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नैतिक शिक्षण शिविर का प्रभाव

नैतिकता हमारा स्वाभाविक गुण है । जब इन गुणों पर क्रोध मान माया लोभ, परिग्रह और तृष्णा का परदा पड़ जाता है तब व्यक्‍ति अनैतिकता के मार्ग पर चलने लगता है । आज के परिवेश में हर जगह अनैतिकता ही दिखाई देती है । बालक शुरू से ही बड़ों से अनैतिकता सीख लेता है और उदंडता का रास्ता पकड़ लेता है । विनय और बड़ों का सम्मान भूल जाता है और पढ़ाई लिखाई में कमजोर होता जाता है । यहां तक देखा गया है कि बालक अपनी असफलता पर आत्महत्या तक कर लेता है । इस विषय परिस्थिति को कुछ लोगों ने समझा और मिलकर एक संस्था दिगम्बर जैन नैतिक शिक्षा समिति की स्थापना की । इसने अपना कार्य संचालन दिल्ली से १९९१ में प्रारम्भ किया । शुरू-शुरू में बड़ी कठिनाईयां आईं । सुयोग्य शिक्षिक नहीं मिले, इसलिए प्रशिक्षण शिविर लगाए । जिन्हें बच्चों को पढ़ाने की ललक थी और धर्म का ज्ञान था उन्हें प्रशिक्षित किया गया । प्रशिक्षण के लिए जगह-जगह से विद्वान आमंत्रित किये गये जिन्होंने धर्म की गहराइयों को छोटे-छोटे दृष्टान्तों से इन प्रशिक्षणार्थियों को समझाया । आज लगभग ५०-६० अध्यापिकाओं व अध्यापकों का एक मण्डल तैयार है । कुछ अध्यापक तो पंडिताई और विधान कराने लगे । इस तरह अनेक अध्यापकों को रोजगार मिल गया । डॉ. अशोक शास्त्री, सचिन आदि विधानकर्ता आज खूब विधान आदि कराकर आजीविका चला रहे हैं । सात नियम ः अद्‌भुत प्रभावसमिति ने कुछ नियम बनाए । बड़ों व बच्चों को पालन करना अनिवार्य कर दिया । पहला नियम-प्रातः उठते ही नौ बार णमोकार मंत्र का जाप, दूसरा नियम-बड़ों के चरणस्पर्श, तीसरा-देव दर्शन, चौथा-खुद पानी छान कर पीना और जीवानी करना, पांचवां-उसी रसोई का भोजन करना जिसमें जूते-चप्पल नहीं जाते, छठा-रात्रि भोजन त्याग (रात्रि भोजन से हानियां) व सोते समय णमोकार मंत्र का जाप । ये नियम इतने लोकप्रिय हुए कि घर-घर संवरने लगे और दूसरे दिन ही माता-पिता आकर हम लोगों से लिपट गए कि आपने ये क्या करा दिया, आज तक बच्चों ने हमारे पैर नहीं छुए और अब शिविर के एक दिन बाद ही प्रातः उठे तो बच्चों ने पैर नहीं छुए । पैर छूने मात्र से उनके अन्दर विनय का प्रादुर्भाव हो गया नैतिकता का बोध होने लगा । क्रोध मान माया लोभ, तृष्णा के स्थान पर विनय और विनम्रता ने प्रभाव जमाना शुरू कर दिया । रसोई में जूते-चप्पल ले जाने से रसोई गन्दी रहती थी, हमारे अन्दर अनेक बीमारियों के इन्फैक्शन का खतरा रहता था, वह दूर हो गया । बच्चे-बड़े सब देव दर्शन करने लगे । अपने मुनि, आचार्यों के प्रति विनय और नमोस्तु करने लगे, घर स्वर्ग बन गया । इन कुछ अनिवार्य बातों ने अद्‌भुत प्रभाव छोड़ा । आदर्श घर बन गया, स्वास्थ्य के लिए साफ पानी से आंखें धोना और नाखून व दांतों की सफाई के बारे में ध्यान रखने के लिए कहा गया । आंखों की रोशनी बढ़ने लगी । शिविर में पढ़ाई पढ़ने के बाद बच्चों को कहा कि घर जाकर शिविर के दिनों में अतिथियों की आवभगत वे खुद करेंगे । अतिथियों को छने पानी का ग्लास अब बच्चे खुद देंगे । माता-पिता के कार्यों में हाथ बटायेंगे । सारे घर का सामान, अपनी पुस्तकें व स्टेशनरी का सामान सुनियोजित स्थान पर रखेंगे । पढ़ने के समय पढेंगे, खेलने के समय खेलेंगें, चित्रकला प्रतियोगिता के माध्यम से कला और संस्कृति का विकास भी किया जाने लगा, इन बातों ने घर को स्वर्ग बना दिया । अपने मन्दिर जी की सेवा व सुरक्षा पर ध्यान देना इन बच्चों को सिखाया । मन्दिर में जिनवाणी यत्र-तत्र बिखरी होती है उन्हें यथा स्थान पर रखना, कवर चढ़ाना, अगर फट गयी है तो जोड़कर रख देना । मन्दिर में बिजली-पानी निरर्थक जल रही है, तो उसे बंद करना । सामाजिक कार्यों में हाथ बंटाना । देशभक्‍ति ः देश के लिए ईमानदारी से काम करने का संकल्प दिलाया जाता है । पानी-बिजली की बचत करना उन्हें सिखाया जाता है । जैन धर्म की विश्‍व को