प्राय: सभी देशों की सरकारों का एक रोना साझा है और वो भी अति भयंकर रोना! देश की अर्थ व्यवस्था में काला धन । यह काला धन बहुत से देशों को, बहुत सी सरकारों को बहुत रुलाता है और बुद्धिजीवी वर्ग को अत्यंत चिंतित करता है । अर्थशास्त्रियों की नाक में दम करके रखता है । रोज न‌ए-न‌ए सुझाव दि‌ए जाते हैं, विचार कि‌ए जाते हैं कि किस तरह इस काले धन पर रोक लगा‌ई जा‌ए. इनकम टैक्स डिपार्टमेंट तो छापों में विश्वास रखता है, जहाँ कहीं सुंघनी मिली नहीं कि पहुँच ग‌ए दस्ता लेकर । अजी! काले धन की बात तो छोड़ि‌ए! नोटों को लेकर इससे भी बड़ी समस्या का सामना क‌ई देशों को करना पड़ता है, और वो है नकली नोटों की समस्या । दूसरे देश की अर्थव्यवस्था को चौपट करना हो या बेहाल करना हो, प्रिंटिंग प्रेस में दूसरे देश के नोट हूबहू छापि‌ए और पार्सल कर दीजि‌ए उस देश में, बस फ़िर क्या है - बिना पैसों के तमाशा देखि‌ए उस देश का । अब तो उस देश की पुलिस भी परेशान, गुप्तचर संस्था‌एं भी परेशान और सरकार भी परेशान! नकली नोट कहां-कहाँ से ढ़ूंढ़े और किस जतन से? बड़ी मुश्किल में सरकार ।
बचपन से छलाँग लगाकर जब हमने भी होश सँभाला तो आ‌ए दिन काले धन …