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भारत और पाकिस्तान ः क्या पाया, क्या खोया?

पाकिस्तान और भारत एक साथ आजाद हुए लेकिन दोनों ने अब तक क्या खोया क्या पाया? दोनो देशों के अलग हो जाने के बाद भी भारत अग्रज की भूमिका में है। वह पाकिस्तान के घुड़कियों को सहने का आदी हो चुका है । भारत के हाथों पराजित होने के बावजूद वह अपनी धरती का इस्तेमाल भारत विरोधी गतिविधियों में ही करता रहता है । वह सर्वाधिक सहायता देने वाले अमेरिका की राशि का उपयोग आतंकवाद से लोहा लेने के बजाय नकारात्मक मानसिकता के कारण भारत के खिलाफ कर रहा है । वार्ताओं के इतने दौर के बाद स्थिति ऐसी बन चुकी है कि वार्ता शब्द अब अनुपयोगी हो चुका है । भारतीय सांसदों के दल ने भी ओबामा प्रशासन से यह सुनिश्‍चित करने को कहा कि पाकिस्तान अमेरिकी सहायता का उपयोग अपने बलों के निर्माण में न करे । प्रतिनिधिमंडल के अध्यक्ष और कांग्रेस सांसद अभिषेक मनु सिंघवी के अनुसार सांसदों ने दृढ़ता से एक स्वर में समकालीन स्थिति में भारत की चिंताओं को व्यक्‍त किया । अफगान पाकिस्तान नीति आवश्यक रूप से सुरक्षा उपाय घटक के रूप में तैयार की जानी चाहिए ताकि अमेरिका की ओर से दी जानेवाली भारी सहायता को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संभवतः भारत विरोधी गतिविधियों के रूप में इस्तेमाल होने से रोका जा सके । सासंदों ने अमेरिकी अधिकारियों और सांसदों को बताया कि वे पकिस्तान की मदद का स्वागत करते हैं लेकिन उन्हें सुनिश्‍चित करना होगा कि इसका भारत के खिलाफ उपयोग न हो । भारत के विदेश सचिव शिवशंकर मेनन के अनुसार मिस्त्र में निर्गुट शिखर सम्मेलन के दौरान उनकी मुलाकात पाकिस्तानी विदेश सचिव सलमान बशीर के साथ होगी । पिछले दिनों रूस में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति जरदारी की मुलाकात के दौरान दोनों देशों के सचिवों के बीच बैठक करने का फैसला किया गया था । मिस्त्र में होने वाली मुलाकात के दौरान चर्चा का विषय केवल आतंकवाद रहेगा । इसी संदर्भ में मुंबई हमलों के दोषियों के खिलाफ जाँच आगे बढ़ाने के मसले पर भी बातचीत की जाएगी । इस बैठक के लिए दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों के बीच कई दौर की बातचीत हुई और आखिर में दोनों देश मिस्र में ही बैठक करने पर राजी हुए हैं । इसके पहले भारत की ओर से यह बैठक जुलाई के प्रथम सप्ताह में नई दिल्ली में करने का प्रस्ताव किया गया था परन्तु पाकिस्तान ने कहा कि यह बैठक केवल आतंकवाद के मसले पर नहीं होगी, जबकि मनमोहन जरदारी बैठक में यही तय किया गया था । पाकिस्तान ने विदेश सचिवों की बैठक में जम्मू-कश्मीर और अन्य मसलों को भी शामिल करने पर जोर दिया परन्तु भारत ने कहा कि पाकिस्तान को सबसे पहले यह वादा करना होगा कि अपनी धरती से भारत विरोधी आतंकवादी हरकतें नहीं होने देंगे । मिस्त्र में निर्गुट शिखर बैठक १५ और १६ जुलाई को हुई, जिसमें पाकिस्तान की ओर से राष्ट्रपति जरदारी ने भाग लेने की इच्छा व्यक्‍त की थी किंतु बाद में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानी के भाग लेने की घोषणा की गई । इधर अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन का वक्‍तव्य अपने आप में काफी महत्वपूर्ण है । साथ ही उनके संतुलिन बयान एक कड़वी सच्चाई को बयान करती है । उन्होंने कहा कि “पाकिस्तान की अमेरिकी नीति एक कदम आगे और दो कदम पीछे ही रही है । यह कहना ठीक होगा कि आज उस क्षेत्र में हम जिन समस्याओं से निपट रहे हैं, वे अमेरिकी नीति का नतीजा हैं । ” हिलेरी क्लिंटन ने अमेरिकी प्रशासन की पिछली तीस वर्षों की