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सूक्‍ति

मैं उन गुरू के चरण-कमल की वंदना करता हूं जो कृपा के सिंधु और मानव-देह में भगवान हैं और जिनके वचन माया-मोह के गहन अंधकार को नष्ट करने के लिए सूर्य-किरणों के समूह हैं |
-तुलसीदास
काम-वासना कमजोर करती है और कमजोरी काम वासना को बढ़ाती है । शक्‍ति-वासना से मुक्‍त करती है और काम-वासना से मुक्‍ति आती है तो शक्‍ति बढ़ती है । - - -ओशो
मन का रोग चंचल स्वभाव है, जब कोई ऐसी-वैसी बात हो जाती है, मन भय और प्रसन्‍नता के बीच डांवाडोल फिरता रहता है । -स्वामी रामतीर्थ
अधिकार हजम करने के लिए जब पूरी कीमत न चुकाई जाए, तब तक यदि अधिकार मिल भी जाए तो उसे गंवा बैठेंगे । - सरदार पटेल
जो पुस्तकें तुम्हें सबसे अधिक सोचने के लिए विवश करती हैं, तुम्हारी सबसे बड़ी सहायक हैं । - जवाहरलाल नेहरू
सुखी के प्रति मित्रता, दुखी के प्रति करूणा, पुण्यात्मा के प्रति हर्ष और पापी के प्रति उपेक्षा की भावना करने से चित्त प्रसन्‍न व निर्मल होता है । - पतंजलि
यह मेरा बंधु है और यह नहीं है, यह क्षुद्र चित्त वालों की बात होती है । उदार चित्त वालों के लिए तो सारा संसार ही अपना कुटुंब है । - महोपनिषद
समग्र विश्‍व एक ही परिवार है । सारे वर्णभेद असत्य हैं । प्रेम बंधन ही बहुमूल्य है । - गुरजाडा अप्पाराव
एक पंथ बनाते ही तुम विश्‍वबंधुता के विरूद्ध हो जाते हो । जो सच्ची विश्‍अवबंधुता की भावना रखते हैं, वे अधिक बोलते नहीं, उनका कर्म बोलता है । - विवेकानंद
दरिद्र कौन है? भारी तृष्णा वाला । और धनवान कौन है? जिसे पूर्ण संतोष है । - शंकराचार्य
कठिनाइयों का मुकाबला करो, चाहे सारी दुनिया दुश्‍मन ही क्यों न बन जाए । - मैजिनी
मुट्‌ठ्री भर संकल्पवान लोग, जिनकी अपने लक्ष्य में दृढ़ आस्था है, इतिहास की धारा को बदल सकते हैं । - महात्मा गांधी
सुवासना और दुर्वासना- ये दोनों मोक्ष और बंधन के मूल कारण हैं । - माधवदेव
प्राप्त हुए धन का उपयोग करने में दो भूलें हुआ करती हैं, जिन्हें ध्यान में रखना चाहिए । अपात्र को धन देना और सुपात्र को धन न देना । - वेद व्यास
प्रेम के मार्ग में चतुराई बहुत बूरी चीज है । - मौलाना रूम
राज्य छाते के समान होता है, जिसका अपने हाथ में पकड़ा हुआ दंड थकान को उतना दूर नहीं करता, जितना कि थकान उत्पन्‍न करता है । - कालिदास
किसी कार्य के लिए कला और विज्ञान ही पर्याप्त नहीं हैं, उसमें धैर्य की आवश्यकता भी पड़ती है । - गेटे
प्राप्त हुए धन का उपयोग करने में दो भूलें हुआ करती हैं, जिन्हें ध्यान में रखना चाहिए । अपात्र को धन देना और सुपात्र को धन न देना । - वेद व्यास
वैरी भी अद्‌भुत कार्य करने पर प्रशंसा के पात्र बन जाते हैं । - सोमेश्‍वर
अपने पर अविश्‍वास का होना अश्रद्धा का रूप है । प्रश्नों का उत्पन्‍न न होना तो तम या मूर्च्छा है । संदेह या प्रश्नों को परास्त करने ई शक्‍ति ही जिज्ञासु की श्रद्धा कहलाती है । - वासुदेवशरण अग्रवाल
