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माँस भक्षण पर प्रतिबंध स्वागत योग्य निर्णय

लखनऊ से प्रकाशित ‘दि पायनियर’ में उल्लिखित उच्चतम न्यायालय के निर्णय को पढ़कर मन मुग्ध हो गया । गुजरात सरकार ने अपने प्रदेश के जैन धर्मानुयायियों की भावनाओं का समादर करते हुए उनके धार्मिक पर्व पर्यूषण के दौरान राज्य में मांस एवं मांसाहारी खाद्य वस्तुओं की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगाया था । लगभग ३००० कसाइयों के एक समूह ने राज्य सरकार के उक्‍त प्रतिबन्ध आदेश को कोई भी व्यवसाय करने के उनके मौलिक अधिकार पर अतार्किक प्रतिबन्ध करार देते हुए उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी । उक्‍त जनहित याचिका की सुनवाई न्यायमूर्ति एच. के. सेमा और न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू की पीठ ने की । पीठ ने यह कहते हुए कि चूंकि प्रतिबन्ध थोड़े समय के लिये है उसे उचित ठहराया और याचिका खारिज कर दी । वकीली बहसों का उत्तर देते हुए और अपना निर्णय अभिलिखित करते हुए न्यायमूर्ति काटजू ने याचिकाकर्ताओं को मध्यकालीन दार्शनिकों, शासकों और शहजादों का स्मरण कराया जिनका आचरण धार्मिक सहिष्णुता और त्याग की मिसाल रहा । उन्होंने प्रश्न किया “यदि बादशाह अकबर गुजरात में वर्ष में ६ माह मांस भक्षण पर प्रतिबन्ध लगा सकता था तब क्या आज अहमदाबाद में साल में नौ दिन मांस से विरत रहना अतार्किक है ?” उन्होंने यह भी कहा कि “महान मुगल बादशाह अकबर स्वयं सप्ताह में कुछ दिन भारतीय समाज के शाकाहारी वर्ग और अपनी हिन्दू बेगम की भावनाओं का समादर करते हुए शाकाहारी रहता था । हमें भी दूसरों की भावनाओं का, भले ही वह अल्पसंख्यक समुदाय के हों, समादर करना चाहिये । ” पीठ ने प्रस्तुत मामले का हवाला देते हुए कहा “हमारे जैसे इतनी विविधता के साथ बहु संस्कृतियों वाले देश में किसी को किसी छोटे से प्रतिबन्ध, जो समाज के वर्ग विशेष की भावनाओं का समादर करते हुए लगाया जा रहा हों, के सम्बन्ध में इतना अधिक संवेदनशील और भावुक नहीं होना चाहिये । ” उन्होंने यह भी जोड़ा “हम ये टिप्पणियां इसलिये कर रहे हैं क्योंकि आजकल अपने देश में असहिष्णुता की बढ़ती हुई प्रवृत्ति हमारे संज्ञान में आ रही है । ” उच्चतम न्यायालय की पीठ द्वारा मामले में दिया गया निर्णय और उसके द्वारा व्यक्‍त किये गये तर्क सम्मत विचार समाज के प्रत्येक वर्ग की भावना का समादर करने वाले तथा समाज में सौहार्द्रपूर्ण वातावरण का सृजन करने वाले हैं । धार्मिक सहिष्णुता, जीव दया और शाकाहार के पोषक भी हैं । गुजरात सरकार द्वारा धार्मिक पर्वों के दौरान समाज के शाकाहारी वर्ग की भावनाओं का समादर करते हुए अपने राज्य में मांस एवं मांसाहारी खाद्य पदार्थों की बिक्री पर प्रतिबन्ध लगाया जाना भी स्वागत योग्य कदम है । अन्य राज्य सरकारों द्वारा उसका अनुकरण किया जाना अभीष्ट है ।
- रमाकान्त जैन शोधदर्शन से साभार

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