नीति में काफी दोष निकाला, लेकिन वही गलती दोहराई जा रही है । आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए पाकिस्तान ने अमेरिका से पिछले सात वर्षों में जितनी सहायता (१८ हजार करोड़ रूपए) ली । उसका कोई सद्‌परिणाम देखने को नहीं मिला । इसके बावजूद अमेरिका पाकिस्तान को बिना शर्त मदद प्रदान कर रहा है । आखिर इसका मकसद क्या है? वास्तव में अमेरिका भारत की उभरती शक्‍ति से भयभीत हो चुका है । उसे यह समझ आ चुका है कि हम भारत के साथ प्रत्यक्ष नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष जंग ही लड़ सकते हैं क्योंकि अमेरिकी शक्‍ति भारत की अस्थिर और उलझाए रखने की नीति में ही अपनी जीत मानता है । दूसरी तरफ उसे यह भी मान है कि इस सबके बाद भी भारत सारे पारिस्थितियों का मुकाबला कर ले और आगे हो जाय तब क्या होगा? यही वह शंका है जिसके कारण वह भारत के साथ अच्छे संबंध भी चाहता है । अमेरिका भारतीय प्रतिभा का लोहा मानता है । अपने अधिकांश पदों पर भारतीय मूल के व्यक्‍तियों की नियुक्‍ति प्रतिभा के बलबूते ही उन्होंने की है । पाकिस्तान के मुद्‌दे पर अमेरिकी उच्चाधिकारियों, मंत्रियों एवं खुद राष्ट्रपति तक के बदलते बयानों के निहितार्थ आखिर क्या है? भारत की मजबूरी यह है कि अमेरिका को ईंट का जवाब पत्थर से तो नहीं दे सकता है, परन्तु अप्रत्यक्ष रूप से उसने अमेरिका को हस्तक्षेप करने के दायरे से अवगत करा दिया है । भारत ने तो वैश्‍विक आर्थिक मंदी में भी विकल्पों के बलबूते एवं परिश्रम, लगनशीलता के संयुक्‍त शक्‍ति के बदौलत देश को विकट स्थिति से बचा ही लिया, परन्तु पाकिस्तान की स्थिति ऐसी नहीं है । वहाँ यदि अमेरिकी सहायता ना मिले तो विद्रोह की आग पूरे देश में फैल जाएगी जिसका पहला निशाना भारत नहीं बल्कि अमेरिका होगा । पाकिस्तान को दी जा रही सहायता से जुड़े “पीस एक्ट २००९” से भारत का जिक्र ओबामा प्रशासन ने हटवाकर पड़ोसी देश कर दिया है । संभवतया पाकिस्तान के दबाव में एक्ट की भाषा बदल दी गई । अमेरिका ने भी अपनी परमाणु नीति के चोले को एक तरफ रखकर परमाणु सामग्री की तस्करी करने वाले वैज्ञानिक अब्दुल कादिर खान से पूछताछ करने की भी जरूरत नहीं समझी । इस एक्ट के द्वारा पाकिस्तान को दी जानेवाली वित्तीय सहायता राशि में तीन गुणा बढ़ोत्तरी कर डेढ़ अरब डॉलर करने के प्रस्ताव की पुष्टि कर दी गई है । अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने कहा कि पाकिस्तान का परमाणु शस्त्र भंडार काफी विशाल पारंपरिक सेना को पृष्ठभूमि प्रदान करने के लिए ही है । इसके पहले अमेरिकी सीनेटरों ने शंका जाहिर की थी कि पाकिस्तान को अमेरिकी मदद का दुरूपयोग परमाणु भंडार को बढ़ाने के लिए ही किया जा रहा है । अमेरिकी सुरक्षा सहायता की शर्तों में कहा गया है कि पाकिस्तान परमाणु प्रसार से जुड़े पाकिस्तानी नागरिकों से पूछ्ताछ की सुविधा देगा । पाकिस्तान ने कहा था कि जिस तरह हमें परमाणु प्रसार और सीमा पार आतंकवाद के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है उससे हम अपमानित महसूस करते हैं । पाकिस्तान के सांसद ने कहा था कि पाकिस्तान को मदद चाहिए परन्तु सम्मान के साथ । रिपब्लिकन सांसद एड रायस ने कहा था कि पाकिस्तान आतंकवाद से लड़ने के लिए मदद लेता है लेकिन अपनी सेना को भारत के खिलाफ खड़ा रखता है । उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के संदर्भ में अमेरिकी कांग्रेस को अपना लक्ष्य स्पष्ट करना पड़ेगा । अमेरिकी कांगेस की एक रिपोर्ट भारत के लिए चिंता का सबब है । इसमें कहा गया है कि पड़ोसी देश पाकिस्तान के पास करीब ६० परमाणु बम है और इनमें से