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राजधानी में खुलेगा शांति विश्‍वविद्यालय

दक्षिण एशिया का पहला शांति एवं स्थाई विकास विश्‍वविद्यालय दिल्ली में बन सकता है । भारत सरकार के इस प्रस्ताव को यूनेस्को से हरी झंडी मिलने के बाद इस पर काम शुरू हो जाएगा । इसके अलावा सरकार ने दिल्ली विश्‍वविद्यालय को विश्‍वस्तरीय बनाने की घोषणा भी की है । शांति विश्‍वविद्यालय की स्थापना में यूनेस्को भी साझेदार रहेगा । यह विश्‍वविद्यालय शांति, विकास और संघर्षों के समाधान का अध्ययन का उच्च स्तरीय केंद्र होगा । मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल पेरिस में बुधवार से आयोजित उच्च शिक्षा सम्मेलन के दौरान इस प्रस्ताव को यूनेस्को के अधिकारियों के समक्ष रखेंगे । इस विश्‍वविद्यालय का नाम महात्मा गांधी सेंटर फॉर पीस एजुकेशन एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट रखा जाएगा । कुछ दिनों पहले यूनेस्को का एक दल भारत आया था, जिनसे मानव संसाधन मंत्रालय के अधिकारियों ने इस मसले पर बातचीत की थी । भारत सरकार की तरह से विश्‍वविद्यालय को स्थापित करने का जिम्मा नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ एजुकेशनल प्लानिंग एंड एडमिनिस्ट्रेशन को दिया जाएगा । यूनेस्को की बड़ी भूमिका प्रस्तावित विश्‍वविद्यालय के क्षमता निर्माण की होगी । इसके अलावा सरकार ने दिल्ली, मद्रास, मैसूर, कोलकाता और मुंबई विश्‍वविद्यालय को विश्‍वस्तरीय बनाने की घोषणा की है । मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री डी पुरंदेश्‍वरी ने राज्य सभा में बताया कि इन विश्‍वविद्यालयों के बुनियादी ढांचे को उन्‍नत बनाने के लिए ११ वीं योजना के दौरान प्रत्येक को १०० करोड़ रूपए का विशेष अनुदान दिया गया है ।

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वर्तमान में शिक्षा का उद्देश्य

शिक्षा का प्रथम उद्देश्य बच्चों को एक परिपक्व इन्सान बनाना होता है, ताकि वो कल्पनाशील, वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और देश का भावी कर्णधार बन सकें, किन्तु भारतीय शिक्षा पद्धति अपने इस उद्देश्य में पूर्ण सफलता नहीं प्राप्त कर सकी है, कारण बहुत सारे हैं । सबसे पहला तो यही कि अंगूठाछाप लोग डिसा‌इड करते हैं कि बच्चों को क्या पढ़ना चाहिये, जो कुछ शिक्षाविद्‍ हैं वो अपने दायरे और विचारधारा‌ओं से बंधे हैं, और उनसे निकलने या कुछ नया सोचने से डरते हैं, ऊपर से राजनीतिज्ञों का अपना एजेन्डा होता है, कुल मिलाकर शिक्षा पद्धति की ऐसी तैसी करने के लिये सभी लोग चारों तरफ से आक्रमण कर रहे हैं, और ऊपर से तुर्रा ये कि ये सभी लोग समझते हैं कि सिर्फ वे ही शिक्षा का सही मार्गदर्शन कर रहे हैं, जबकि दर‌असल ये ही लोग उसकी मां बहन कर रहे हैं । मैं किसी एक पर दोषारोपण नहीं करना चाहता, शिक्षा पद्धति की रूपरेखा बनाने वालों को खुद अपने अन्दर झांकना चाहिये और सोचना चाहिये, कि क्या उसमें मूलभूत परिवर्तन की जरूरत है। आज हम रट्टामार छात्र को पैदा कर रहे हैं, लेकिन वैचारिक रूप से स्वतन्त्र और परिपक्व छात्र नहीं, क्या यही हमा…

राजनीति में भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार और राजनीति का एक गहरा संबंध है । जहां हम विकास की एक नई गाथा को रचने का सपना संजोए हुए हैं वहीं दुनिया के सामने हमारी गरीबी की सच्चाई को स्लमडॉग मिलेनियर जैसी फिल्मों के सहारे परोसा जा रहा है । आज हम भ्रष्टाचार के मामले में बंग्लादेश, श्रीलंका से भी आगे हैं ।
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एक आरटीआई एक्टिविस्ट के संघर्ष की कहानी, उसी की जुबानी

पिताजी गुरु भी थे। गरीबी, प्राइवेट ट्यूशन वगैरह करके आजीविका चलाते; परिवार चलाने के साथ-साथ सारे समाज, देश की चिंता उनका प्रमुख स्वभाव रहा। हमेशा दूसरों से कुछ अलग करने की चाह; सीमित संसाधनों में भी देश, समाज और मित्रों के लिए समय निकालना; शायद उनका यही स्वभाव मेरे मस्तिष्क में रच-बस गया, कार्यशैली का हिस्सा बन गया। छात्र जीवन बहुत फाकाकशी, गरीबी का रहा, लेकिन मेरे पिताजी ने अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझौता नहीं किया। हमारे मकान का धरन (कड़ी) लकड़ी का था, जो टूट गया था। उसी पर पूरे छत का लोड था। मकान कब गिर जाय, कुछ ठिकाना नहीं।प्लास्टिक के टेंट लगाकर रहते थे। कभी घर में चूल्हा भी नहीं जलता था। ऐसी ही परिस्थितियों में एक बार गुल्लक तोड़ा, तो पाँच रुपए निकले। उन्हीं से दो किलो चूड़ा लाया था। उसी को भिंगोकर, नमक-मिर्च लगाकर सपरिवार ग्रहण किया। अपनी शादी बिना तिलक-दहेज के की। दो बहनों की शादी आज से बीस साल पहले दिल्ली में मात्र सत्रह हजार की मामूली रकम में ही की। दोनों बहनों की शादी एक ही तिथि में किया। हमारे समाज (अखिल भारतीय खटिक समाज) के जो राष्ट्रीय पदाधिकारी थे, उन्होंने अपना मकान पंद्…