श्रद्धा या आस्था के बिना जीवन-दृष्टि तो नहीं होती, जीने का ढर्रा या नक्शा-भर बन सकता है । - अज्ञेय
मन में प्रसन्‍नता और बड़ी आकंक्षा पैदा कर देना श्रद्धा की पहचान है । - मिंलिंदप्रश्न
चाहे गुरू हो या ईश्‍वर, पर श्रद्धा अवश्य रखनी चाहिए, क्योंकि बिना श्रद्धा के सब बातें व्यर्थ होती हैं । - समर्थ रामदास
यदि प्रेम स्वप्न है तो श्रद्धा जागरण । - रामचंद्र शुक्ल
जहां मूर्खो की पूजा नहीं होती, जहां धान्य भविष्य के लिए संगृहित किया हुआ है, जहां स्त्री-पुरूष में कलह नहीं-वहां मानो लक्ष्मी स्वयंमेव आई हुई है । - चाणक्यनीति
मनुष्य वस्त्रों के बिना तो शोभित हो सकता है परन्तु लज्जा व धैर्य से रहित होने पर नहीं । - श्रीहर्ष
लोक-निंदा भय इसलिए है कि वह हमें बूरे कामों से बचाती है । अगर वह कर्तव्य-मार्ग में बाधक है तो उससे डरना कायरता है । प्रेमचंद
वचन का पालन करने वाला कंजूस की भांति तोल कर अपने मुख से शब्द निकालता है । - महात्मा गांधी
अधिक धन-संपन्‍न होने पर भी जो असंतुष्ट रहता है, वह सदा निर्धन है । धन से रहित होने पर भी जो संतुष्ट है, वह सदा धनी है । - अश्‍वघोष
मन में संतोष होना स्वर्ग की प्राप्ति से भी बढ़कर है । संतोष ही सबसे बड़ा सुख है । संतोष यदि मन में भली-भांति प्रतिष्ठित हो जाए तो उससे बढ़कर संसार में कुछ नहीं । - वेदव्यास
जो अप्राप्य वस्तु के लिए चिंता नहीं करता और प्राप्त वस्तु के लिए सम रहता है, जिसने न दुख देखा है न सुख-वह संतुष्ट कहा जा सकता है । - महोपनिषद्‌
संतोष से सर्वोत्तम सुख प्राप्त होता है । - पतंजलि
प्रिय बोलना सज्जनों की कुल विद्या है । - बाणभट्ट
अतिशय संपन्‍नता को पाकर भी गर्वरहित लोग किसी को तनिक नहीं भूलते । - माघ
यह स्त्री है, यह पुरूष है-यह निरर्थक बात है । वास्तव में तो सत्पुरूषों का चरित्र ही पूजा योग्य होता है । -कालिदास
सज्जन लोग रत्‍न पाकर उतने प्रसन्‍न नहीं होते, जिसने प्रसन्‍न उस रत्न को किसी निर्लोभ पात्र को देकर होते हैं । -भास
जो धर्माचरण करता है, जीव मात्र के प्रति तितिक्षा रखता है, जो अन्यों से तप्त किए जाने पर भी तप्त नहीं होता, वही मनुष्य श्रेय पात्र है । - मत्स्यपुराण

दुःखों में जिसका मन उदास नहीं होता, सुखों में जिसकी आसक्‍ति नहीं होती तथा जो राग, भय व क्रोध से रहित होता है, वही स्थितिप्रज्ञ है ।
- वेदव्यास

आत्मज्ञानी साधक को ऊंची या नीची किसी भी स्थिति में न हर्षित होना चाहिए, न कुपित ।
- आचारांग

प्यार से विष भी पिला सकते हैं, लेकिन बलपूर्वक दूध पिलाना मुश्किल है ।
- कुंदकूरि वीरेशलिंग पंतुलु

स्नेह शून्य सब वस्तुओं को अपने लिए मानते हैं । स्नेह संपन्‍न अपने शरीर को भी दूसरों का मानते हैं ।
- तिरूवललुवर

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