ज्यादातर का निशाना भारत की ओर रखा गया है । पाकिस्तान बम बनाने के लिए लगातार विखंडनीय सामग्री की उत्पादन कर रहा है । अमेरिकी कांग्रेस की रिसर्च शाखा ‘कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस’ (सीआरएस) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में यह खुलासा किया है । उसकी यह रिपोर्ट हाल ही दिए गए इन बयानों और मीडीया रिपोर्टों की पुष्टि करती है कि पाकिस्तान लगातार अपने परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ाने में लगा हुआ है । सीआरएस ने ‘पाकिस्तान हथियार प्रसार और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे’ शीर्षक से तैयार अपनी रिपोर्ट में कहा है- ‘पाकिस्तान के पास इस समय लगभग ६० परमाणु बम हैं । वह और परमाणु बम बनाने के लिए लगातार विखंडनीय सामग्री का उत्पादन किए जा रहा है । ’ अमेरिकी जॉईटं चीफ ऑफ स्टाफ के चेयरमैन एडमिरल माइक मुलेन ने भी १४ मई को कांग्रेस के समक्ष जानकारी दी थी कि अमेरिका के पास प्रमाण हैं कि पाकिस्तान अपने परमाणु हथियारों के भंडार में निरंतर वृद्धि कर रहा है । ऐसी ही एक रिपोर्ट इस महीने के शुरू में न्यू यॉर्क टाइम्स में भी प्रकाशित हुई थी । सीआरएस की रिपोर्ट कहती है कि पाकिस्तान के पास कोई घोषित न्यूक्लियर पॉलिसी नहीं हैं । लेकिन उसके पास ‘भरोसेमंद न्यूनतम प्रतिरोध क्षमता’ है । रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की तकनीक कई स्त्रोतों से हासिल की गई है । उसने यूरोप से एनरिचमेंट की तकनीक ली है, जबकि छोटे न्यूक्लियर हथियारों और मिसाइलों की टेक्नॉलजी उसे चीन से मिली है । पाकिस्तान के परमाणु बमों में बेहद परिष्कृत यूरेनियम के ठोस कोर के साथ इम्प्लोजन (अंदरूनी विस्फोट) डिजाइन का इस्तेमाल किया गया है । प्रत्येक परमाणु बम १५-२० किलोटन का है । इस्लामाबाद यहीं रुका है । वह और परमाणु बम बनाने के लिए हर साल करीब १०० किलोग्राम बेहद परिष्कृत यूरेनियम का उत्पादन कर रहा है । रिपोर्ट में उसके खुशाब प्लूटोनियम प्रॉडक्शन रिएक्टर के विस्तार का जिक्र किया गया है, जिसमें चीन की मदद से दो अतिरिक्‍त हैवी वॉटर रिएक्टर लगे हैं । सीआरएस के अनुसार पाकिस्तान ने परमाणु हथियार पहले इस्तेमाल न करने की बात तो कही है, लेकिन परमाणु हथियारों से लैस हमलावर देश (जैसे भारत) पर एटम बम का पहले इस्तेमाल न करने की गारंटी नहीं दी है । पाकिस्तान में लंबे समय से जारी अस्थिरता और तालिबान के खिलाफ उसके अभियान से इन आशंकाओं को बल मिला है कि उसके परमाणु हथियार आतंकवादियों के हाथ लग सकते हैं या फिर पाकिस्तान सरकार में मौजूद तत्व उनका इस्तेमाल कर सकते हैं । सीआरएस ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पाक में फैली अस्थिरता परमाणु हथियारों के लिए खतरा बन सकती है । इसके अनुसार कुछ पर्यवेक्षकों को आशंका है कि सरकार में कट्टरपंथियों के आ जाने या पाकिस्तान के परमाणु कारोबार से जुड़े लोगों में उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले इसका प्रसार कर सकते हैं । माना जाता है कि पाकिस्तान ने अपने परमाणु हथियारों को एक जगह नहीं बल्कि अलग-अलग जगहों पर रखा है । सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान की मंशा अगर साफ है तो उसे उक्‍त वादा करने में क्या दिक्‍कत है? फिर पाकिस्तानी नेताओं के अलग-अलग सुर क्यों हैं? इतना तो तय है कि यह समस्याओं को सुलझाने के बजाय उलझाने में शायद अपनी भलाई समझता है । “कैसे सुलझेगी हालात की गुत्थी लोगों अहलेदानिश ने बड़ी सोच के उलझाई है । ”
- गोपाल प्रसाद

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