देन, स्वतंत्रता आंदोलन में जैनों का योगदान, भामाशाह जैसे देश पर मर-मिट जाने वालों की मिसाल से राष्ट्रीय भाव बच्चों में जागृत किये जाते हैं । १० हजार बच्चों में संस्कार ः बच्चों में संस्कार डालने वाली यह एक मात्र संस्था है जो प्रतिवर्ष लगभग १० हजार बच्चों को धार्मिक व नैतिक शिक्षा देती है और इतने ही माता-पिता प्रभावित होते हैं । इसके लिए समिति पांच भागों के माध्यम से शिक्षा देती है जो स्वयं छपवाती है और शिविरार्थियों को निःशुल्क वितरित करती है । जहां-जहां शिविरों में अध्यापक पढ़ाने जाते हैं, उनकी सारी व्यवस्था समिति करती है । प्रत्येक मन्दिर में ये शिविर लगते हैं । समाज बच्चों को अच्छा नाश्ता कराते हैं । पैन, पेंसिल, बैग की व्यवस्था समाज ही करती है । समाज का प्यार , स्नेह, विनय, विनम्रता का अद्‌भुत सामंजस्य मिलता है । बच्चों की जब गर्मियों की छुट्‌टी होती है तब यह शिविर लगते हैं । एक सप्ताह के शिविर ः यह शिक्षा एक सप्ताह की होती है । एक दिन बीच में समिति के कार्यकर्त्ता निरीक्षण करने के लिए जाते हैं । शिविर उद्‌घाटन और समापन के अवसर पर समिति के पदाधिकारी, समाज के गणमान्य व्यक्‍ति तथा अन्य पार्षद, विधायक, मंत्री भाग लेते हैं । धर्म का दिव्य सन्देश सतपथ पर चलने की प्रेरणा ये शिविर देते हैं । परिणामस्वरूप सदाचार के मार्ग पर चलकर आदर्श नागरिक बनकर श्रुताभ्यास से संस्कारित किये जाते हैं । बच्चे संकल्प लेते हैं ः अंतिम दिन सभी बच्चों को अष्टद्रव्य से पूजा सिखाई जाती है । स्वस्तिक कैसे बनाया जाता है । मंगलाष्टक और ‘इह विधि ठाड़ों होय’ के बच्चे पढ़ते हैं, क्रमवार पूजा के अंग बताए जाते हैं । इस दिन अनेक बच्चे जीवन भर पूजा करने का संकल्प लेते हैं । अनेक बच्चे रात्रि भोजन और अभक्ष्य पादार्थों के सेवन का त्याग कर देते हैं । पानी, छना पीने का नियम लेते हैं । बच्चे कह उठते हैं कि शिविरों से उनकी दिनचर्या ही बदल गई । शिक्षा के विषय ः पहले भाग के विषय- णमोकार मंत्र और मंगल पाठ, हमारे नैतिक कर्तव्य, देवदर्शन विधि, तीर्थंकर भगवान, जीव-अजीव, इन्द्रियां, भगवान महावीर, वीर भामाशाह, दर्शन स्तुति, दूसरे भाग के विषय-देव स्तुति, पाप कषाय, चार गतियां, पूजन विधि, भक्ष्य-अभक्ष्य, जैन पर्व, रक्षाबन्धन पर्व, शाकाहार, श्रीमद्‌ रायचन्द्र, भगवान आदिनाथ, सुखी जीवन का आधार, तीसरे भाग के विषय- देव स्तुति, पंचपरमेष्ठी, देव शास्त्र, गुरू, अष्ट मूलगुण, द्रव्य तत्व, जीवन में सत्य का महत्व, भगवान महावीर का जीवनदर्शन, सप्तव्यसन, तीर्थक्षेत्र भगवान पार्श्‍वनाथ, वीर चामुण्डराय, आचार्य शान्ति सागर, हमारे दायित्व, चौथे भाग के विषय-चार अनुयोग, श्रावक के १२ व्रत, छना जल, तीन लोग, भगवान नेमिनाथ, संत समंतभद्र, गणेश प्रसाद वर्णी, दौलतराम, पर्यावरण, जीव रक्षा, गोपाल दास बरैया, रात्रि भोजन से हानियां, पांचवे भाग में गुणस्थान, प्रतिमा, ध्यान, कर्म, दशलक्षण धर्म, स्याद्वाद और अनेकान्त, आचार्य कुन्दकुन्द । दिल्ली में समिति ने मई-जून २००८ में लगभग ६५ शिविर लगाये हैं । ये शिविर जीवन में चन्दन जैसी शीतलता और मिश्री जैसी मधुरता भर देते हैं । जैन संतों का आशीर्वाद - समिति को सभी मुनिजनों और संतों का आशीर्वाद प्राप्त है । सांगानेर और मथुरा में शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थियों का शिक्षक के रूप में भरपूर सहयोग मिलने लगा है देश की बड़ी संस्थाएं- जैसे जैन मिलन महासभा, परिषद आदि नैतिक शिक्षण शिविरों को लगाने में मदद करती है । मुनिराजों का जहां-जहां मंगल आगमन होता है उनका मंगल आशीर्वाद और पावन सान्‍निध्य में शिविर लगते हैं । शिविर के कार्य देखकर रोम-रोम से आशीर्वाद देते हैं कि जैन धर्म की सच्ची सेवा तो यह है ।
श्री किशोर जैन कार्याध्यक्ष, दिगम्बर जैन नैतिक शिक्षा समिति 7/9 - A, दरियागंज, नई दिल्ली- - 110002

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